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अब रूस, जर्मनी, फ्रांस नहीं जाते बनारस के खिलौने

By Staff
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वाराणसी, 22 अप्रैल (आईएएनएस)। अपने पांचवें बजट में वित्त मंत्री पी. चिदंबरम भले ही सांता क्लाज की भूमिका निभाते हुए हर किसी को कुछ न कुछ देते नजर आए हों, लेकिन अंतिम सांस गिन रहे वाराणसी के खिलौना उद्योग को न तो कोई राहत मिली और न ही उससे जुड़े लोगों को कोई तोहफा। लिहाजा आने वाले दिनों में अब इस कुटीर उद्योग के बंद होने के आसार नजर आने लगे हैं।

वाराणसी का कश्मीरीगंज इलाका अपनी उस हुनरमंदी के लिए जाना जाता है, जहां कभी 4000 कारीगर बेजान लकड़ियों को तराश कर उसे ऐसी खूबसूरत शक्ल दिया करते थे, जिसके कायल देसी ही नहीं बल्कि विदेशी भी हुआ करते थे। लेकिन समय की मार देखिए, आज इस क्षेत्र में महज 300 कारीगर रह गए हैं। यहां से होने वाला खिलौना का निर्यात नाम का मात्र रह गया है। अब यह उद्योग अपनी अंतिम सांसें गिन रहा है जो आने वाले दिनों में शायद दम तोड़ दे।

अपनी हुनरमंदी से इन बेजान लकड़ियों में जान फूकने वाले नंदलाल की यह तीसरी पीढ़ी है, जो इन्हीं खिलौनों से अपने परिवार की रोजी-रोटी चलाती रही है। लेकिन आजकल इनके व्यवसाय पर संकट के काले बादल मंडराने लगे हैं, जिससे नंदलाल दुखी ही नहीं, बल्कि इस बात से चिंतित भी हैं कि मेरे बाद इस कला को संभालने वाला कोई नहीं रह जाएगा। क्योंकि अब इस व्यवसाय में दम नहीं रह गया है।

दरअसल नंदलाल अकेले ऐसे कारीगर नहीं हैं, जिनकी जिंदगी इन बेजान खिलौनों में उलझकर रह गई है। बल्कि इनकी तरह ऐसे हजारों कारीगर हैं, जिनकी जिंदगी खूबसूरत खिलौने बनाते बदसूरत हो गई है। इस कुटीर उद्योग की शाख गिरने के पीछे दरअसल कई कारण हैं, पहला झटका इस उद्योग को तब लगा, जब भारत सरकार ने इसमें उपयोग होने वाली कोरैया लकड़ी को प्रतिबंधित कर दिया। जब लकड़ी प्रतिबंधित हो गई तो उसकी गुणवत्ता प्रभावित होने लगी और जब गुणवत्ता प्रभावित हुई, तब विदेशों से ऑर्डर भी कैंसिल होने लगे। लिहाजा इस उद्योग से जुड़े कारीगरों के सामने रोजी-रोटी का संकट आने लगा। अब स्थिति यह है कि कारीगरों की संख्या घटकर 300 रह गई है, जो दिनों दिन गिरती जा रही है।

कभी थोक विक्रेता रहे रमाशंकर बताते हैं कि हमारे बनाये हुए खिलौने रूस, जर्मनी, फ्रांस, हांगकांग सहित दर्जनों देशों में जाया करते थे, लेकिन अब पिछले पांच सालों से इन खिलौनों का सिर्फ गुणवत्ता खराब होने की वजह से निर्यात नहीं हो रहा है, जिस पर सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है।

वाराणसी की इन तंग गलियों की जिस हुनरमंदी के विदेशी कायल थे उसमें रशियन डाल, दाना चुगते मुर्गे, गुड्डे और गुडिया, कैरमबोर्ड मुख्य था। जिसे रूस, जर्मनी, फ्रांस, हांगकांग आदि देशों में भेजा जाता था। लेकिन अब जब स्थिति बदल गई है, तो इसे गली मोहल्लों में और रेलवे स्टेशन पर ही बेचकर संतोष करना पड़ रहा है।

खिलौनों के निर्यातक रहे ब्रह्मानंद का कहना है कि इस उद्योग को सरकार ने तो चौपट किया ही साथ ही चीनी प्लास्टिक के खिलौनों के कारण भी इसकी काफी दुर्दशा हुई। जिस पर सरकार कोई ध्यान नहीं दे रही है। ब्रह्मानंद बताते हैं कि विदेशी बाजारों में वाराणसी के बने लकड़ी के डाल, गुड़िया और गुड्डे पटे रहते थे, लेकिन अब इन खिलौनों को देशी बाजारों से ही संतोष करना पड़ रहा है। ऊपर से दलाली और महाजनों के हस्तक्षेप ने कारीगरों की हालत और खराब कर दी है।

कभी विदेशों में भारतीय हुनरमंदी का परचम लहराने वाले इन कारीगरों का पुरसाहाल लेने वाला अब कोई नहीं है। अगर यही हाल रहा तो हजारों कारीगरों की कारीगरी दम तोड़ देगी और कभी बनारस की पहचान रह चुकी इस खिलौना इंडस्ट्री की पहचान खतरे में पड़ जाएगी।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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