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ईश्वर की देन नहीं है गरीबी

By Staff
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नई दिल्ली, 21 जून (आईएएनएस)। दुनिया में गरीबी में जीवन व्यतीत करने वालों की संख्या अमीरों की तुलना में बहुत अधिक है। ऐसे बहुत कम ही लोग हैं, जिनकी आवश्यकताएं सहज ही पूरी हो जाती हैं और उन्हें साधनों के लिए चिंतित होना न पड़ता हो।

नई दिल्ली, 21 जून (आईएएनएस)। दुनिया में गरीबी में जीवन व्यतीत करने वालों की संख्या अमीरों की तुलना में बहुत अधिक है। ऐसे बहुत कम ही लोग हैं, जिनकी आवश्यकताएं सहज ही पूरी हो जाती हैं और उन्हें साधनों के लिए चिंतित होना न पड़ता हो।

निर्धनता अपनी प्राथमिक आवश्यकताओं के लिए भी चिंतित और सशंकित रहने वाली परिस्थिति का नाम है। यह स्थिति जितने व्यापक रूप में लोगों को परेशान करती है, उतनी शायद ही और कोई दूसरी परिस्थिति करती हो।

हर आदमी अपने को इस परिस्थिति से उबारना चाहता है। गरीबी दूर करने के लिए भी लोग अपने-अपने ढंग से प्रयास कर रहे हैं, लेकिन उन्हें सफलता कम मिलती है।

इसी कारण गरीबी को सबसे व्यापक और त्रासदीभरी समस्या माना जाता है। जो भी इस रोग के शिकार हैं, उनकी तीव्र आकांक्षा होती है कि इससे छुटकारा पाएं। आकांक्षा को पूरी करने के प्रयत्न भी चलते हैं पर उनमें सफलता मिल ही जाए, इसमें कोई निश्चित नहीं रहता।

इसके कई कारण हैं। पहला तो यह है कि अधिकांश लोग पूरे प्राण से नहीं चाहते कि उनकी गरीबी मिट जाए। उन्हें केवल इतनी चाह होती है कि दो जून खाना, तन ढंकने को कपड़े और सिर ढंकने को छायाभर मिल जाए। उन्हें लगता है कि इतना ही काफी है और संपन्नता की उनको जरूरत ही नहीं है।

वस्तुत: इस आकांक्षा के पीछे बहुत तो आलस्य और सुविधा प्राप्ति की लालसा रहती है। ऐसे लोगों का दृष्टिकोण यह रहता है कि यदि भोजन, वस्त्र और आवास की उनकी आवश्यकताएं पूरी होती रहें, तो वे आराम से रहें और मौज करते रहें।

गरीबी उनके लिए उतनी दुखदायी नहीं होती, जितना कि परिश्रम। गरीबी को अमीरी में बदलने की अपेक्षा आराम से और बिना श्रम किए बैठे-बैठे खाने वालों की संख्या अधिक है। इसलिए दिनभर मेहनत करने वाले कई लोग शाम को अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा सट्टे के नंबर पर लगाते मिल जाएंगे।

रिक्शा, तांगा चलाने वाले मजदूर, जो गरीबी के सबसे ज्यादा शिकार बताए जाते हैं, दिनभर में कम से कम 80 से 100 रुपये रोज कमाते हैं।

इस प्रकार महीने की कमाई दो-ढाई हजार से तीन-साढ़े तीन या चार हजार तक की भी हो जाती होगी। फिर भी गरीबी का अभाव और तंगी का अधिक रोना उन्हीं के पास रहता है।

प्रख्यात मनीषी स्वेट मार्डन ने गरीबी से मुक्ति पाने के लिए तीन साधन प्रमुख रूप से बताए हैं। ये हैं- मन से गरीबी को भगाकर पूरे प्राण से समृद्धि को पुकारना, कठोर श्रम व उपार्जन और व्यय का संतुलन। ये तीन उपाय ऐसे हैं, जिन्हें उपयोग में लाकर समृद्धि का स्वागत किया जा सकता है।

कई लोग यह समझते हैं कि गरीबी ईश्वर की देन है या भगवान हमें निर्धन ही रखना चाहता है। सिद्धांतत: ऐसा नहीं है, क्योंकि मनुष्य भगवान की सर्वोत्तम कृति है। वह किसी भी परिस्थिति में नहीं चाहेगा कि उसका पुत्र रोटी और कपड़े के पीछे ही अपना अमूल्य जीवन नष्ट कर दे।

लौकिक पिता भी जब अपनी संतान को दीन-हीन, निर्धन बने रहने नहीं देना चाहता, तो अलौकिक परम पिता अपनी संतान को दीन-हीन देखना कैसे पसंद करेगा?

मानवीय अस्तित्व के लिए मन एक कल्पवृक्ष की तरह है। इसकी छाया में जो इच्छा की जाएगी, वही पूरी होगी। हम सोचते रहें कि हम गरीब हैं, निर्धन हैं, निर्धन ही जन्मे हैं और निर्धन ही बने रहेंगे, तो आकाश के तारे हाथ में आना भले ही संभव हो जाए, पर यह कदापि संभव नहीं कि समृद्धि का हवा भी हमें लग जाए।

पं. श्रीराम शर्मा आचार्य के अनुसार समृद्धि का एक स्वर्ण नियम है कि आमदनी से कम खर्च किया जाए। जितना कुछ कमाया जाए, उसमें से कुछ भाग संकटकाल के लिए या अन्य समय के लिए बचाकर रखा जाए।

यद्यपि बंधे-बंधाए ढर्रे के प्रयास कभी निश्चित आय से अधिक उपार्जन नहीं कर पाते। उसके लिए सर्वदा नए कदम उठाने होते हैं। अत: उचित यह है कि उन नए सृजनात्मक कदम उठाने के साथ-साथ जब परिस्थितियां बदलें और कदाचित उनका रुख प्रतिकूल हो जाए, तो उस समय के लिए सुरक्षा प्रबंध करके रखा जाए।

मन को निराशावादी विचारों और भावनाओं से मुक्त कर सच्चे मन से यदि श्रमयुक्त संपन्नता के लिए प्रयास किए जाएं, तो उसकी असफलता का कोई कारण नहीं रह जाता।

दूसरा यह कि आम तौर से लोगों के पास सुरक्षित धन का सही ढंग से उपयोग नहीं होता। अगर उसी रुपये को थोड़ी-सी बुद्धि लगाकर व्यवस्थित रूप से खर्च किया जाए, तो भी अभाव व असुविधा से बचा जा सकता है और प्रयास-पुरुषार्थ के द्वारा संपन्नता की दिशा में धीरे-धीरे प्रगतिशील कदम बढ़ाया जा सकता है।

(लेखक अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख संचालक हैं)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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