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    'सामाजिक आधार पर महिला आरक्षण न होने से इसके उद्देश्यों को लगेगा झटका'

    By Staff
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    नई दिल्ली, 11 मई (आईएएनएस)। सांसदों के एक तबके का कहना है कि अगर जाति आधारित महिला आरक्षण की मांग नहीं मानी गई, तो विधायिका में महिला आरक्षण के उद्देश्यों को कड़ा झटका लग सकता है।

    नई दिल्ली, 11 मई (आईएएनएस)। सांसदों के एक तबके का कहना है कि अगर जाति आधारित महिला आरक्षण की मांग नहीं मानी गई, तो विधायिका में महिला आरक्षण के उद्देश्यों को कड़ा झटका लग सकता है।

    इन सांसदों का तर्क है कि अभी संसद में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) की 11 महिला सांसद हैं, जबकि संसद में एससी के लिए 120 और एसटी के लिए 79 सीट आरक्षित हैं।

    इन सांसदों का कहना है कि जब जातिगत आरक्षण के बावजूद महिलाओं को आरक्षण का लाभ नहीं मिल पाया, तो सिर्फ महिलाओं के लिए आरक्षण हो जाने से एससी और एसटी की महिलाओं को आरक्षण का लाभ कैसे मिल पाएगा।

    लोकसभा में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के उपनेता देवेंद्र प्रसाद यादव ने आईएएनएस को बताया कि यही कारण है कि राजद ने आरक्षण में आरक्षण यानी महिला आरक्षण में दलितों, जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गो ओर अल्पसंख्यक वर्ग की महिलाओं के लिए अलग जगह देने की मांग की है।

    उनका कहना है कि इस मांग को नहीं माने जाने पर महिला आरक्षण के उद्देश्यों की हार हो जाएगी और इसका फायदा दूसरों को मिल जाएगा।

    मार्क्‍सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के सांसद मोहम्मद सलीम का मानना है कि सदन में महिला आरक्षण विधेयक पर बहस होना चाहिए।

    आरक्षित श्रेणी से आने वाली एक महिला सांसद ने आईएएनएस को रोष जताते हुए कहा, "अगर विभिन्न राजनीतिक दल महिलाओं का सशक्तीकरण चाहते हैं, तो उन्हें अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों, अन्य पिछड़े वर्गो और अल्पसंख्यकों की महिलाओं की इस आरक्षण में फायदा देने का प्रयास करना चाहिए।"

    महिला आरक्षण के अंदर आरक्षण के एक बड़े समर्थक और राजद सांसद रामकृपाल यादव का कहना है कि विभिन्न दलों के प्रतिकूल रवैये के कारण सरकार ने एक बार फिर तय सा कर लिया है कि यह बिल किसी तरह ठंडे बस्ते में चला जाए।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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