अब नेपाल बना चीन का नया उपग्रह

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नईं दिल्ली, 15 जून: देशों के इतिहास के बारे में एक मशहूर शेर का हिस्सा है : 'लम्हों ने खता की थी, सदियों ने सजा पायी'। पिछले लगभग साठ साल के दौरान आए दिन ऐसी घटनाएं होती हैं जब ऐसा लगता है मानो शायर ने तिब्बत के संदर्भ में इस शेर को भारत के लिए ही लिखा था।

1949 में जिस समय चीन ने तिब्बत के पूर्वी प्रांतों पर सैनिक कब्जा जमाया और बाकी बचे हुए तिब्बत के लिए तिब्बत सरकार को धमकाना शुरू किया उस समय सदियों की गुलामी से बाहर निकला भारत अपना नया राजनीतिक नक्शा बनाने में व्यस्त था। राजसी रियासतों के भारत में शामिल होने के इस सिलसिले को देखते हुए चीन की इस हरकत ने नेपाल के राजा को भी यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि नेपाल की सुरक्षा के लिए उसे भी भारत में शामिल हो जाना चाहिए। उन्होंने ऐसा प्रस्ताव भारत सरकार को भेजा भी। लेकिन नए बने कम्युनिस्ट चीन की ताकत से अभिभूत और उसके साथ भाईचारे वाले संबंधों के सपनों में हिलोरें लेती भारत सरकार ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया।

उसके बाद तिब्बत पर चीन का पूरा कब्जा हो जाने पर भी भारतीय शासक अपने बुने हुए सतरंगी इंद्रधनुष की पींग पर झूलते जमीन की असलियत से कोसों दूर सपनों की दुनिया में खोए रहे। और जब चीनी हुक्मरानों ने तिब्बत की जमीन को छावनी की तरह इस्तेमाल करके 1962 में भारत पर हमला किया और उसे हार की धूल चटाई तब तक बात हाथ से बुरी तरह निकल चुकी थी। खयाली इंद्रधनुष की ऊंचाई से धड़ाम गिरे अपमानित भारत के मन में चीन के प्रति जिस दहशत ने घर जमाया वह आज भी चीन के बारे में उसकी हर नीति में से बुरी तरह झलकती है। ऐसे में यह देखकर हैरानी नहीं होती कि चीन से पिटे लाचार भारत के प्रति उसके किसी पड़ोसी देश ने कभी प्यार, इज्जत या विश्वास की नजर से देखने की बात नहीं सोची। अगर बाद वाले बरसों में नेपाल के शासकों ने चीन को नाराज न करने की नीति अपनायी और इस कारण भारत से वाजिब दूरी बनाए रखी तो यह सब स्वभाविक ही था।

बाद वाले बरसों में भारत में यह देखकर तसल्ली महसूस की जाती रही कि अगर नेपाल की सरकार भारत के साथ बहुत गहरा रिश्ता नहीं रख रही तो वह चीन के साथ भी सुरक्षित दूरी बनाए हुए है। भारतीय नीति निर्धारक इसे नेपाल की इस नीति को चीन और भारत के साथ 'ईक्वी डिसटेंस पालिसी' कहकर खुद को सांत्वना देते आाए हैं। लेकिन पिछले आठ-दस साल से नेपाल के मोर्चे पर होने वाले बदलाव ने अब भारतीय नीति निर्धारकों की नींद उड़ानी शुरू कर दी है। वे यह देखकर बुरी तरह परेशान हैं कि नेपाल सरकार की पहली वरीयता चीन को खुश करना है और भारत से हर तरह की मदद डकारने के बाद भी वह बात-बात पर उसे घुड़कियां देने लगी है। वे इस बात से भी सकते में हैं कि जहां एक ओर भारत को तोड़ने में लगे अलगाववादी भारतीय संगठनों को नेपाल में काम करने के लिए पूरी जमीन मिली हुई है वहीं पाकिस्तान, बांग्लादेश और चीन की शह पर काम करने भारत विरोधी आतंकवादी संगठनों के लिए खुले बार्डर वाला नेपाल एक स्वर्ग बन चुका है। मौका आने पर अगर इन सब ताकतों के तालमेल में चीन सरकार का हाथ सिद्ध होता है तो किसी को हैरान नहीं होना चाहिए।

भारत के खिलाफ और चीन के पक्ष में नेपाल का झुकाव स्वर्गीय महाराजा वीरेंद्र के जमाने में ही दिखाई देने लगा था। बाद में उनकी हत्या के बाद गद्दी पर आए नए नेपाल नरेश ज्ञानेंद्र ने तो इस बारे में दिखावे की रस्मों को भी ताक पर रख दिया। और अब चीन की शह और बंदूक की मदद से सत्ता में पहुंचे माओवादियों ने इस बात में किसी तरह का शुबहा नहीं छोड़ा कि वे हर मामले में भारत के खिलाफ और चीन के साथ हैं। हालांकि इस बदलाव से पहले वाली सरकारें भी चीन को खुश करने के लिए नेपाल में रहने वाले तिब्बती शरणार्थियों को दबाकर रखती आई है। लेकिन नई सरकार ने जिस तरह से संयुक्त राष्ट्र, यूरोपियन यूनियन और एमनेस्टी इंटरनेशनल जैसे संगठनों की अपीलों को दरकिनार करते हुए तिब्बती शरणार्थियों की बची खुची आजादी को छीनने का उत्साह दिखाया है वह किसी भी मायने में यह नहीं दिखाता कि चीन और नेपाल के संबंध बराबरी या दोस्ती वाले हैं। पिछले दिनों तिब्बती शरणार्थियों के प्रदर्शनों को कुचलने के लिए जिस तरह से नेपाली पुलिस ने चीन के कूटनीतिक अधिकारियों और चीनी सुरक्षा एजेंटों को खुल्लमखुल्ला दखल देने की छूट दी उसे नेपाल के स्वतंत्र अस्तित्व का किसी भी मायने में सम्मानजनक प्रमाण नहीं माना जा सकता।

कुछ समय से जिस तेजी के साथ चीन के नेता नेपाल की यात्राओं पर आने लगे हैं और जिस तरह के प्रस्ताव नेपाली नेता उनके सामने पेश करने लगे हैं वह सब नेपाल के राष्ट्रीय आत्मसम्मान पर चोट तो करता ही है, भारत की सुरक्षा के लिए खतरे के नए संकेत भी देने लगा है। पिछले दिनों एक के बाद एक नेपाली नेताओं ने चीन सरकार से अनुरोध किया है कि वह ल्हासा तक आई चीनी रेलगाड़ी को काठमांडू तक ले आए। इस प्रस्ताव का चीनी नेताओं ने स्वागत किया है। चीन की मदद से नेपाल में बना सड़क तंत्र भारतीय सुरक्षा के लिए पहले से ही गंभीर खतरा बना हुआ था। और अब भारत की सीमा तक चीनी रेल का आना भारत के लिए खतरे की आखिरी घंटी है। यह खतरा और भी गहरा है क्योंकि इसके पीछे ऐसी नेपाली ताकतें हैं जो नेपाल को मानसिक रूप से चीन का उपग्रह बनाने पर तुली हुई हैं। दुर्भाग्य से यह सब तिब्बत पर चीन के कब्जे की वजह से चीन के दक्षिण एशिया में आ घुसने का ही नतीजा है।


इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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