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संगीत से भी हो सकती है रोगों की छुट्टी

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    नई दिल्ली, 19 जून (आईएएनएस)। रोगों की जड़ शरीर में नहीं, मन में होती है। यह मानकर अपने मानसिक संतुलन को सुस्थिर रखा जाए, तो कोई शारीरिक रोग होने पर भी वह जीवन क्रम सामान्य ढंग से चलाया जा सकता है। मानसिक संतुलन साधने के लिए यह मान्यता बड़ी ही उपयोगी साबित हो सकती है।

    नई दिल्ली, 19 जून (आईएएनएस)। रोगों की जड़ शरीर में नहीं, मन में होती है। यह मानकर अपने मानसिक संतुलन को सुस्थिर रखा जाए, तो कोई शारीरिक रोग होने पर भी वह जीवन क्रम सामान्य ढंग से चलाया जा सकता है। मानसिक संतुलन साधने के लिए यह मान्यता बड़ी ही उपयोगी साबित हो सकती है।

    यह एक सुनिश्चित तथ्य है कि उस तथ्य को सभी रोगों में एकसमान लागू होते देखा जा सकता है। उनकी प्रतिक्रिया, लक्षण शरीर पर भले ही दिखाई दे, लेकिन उनकी जड़ मनुष्य के मन में होती है। वृक्ष की जड़ जमीन के भीतर होती है और उसका तना, शाखाएं, पत्ते, फूल, फल और शिखर आकाश में होते हैं। इसी तरह रोगों का स्वरूप, उत्पात और प्रतिक्रिया शरीर के तल पर दिखाई देते हैं, लेकिन उनका मूल मन में होता है।

    इस तथ्य को दृष्टिगत रखते हुए महर्षियों ने हजारों वर्ष पूर्व कहा- प्रज्ञापराधं रोगस्य मूल कारणम्। अर्थात प्रज्ञापराध, मानसिक अस्तव्यस्तता, असंतुलित मन:स्थिति, चिंता, क्षोभ और अन्यान्य मानसिक विकृतियां समस्त रोगों का मूल कारण हैं। यदि अपनी मानसिक स्थिति को संभाला जाए और उसे शत प्रतिशत संतुलित बनाया जाए, तो शरीर को पूर्ण स्वस्थ, निरोग और पुष्ट रखा जा सकता है।

    शरीर का निदान-परीक्षण बाद में, पहले मन को ही स्वस्थ बनाए रखने की बात सोचना चाहिए। इसके लिए प्रचलित चिकित्सा पद्धतियों से परे मन को हलका-फुलका बनाने वाली किसी भी विधि का सहारा लिया जा सकता है। संगीत का स्थान इनमें सर्वोपरि है। ऐलौपैथी, नेचरोपैथी, होम्योपैथी, बायोकेमिकल चिकित्सा पद्धति आदि चिकित्सा प्रणालियों की तरह पश्चिमी देशों में संगीत से भी रोगों के उपचार की विधि खोज ली गई है और उसका सफलतापूर्वक उपयोग किया जाने लगा है।

    अब तो संगीत को मानसिक रोगों से मुक्ति दिलाने वाली अचूक औषधि समझा जाने लगा है। पश्चिमी देशों में संगीत-चिकित्सा दिनों-दिन लोकप्रिय होती जा रही है। इस चिकित्सा पद्धति के अंतर्गत रोगियों को एक-दूसरे के साजों से निकलने वाली ध्वनियों का उत्तर धुनों के माध्यम से ही देने के लिए प्रशिक्षित किया जाता है।

    पागल और विक्षिप्त समझे जाने वाले व्यक्तियों की मस्तिष्कीय क्षमता पहले ही प्रयास में इस योग्य तो नहीं बन पाती कि वे बताई गई विधि का अक्षरश: पालन कर लें, लेकिन धीरे-धीरे वे एक-दूसरे के साजों से निकलने वाली धुनों को पहचानने लगते हैं तथा उन धुनों द्वारा ही उत्तर देने लगते हैं। धुनों के माध्यम से उत्तर देने का यह क्रम धीरे-धीरे शब्दों तक भी पहुंच जाता है और परिणामत: रोगी के रोगमुक्त होने में दिनों-दिन सफलता प्राप्त होने लगती है।

    कुछ वर्ष पूर्व बर्लिन में ही संपन्न हुई 'अंतर्राष्ट्रीय संगीत चिकित्सा पद्धति' में कहा गया कि विक्षिप्त या पागल मानकर समाज से अलग कर दिए गए व्यक्ति का दिमाग बेकार नहीं हो जाता है। वस्तुत: लोग भावनाओं पर अत्यधिक ठेस लगने के कारण मस्तिष्कीय संतुलन खो बैठते हैं। कभी-कभी यह असर इतना गहरा हो जाता है कि वह व्यक्ति समाज की धारा से पूरी तरह कट-पिटकर अपने आप में सिमट जाता है।

    संगीत में भावनाओं को जाग्रत करने और सम्बल देने का ही नहीं, उनको परिष्कृत करने तथा संतुलन साधने की प्रभावशाली क्षमता है। शरीरशास्त्रियों की मान्यता है कि मस्तिष्क के कुछ भाग भावनाओं को उत्तेजित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। संगीत का उन अंगों पर बहुत अच्छा और अनुकूल प्रभाव पड़ता है। संगीत द्वारा मस्तिष्क की उन सिकुड़ी हुई मांसपेशियों को शक्ति मिलती है।

    फलत: व्यक्ति को भावनात्मक बल और आनंद मिलता है। वे पेशियां जो किसी कारणवश निष्क्रिय हो जाती हैं, पुन: सक्रिय हो उठती हैं। संगीत की स्वर लहरियों से तनाव हलका होने की बात तो आम है। लोग संगीत का यह प्रयोग तो आमतौर पर करते हैं। इसी नियम को एक विधि-व्यवस्था के साथ रोग चिकित्सा के लिए अपनाया जाता है और अब तो जटिल से जटिल रोगों का उपचार भी संगीत द्वारा किए जाने की विधियां खोज ली गई हैं।

    वाद्ययंत्रों के माध्यम से रोगोपचार की यह पद्धति तो कुछ वर्षो पूर्व ही आविष्कृत की गई है। अब चिकित्साशास्त्रियों का ध्यान इस दिशा में भी गया है कि वाद्ययंत्रों के अलावा गायन का शरीर व स्वास्थ्य पर क्या प्रभाव पड़ता है। बाहरी उपकरण इतना प्रभाव उत्पन्न कर सकते हैं, तो स्वयं अपनी ही वाणी, शब्द और स्वर तो और अधिक प्रभाव उत्पन्न करते होंगे।

    इस विषय पर चिकित्साशास्त्रियों का ध्यान भले ही अभी गया हो, परंतु यह तो पिछले काफी समय से जान व समझ लिया गया है कि प्रेरणा गीतों का सस्वर उच्चारण मनुष्य को न केवल हलका-फुलका व प्रफुल्लित कर देता है, वरन उसकी कई चिंताओं, दबावों और तनावों व समस्याओं के बोझ को भी बड़ी सीमा तक समाप्त कर देता है।

    भारतीय मनीषियों ने संगीत की इस शक्ति को हजारों वर्ष पूर्व पहचान कर उसका उच्च उद्देश्यों के लिए प्रयोग करना आरंभ कर दिया था। मंत्र साधना का अपना एक स्वतंत्र विज्ञान तो है ही, पर उसमें लय और गति का तालमेल बहुत कुछ संगीत की इस जीवनदात्री क्षमता के प्रयोग का उदाहरण है। कोई आश्चर्य नहीं कि संगीत का स्वास्थ्य प्रयोजन के लिए उपयोग करते-करते विज्ञान इस तथ्य को भी बहुत जल्दी स्वीकार करने की स्थिति में आ जाए।

    (यह लेख पं. श्रीराम शर्मा आचार्य का है जो शांतिकुंज फीचर्स द्वारा जारी किया गया है)

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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