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वेदपाठी संस्कृत विद्यालय में उर्दू व अरबी की शिक्षा

By Staff
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वाराणसी, 20 अप्रैल (आईएएनएस)। गंगा जमुनी तहजीब का शहर बनारस अब सांप्रदायिक सौहार्द की नई मिसाल पेश करने जा रहा है। अब यहां वेदपाठी संस्कृत विद्यालय में उर्दू और अरबी की शिक्षा भी दी जा रही है, जिससे भाषाई आधार पर दो मजहबों के बीच की खाई को पाटी जा सके और दोनों धर्मो की अच्छी बातों को ग्रहण किया जा सके।

वाराणसी के श्री विद्या मठ में बच्चों को चार वेद और उसकी आठ शाखाओं का अध्ययन कराया जाता रहा है, लेकिन अब यहां उर्दू और अरबी भाषा की भी शिक्षा दी जाने लगी है। श्री विद्या मठ के आचार्य स्वामी अविमुक्ते स्वरानंद का कहना है कि ऐसा इसलिए किया गया है जिससे भाषा के आधार पर दो समुदायों के बनी दूरियों को नजदीकियों में तब्दील किया जा सके।

श्री विद्या मठ का संस्कृत विद्यालय पूर्ण रूप से गुरुकुल परम्परा के अनुसार संचालित होता है। इंटर तक की शिक्षा दिए जाने वाले इस विद्यालय में भारतीय सभ्यता और संस्कृति का पाठ पढ़ाया जाता है। यहां विद्यालय की तरफ से छात्रों के रहने और खाने का प्रबंध मुफ्त में किया जाता है।

यहां के छात्र धोती-कुरता पहनते हैं, चंदन लगाते हैं और गले में रुद्राक्ष की माला पहनते हैं। ये छात्र आपस में संस्कृत में ही बातें करते हैं। लेकिन अब ये उर्दू और अरबी भाषा की भी पढ़ाई करने लगे हैं।

श्री विद्या मठ के इस संस्कृत विद्यालय के प्राचार्य शिव शास्त्री के अनुसार उर्दू मुस्लिमों की और संस्कृत ब्राह्मणों की भाषा मानी जाने लगी थी, लेकिन इस पहल से विश्वास है कि आने वाले दिनों में सांप्रदायिक समरसता का भाव पैदा होगा और देश में सांप्रदायिक सौहार्द का वातावरण बनेगा।

श्री विद्या मठ संस्कृत विद्यालय की इस पहल से इसमें पढ़ने वाले बच्चे भी उत्साहित हैं। इस विद्यालय के एक छात्र मनीष शर्मा ने कहा कि उनके ऊपर लगा 'पोंगा पंडित' का ठप्पा हटेगा और उन्हें मुस्लिम धर्मग्रंथों के गूढ़ रहस्यों को भी समझ्झने में आसानी भी हो जाएगी।

वाराणसी के मशहूर समाजशास्त्री काजिम रिजवी का इस संस्कृत वेदपाठी विद्यालय के बारे में कहना है कि इस वेदपाठी विद्यालय की पहल से मुस्लिम समुदाय काफी उत्साहित है और आने वाले दिनों में दीनी तालीम वाले मदरसों में संस्कृत की शिक्षा भी अनिवार्य की जा सकती है।

रिजवी के मुताबिक उदारवादियों को लगने लगा है कि भाषा को किसी खास मजहब और समुदाय में नहीं बांधा जा सकता है। यदि मजहब आपस में बैर करना नहीं सिखाता है, तो भाषाएं भी दिलों को तोड़ती नहीं बल्कि जोड़ती है। वाराणसी के इस गुरुकुल विद्यालय द्वारा उठाया गया यह कदम भी इसी दिशा में एक प्रयास है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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