• search
For Quick Alerts
ALLOW NOTIFICATIONS  
For Daily Alerts

    छत्तीसगढ़ में किसानों की आत्महत्या?

    By आलोक प्रकाश पुतुल
    |
    सरकार ने किसानों की आत्महत्या को बेबुनियाद बताया है
    केंद्रीय गृह मंत्रालय के राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो ने जो आँकड़े जारी किए हैं उसके अनुसार छत्तीसगढ़ में पिछले वर्ष 1593 किसानों ने आत्महत्या की है और किसानों की आत्महत्या का सिलसिला पिछले कई सालों से जारी है.

    इन आँकड़ों के अनुसार जनसंख्या के मुकाबले किसानों की आत्महत्या के मामले में छत्तीसगढ़ पूरे देश में सबसे आगे है.

    हालांकि राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह ने इन आंकड़ों को बेबुनियाद बताते हुए कहा है कि ये आंकड़े मनमाने तरीके से तैयार किए गए हैं और इनमें कोई सच्चाई नहीं है.

    राज्य में विपक्षी पार्टी कांग्रेस समेत दूसरे दलों ने भी किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को गंभीरता से नहीं लिया है.

    लेकिन राष्ट्रीय अपराध अभिलेख ब्यूरो ने दावा किया है कि उसे ये आंकड़े राज्य सरकार ने ही उपलब्ध कराए हैं.

    दो करोड़ 80 लाख की जनसंख्या वाले छत्तीसगढ़ में किसानों की आबादी 35 लाख के आसपास है. धान का कटोरा कहलाने वाले छत्तीसगढ़ में अब भी धान ही मुख्य फसल है. राज्य में धान की 23 हज़ार से भी अधिक क़िस्में हैं.

    हालांकि धान की खेती करने वाले किसानों की हालत भी अच्छी नहीं है लेकिन नक़दी फसलों के चक्कर में फंस कर कर्ज लेने और फिर आत्महत्या करने वाले आंध्र प्रदेश या महाराष्ट्र के किसानों जैसी स्थिति छत्तीसगढ़ में नहीं है.

    किसान बनाम किसानी

    समाजवादी आंदोलन से जुड़े रहे कृषि वैज्ञानिक और किसान नेता आनंद मिश्रा मानते हैं कि छत्तीसगढ़ में खेती की हालत ख़राब है. लेकिन उनका मानना है कि बाज़ार के दबाव में बदलती हुई जीवन शैली और उपभोग की तीव्र लालसा के कारण आत्महत्या बढ़ रही है.

    आनंद मिश्रा कहते हैं, "किसान की आत्महत्या और किसानी यानी खेती में असफलता के कारण होने वाली आत्महत्या में फ़र्क़ करने की ज़रुरत है."

    असल में आत्महत्या के जो ज़िलेवार आंकड़े तैयार होते हैं, उसमें एक श्रेणी मृतक के पेशे का होता है. जब किसानों की आत्महत्या की बात होती है तो किसी भी कारण से आत्महत्या करने वाले किसान को 'किसान' श्रेणी के आँकड़े में रख लिया जाता है.

    उदाहरण के लिए पिछले बुधवार को छत्तीसगढ़ की प्राचीन राजधानी रतनपुर भरइहापारा के किसान कार्तिक राम सतनामी ने कीटनाशक पी कर आत्महत्या कर ली.

    किसान की आत्महत्या और किसानी यानी खेती में असफलता के कारण होने वाली आत्महत्या में फ़र्क़ करने की ज़रुरत है
    कार्तिक के परिजन बताते हैं कि इस साल आम की फसल में उसे भारी मुनाफ़ा हुआ था. लेकिन फसल बेचने से जो रकम उसे मिली थी उसका बड़ा हिस्सा वह शराब पी कर ख़त्म कर रहा था.

    घरवालों में इस बात को लेकर कहा-सुनी हुई तो बुधवार को कार्तिकराम ने शराब के नशे में ही कीटनाशक पी कर आत्महत्या कर ली.

    ज़ाहिर है, इस आत्महत्या को किसान की आत्महत्या के रुप में दर्ज किया गया है और जब वर्ष 2008 में किसानों की आत्महत्या के आँकड़े तैयार किए जाएंगे तो उसमें कार्तिकराम सतनामी का नाम भी शामिल हो जाएगा.

    कटघरे में आंकड़े

    राज्य के मुख्यमंत्री रमन सिंह का कहना है कि विधानसभा में अधिकांश सदस्य किसान ही हैं और पिछले साढ़े चार सालों में एक भी सत्र में, एक भी दिन, एक भी विषय में किसानों की आत्महत्या को लेकर कोई चर्चा नहीं हुई.

    रमन सिंह कहते हैं, "राज्य में किसानों की सबसे अधिक आत्महत्या की बात तो छोड़ें, मुझे सबसे कम आत्महत्या पर भी आपत्ति है. क्योंकि कर्ज़ के कारण किसान द्वारा आत्महत्या की घटना छत्तीसगढ़ में हुई ही नहीं है."

    किसानों के विस्थापन और जल-जंगल-ज़मीन के मुद्दे पर लंबे समय से आंदोलन चलाने वाले नदी घाटी मोर्चा के गौतम बंदोपाध्याय इसे महज़ आँकड़ों का खेल बताते हैं.

    राज्य में किसानों की सबसे अधिक आत्महत्या की बात तो छोड़ें, मुझे सबसे कम आत्महत्या पर भी आपत्ति है. क्योंकि कर्ज़ के कारण किसान द्वारा आत्महत्या की घटना छत्तीसगढ़ में हुई ही नहीं है
    उनका कहना है कि इस तरह के आँकड़ों से बहुराष्ट्रीय कंपनियों को मदद मिल रही है और वे इसे मुद्दा बना कर किसानों को नक़दी फसलों की ओर धकेलने का काम करेंगे.

    गौतम कहते हैं, "बहुराष्ट्रीय कंपनियां जैव विविधता को खत्म करने का काम कर रही हैं और इस तरह के आँकड़े चाहे-अनचाहे उनकी मदद करेंगे."

    खेती में असफलता के कारण किसानों की आत्महत्या न हो तो भी राज्य में किसानों की आत्महत्या की बढ़ी हुई दर तो चिंताजनक है ही.

    गौतम इसके पीछे तर्क देते हुए कहते हैं, "राज्य के बड़े पूंजीपति, विधायक, सांसद और मंत्री भी जब आयकर जमा करते हैं तो वे अपना पेशा कृषि ही बताते हैं. किसानों की जनसंख्या का आंकड़ा इसी तरह के घालमेल से तैयार होता है. ऐसे में स्वभाविक रुप से आत्महत्या करने वालों की संख्या में बतौर किसान दर्ज होने वाले लोगों की संख्या अधिक होती है."

    छत्तीसगढ़ में औद्योगिकरण और आत्महत्या जैसे मुद्दे पर पिछले कई सालों से काम कर रहे लंदन स्कूल ऑफ इकानामिक्स के प्रोफ़ेसर जोनाथन पैरी किसानों की आत्महत्या को इतना सरलीकृत किए जाने के खिलाफ हैं.

    प्रोफ़ेसर पैरी के अनुसार, "किसानों की आत्महत्या के आंकड़ों को संपूर्णता में देखने की ज़रुरत है. जिस तरह के आंकड़े सामने आए हैं, उससे भ्रम पैदा होता है. ये बात तो साफ़ समझ में आती है कि इन आँकड़ों पर गंभीरता से काम नहीं हुआ है."

    लेकिन जिस राज्य सरकार को इन आँकड़ों पर गंभीरता से काम करना है, उसने इन आंकड़ों को ख़ारिज कर दिया है. और राज्य के किसान? फिलहाल तो इन आंकड़ों से दूर अपने खेतों में मानसून पूर्व की तैयारी में जुटे हुए हैं.

    BBC

    जीवनसंगी की तलाश है? भारत मैट्रिमोनी पर रजिस्टर करें - निःशुल्क रजिस्ट्रेशन!

    देश-दुनिया की ताज़ा ख़बरों से अपडेट रहने के लिए Oneindia Hindi के फेसबुक पेज को लाइक करें
    For Daily Alerts

    Oneindia की ब्रेकिंग न्यूज़ पाने के लिए
    पाएं न्यूज़ अपडेट्स पूरे दिन.

    Notification Settings X
    Time Settings
    Done
    Clear Notification X
    Do you want to clear all the notifications from your inbox?
    Settings X
    X
    We use cookies to ensure that we give you the best experience on our website. This includes cookies from third party social media websites and ad networks. Such third party cookies may track your use on Oneindia sites for better rendering. Our partners use cookies to ensure we show you advertising that is relevant to you. If you continue without changing your settings, we'll assume that you are happy to receive all cookies on Oneindia website. However, you can change your cookie settings at any time. Learn more