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मायावती की राजनीतिक जंग में मुद्दा बना रहा सीबीआई (मायावती सरकार का एक वर्ष पूरा होने पर विशेष)

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    लखनऊ, 11 मई (आईएएनएस)। कांग्रेस के नेतृत्ववाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के साथ मुख्यमंत्री मायावती की राजनीतिक जंग में केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) भी एक मुद्दा रहा। मायावती ने एक साल के कार्यकाल में जितने भी मामले सीबीआई जांच के लिए केन्द्र सरकार को भेजे उनमें से एक को भी सीबीआई ने जांच के लिए अंगीकार नहीं किया।

    लखनऊ, 11 मई (आईएएनएस)। कांग्रेस के नेतृत्ववाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन सरकार के साथ मुख्यमंत्री मायावती की राजनीतिक जंग में केन्द्रीय अन्वेषण ब्यूरो (सीबीआई) भी एक मुद्दा रहा। मायावती ने एक साल के कार्यकाल में जितने भी मामले सीबीआई जांच के लिए केन्द्र सरकार को भेजे उनमें से एक को भी सीबीआई ने जांच के लिए अंगीकार नहीं किया।

    यह एक प्रकार का घात प्रतिघात जैसा परिदृश्य था। मायावती ने अपनी रणनीति और सोच के तहत मामले सीबीआई की तरफ खिसकाए तो कांग्रेसनीत सरकार ने अपनी सतर्कता बरतते हुए इन्हें हाथ तक नहीं लगाया। उल्टे केन्द्रीय गृह राज्यमंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल ने तो यहां तक कह दिया कि मायावती अपनी बला केन्द्र सरकार के मत्थे मढ़ना चाहती हैं।

    मायावती ने जो मामले सीबीआई को संदर्भित किए उनमें सबसे चर्चित था मुलायम सिंह के शासन काल का पुलिस भर्ती घोटाला। सत्ता में आते ही मायावती ने इस मामले को अपनी प्राथमिकताओं में लिया और तेजी से इसकी जांच शुरू की गयी। लगभग 18000 सिपाहियों को बर्खास्त किया गया तथा 23 भारतीय पुलिस सेवा (आईपीएस )के अधिकारियों का निलम्बन हुआ। यह अलग बात है कि बाद में सभी अधिकारियों से माफीनामा लिखवाकर इनका निलम्बन वापस कर लिया गया।

    फिर अचानक मायावती ने इस मामले को सीबीआई जांच के लिए सौंप दिया। माना जाता है कि कांग्रेस और समाजवादी पार्टी (सपा) के बीच सम्भावित गठजोड़ में मक्खी डालने के उद्देश्य से ऐसा किया गया क्योंकि भर्ती मामला मुलायम शासन का था और सीबीआई इसकी जांच करती तो आमने-सामने कांग्रेस और मुलायम आ जाते और फिर आवश्यकता पड़ने पर मायावती को कांग्रेस और सपा में मिलीभगत का आरोप लगाने का भी अवसर मिल जाता।

    मायावती सरकार ने अरबों रुपयों के खाद्यान्न घोटाले की जांच कराने की भी संस्तुति केन्द्र सरकार से की जबकि पहले यह जांच विशेष रूप से गठित एसआईटी (स्पेशल इंवेस्टिगेटिंग टीम) को दी गयी थी। सीबीआई ने यह जांच भी मंजूर नहीं की जबकि राज्य सरकार का कहना था कि इस मामले में कई राज्य और केन्द्रीय एजेंसियां शामिल थी और इसकी जांच सीबीआई द्वारा ही किया जाना ठीक था।

    केन्द्रीय मानव संसाधन मंत्री अर्जुन सिंह के पौत्र के ससुराल वालों ने जब दिग्गज कांग्रेस नेता के परिजनों पर दहेज उत्पीड़न का मामला दर्ज कराया तो मायावती ने इस मामले को सीबीआई को सौंपने में देरी नहीं की हालांकि इसका हश्र भी पहले के मामलों से अलग नहीं रहा।

    फैजाबाद के चर्चित शशि अपहरण-हत्याकाण्ड की जांच भी मायावती ने सीबीआई को देने की संस्तुति की। इस मामले में मायावती सरकार के एक मंत्री आनंदसेन आरोपित थे जिनसे मायावती ने इस्तीफा ले लिया था। इलाहाबाद का करेली मदरसा कांड और बसपा विधायक राजूपाल हत्याकांड की जांच भी सीबीआई से कराने के लिए मायावती ने केन्द्र सरकार को पत्र लिखा।

    बात यह है कि मायावती ने इस सभी मामलों की सीबीआई जांच कराने के लिए जिस तर्क का सहारा लिया वह यह था कि अगर बसपा सरकार ने कार्रवाई की तो उसके विरोधी उस पर राजनीतिक विद्वेषवश कार्रवाई किए जाने का आरोप लगा सकते हैं जबकि सीबीआई द्वारा इन सभी मामलों को हाथ न लगाने के पीछे केंद्रीय गृह राज्य मंत्री श्रीप्रकाश जायसवाल का कहना है कि इन्हें अपनी बला दूसरे के सिर डालने के लिए सीबीआई को सौंपने की कोशिश की गई और ये स्वीकार किए जाने योग्य ही नहीं थे।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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