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    दिनेश चंद्र ने 83 वर्ष की उम्र में रखा उदाहरण

    By Staff
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    नई दिल्ली, 13 मई (आईएएनएस)। उम्र के जिस पड़ाव पर व्यक्ति की आखें अक्सर कमजोर हो जाती हैं। शरीर साथ नहीं दे पाता है। ऐसी अवस्था में स्नातकोत्तर(एमए) की परीक्षा पास करने वाले 83 वर्षीय दिनेश चंद्र गुप्ता अपनी पुत्रवधुओं को भी इसका श्रेय देते हैं।

    नई दिल्ली, 13 मई (आईएएनएस)। उम्र के जिस पड़ाव पर व्यक्ति की आखें अक्सर कमजोर हो जाती हैं। शरीर साथ नहीं दे पाता है। ऐसी अवस्था में स्नातकोत्तर(एमए) की परीक्षा पास करने वाले 83 वर्षीय दिनेश चंद्र गुप्ता अपनी पुत्रवधुओं को भी इसका श्रेय देते हैं।

    इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) से वर्ष 2008 में स्नातकोत्तर की परीक्षा उत्तीर्ण करने वाले दिनेश गुप्ता ने आईएएनएस से खास बातचीत में कहा, "मेरी सफलता में बहुओं का बड़ा योगदान है। उन लोगों ने इस उम्र में भी मुझे पढ़ने में बड़ा सहयोग दिया और हमेशा मेरे चाय-पानी का ध्यान रखा।"

    उन्होंने कहा, "मैंने वर्ष 1947 में भौतिक विज्ञान से 'एमएससी' प्रथम वर्ष की परीक्षा पास की थी। इसके बाद मेरी नौकरी लग गई और एमएससी की डिग्री प्राप्त करने की हसरतें मेरे मन में दबी रह गई। अब इस बात की खुशी है कि बुढ़ापे में ही सही पर मैंने एमए कर लिया है।"

    उल्लेखनीय है कि दिनेश गुप्ता इग्नू के सबसे वरिष्ठ छात्र थे। उन्होंने कहा, "पहले में दिल्ली विश्वविद्यालय से अंग्रेजी साहित्य में एमए करना चाहता था लेकिन कुछ निर्धारित कायदे की वजह से विश्वविद्यालय ने मना कर दिया। इससे काफी दिनों बाद इग्नू का ख्याल आया और मैंने यहां हिन्दी साहित्य से एमए करने की ठानी।"

    एमए की परीक्षा के दौरान एक वाकया को याद करते हुए गुप्ता ने कहा, "जब मैं परीक्षा देने गया तो वहां तैनात निरीक्षकों ने कहा कि अब आपकी उम्र परीक्षा देने की नहीं है। इसके जवाब में पास ही बैठी एक बच्ची ने कहा कि आप इन्हें यहां बैठने दें, इन्हें देखकर न जाने कितने लोग पढ़ाई शुरू कर दें। उस बच्ची की बातें मुझे आज बार-बार याद आती हैं।"

    अपने पारिवारिक अनुभवों के संबंध में उन्होंने कहा कि समाज में जो लोग एकल हो जाते हैं उनके लिए जीवन बहुत कठिन हो जाता है। वह पुराने राग को नहीं छोड़ पाते हैं। मैं इस मामले में निश्चित तौर पर भाग्यशाली हूं। वर्ष 1993 में मेरी पत्नी की मृत्यु हो गई थी। इसके बाद मेरे बच्चों और बहुओं ने मेरा और भी ख्याल रखा और सामाजिक गतिविधियों में मेरा सहयोग भी किया।

    वह पीएचडी करना चाहते थे। उन्होंने कहा यदि एमए में मैं 55 प्रतिशत अंक पाता तो निश्चित तौर पर पीएचडी करता। यकीनन गुप्ताजी एक उदाहरण हैं।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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