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धर्मशास्त्रों में भी निषेध है तम्बाकू का सेवन (तम्बाकू निषेध दिवस पर विशेष लेख)

By Staff
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नई दिल्ली, 30 मई (आईएएनएस)। संसार के समस्त धर्मो तथा धर्मप्रवर्तकों ने हर प्रकार की नशेबाजी को अधर्म बतलाया है और इसकी निंदा की है, धर्म-ग्रन्थों में स्थान स्थान पर कहा गया है- जो व्यक्ति धूम्रपान करने वाले ब्राह्मणों को दान देता है तो वह देने वाला नरक को जाता है और ब्राह्मण ग्राम में शूकर बनता है।

नई दिल्ली, 30 मई (आईएएनएस)। संसार के समस्त धर्मो तथा धर्मप्रवर्तकों ने हर प्रकार की नशेबाजी को अधर्म बतलाया है और इसकी निंदा की है, धर्म-ग्रन्थों में स्थान स्थान पर कहा गया है- जो व्यक्ति धूम्रपान करने वाले ब्राह्मणों को दान देता है तो वह देने वाला नरक को जाता है और ब्राह्मण ग्राम में शूकर बनता है।

शास्त्रों के इस प्रकार प्रमाण वचनों के होते हुए भी जो व्यक्ति तम्बाकू, शराब आदि नशों का सेवन किया करते हैं और उस कुकर्म की संगति प्रदान करने के लिए धर्म की आड़ लेते हैं, वे अपने इहलोक तथा परलोक दोनों को बिगाड़ते हैं।

यह भी निर्विवाद सत्य ही है कि धार्मिक दृष्टिकोण से भी तम्बाकू त्याज्य है। ऐतिहासिक दृष्टिपात करें तो तम्बाकू को संसार में प्रचार हुए पांच छह सौ वर्ष ही हुए हैं। कोलम्बस की अमेरिकी खोज के पहले एशिया, यूरोप, अफ्रीका आदि अन्य महाद्वीप वालों को तम्बाकू के संबंध में कोई ज्ञान न था। परन्तु धूम्रपान भारत वर्ष के लिए सर्वथा नई चीज नहीं है।

आयुर्वेद के चरक तथा सुश्रुत जैसे हजारों वर्ष पूर्व रचे गए ग्रन्थों में धूम्रपान का विधान है। वहां पर उसका वर्णन औषधि के रूप में हुआ है जैसे कहा गया है कि आम के सूखे पत्ते को चिलम जैसी किसी उपकरण में रखकर धुआं खींचने से गले के रोगों में आराम होता है। दमा तथा श्वास संबंधी रोगों में वासा (अडूसा) के सूखे पत्तों को चिलम में रखकर पीना एक प्रभावशाली उपाय माना गया है।हमारे देश में भांग या विजया का चलन काफी प्राचीनकाल से है।

यद्यपि पुराण और स्मृतियों में कहीं-कहीं धूम्रपान को निषेध और उसके प्रयोग करने वाले के लिए लौकिक या पारलौकिक दण्ड मिलने का उल्लेख है। उदाहरणार्थ- "स्कन्द पुराण में एक स्थान पर कहा गया है- "स्वधर्म का आचरण करके जो पुण्य प्राप्त किया जाता है, वह धूम्रपान से नष्ट हो जाता है। इस कारण समस्त ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य आदि को इसका सेवन कदापि नहीं करना चाहिए।

"अनेक तीर्थो में स्नान दान कर लेना और प्रयोग आदि में अनेकों बार स्नान करना भी धूम्रपान के कारण वृथा हो जाता है। क्योंकि इस कुटेव के कारण मनुष्य के ह्दय में दूषित वृत्तियों का उत्थान होता है और उसके विचार अशुद्ध हो जाते हैं।

"इसी प्रकार सुवर्ण, गौ, अन्न आदि का बहुत सा दान भी धूम्रपान रूपी पाप के फल से निष्फल हो जाता है।

इन उपर्युक्त कथनों से प्रतीत होता है कि नशे के रूप में धूम्रपान के दोषों से प्राचीन समय के विचारक भी परिचित थे और इसलिए वे धार्मिक दृष्टि से इसको हेय और त्याज्य बतला चुके हैं। तीर्थ स्थानों पर लगने वाले बड़े मेलों में धूनी पर बैठकर सुलफा, गांजा अथवा तम्बाकू के दम लगाने वालों से पूछना चाहिए कि वे इस प्रकार का कुकर्म करके क्यों अपने और अन्य लोगों के तीर्थ स्थान के पुण्य को नष्ट करते हैं।

इसमें कुछ भी संदेह नहीं है कि चाहे तम्बाकू का चलन वर्तमान रूप में चार-पांच सौ वर्ष पहले ही हुआ हो, परन्तु नशे के रूप में धूम्रपान सदा से हानिकारक, दूषित और एक पाप कर्म माना गया है। इसीलिए इन दिनों जितने संत-मत तथा धार्मिक सम्प्रदाय चले हैं, सब में इसका निषेध है। किसी भी धर्म प्रिय सज्जन ने आज तक इसका समर्थन नहीं किया।

स्वास्थ्य विभाग संगठन की टीम ने एक "सैम्पल सर्वे किया तो ज्ञात हुआ कि एक-दो लाख की आबादी वाले भारतीय शहर में 2 करोड़ 70 लाख सिगरेटों एवं 5 करोड़ 12 लाख बीड़ियों की खपत प्रतिदिन विक्रेताओं के माध्यम से होती है। यह सब उस वैज्ञानिक चेतावनी के बावजूद है जो हर सिगरेट के पैकेट पर अंकित रहती है कि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। फिर भी लोग धूम्रपान करते हैं।

450 ग्राम तम्बाकू में निकोटीन नामक जहर की मात्रा लगभग 22.8 ग्राम होती है। इसकी 6 ग्राम मात्रा से एक कुत्ता 3 मिनट में मर जाता है। फिर व्यक्ति धूम्रपान करके स्वयं मौत को न्यौता क्यों दे रहा है?

प्रसिद्ध चिकित्सकों का मत है कि तम्बाकू के प्रयोग से दांत कमजोर पड़ जाते हैं और असमय ही गिर जाते हैं। अनेक दंत रोग हो जाते हैं। मंदाग्नि रोग हो जाता है। आंखों की ज्योति कम हो जाती है। आदमी बहरा व अन्धा हो जाता है। व्यक्ति नपुंसक भी हो सकता है। फेफड़ों की टीबी हो जाती है, जो मनुष्य को सब प्रकार से बर्बाद कर देती है और मृत्यु को निकट ला देती है। तम्बाकू के निकोटीन से ब्लड प्रेशर बढ़ता है, रक्त संचार मंद पड़ जाता है। अत: तम्बाकू निषेध दिवस पर प्रत्येक धूम्रपान करने वाले को उसका प्रयोग नहीं करने का संकल्प लेना ही चाहिए।

(लेखक अखिल विश्व गायत्री परिवार के प्रमुख हैं)

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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