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सत्तर में भी कायम है समाज को बदलने का जोश

By Staff
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नई दिल्ली, 14 अप्रैल (आईएएनएस)। उम्र के सातवें दशक में अपने सक्रिय जीवन की इतिश्री समझ कर ज्यादातर लोग 'रिटायरमेंट' में दिन गुजारने की अभिलाषा रखते हैं लेकिन उस उम्र में भारतीय मूल के अमेरिकी कृषि वैज्ञानिक और विशेषज्ञ डाक्टर सूरी सहगल युवाओं को भी मात देने वाले जोशो खरोश के साथ एक ऐसे इलाके में विकास की अलख जला रहे हैं जो देश के सबसे पिछड़े इलाकों में गिना जाता है।

डा. सहगल ने पिछले एक दशक में हरियाणा के अत्यंत पिछड़े इलाके मेवात की खुश्क तस्वीर में कई खुशनुमा रंग भर दिए हैं।

सन 1959 में उच्च शिक्षा के लिए देश छोड़ कर गए डा. सहगल ने भले ही लगभग 50 साल का अरसा दुनिया भर के देशों में गुजारा हो, लेकिन उनका दिल आज भी हिंदुस्तान के लिए ही धड़कता है।

भारत में अपने कार्यक्रमों की शुरुआत के बारे में डा. सहगल ने कहा, "यह मेरा घर है इसकी तड़प को मैंने बाहर रह कर महसूस किया है। मेरी हमेशा से इच्छा थी कि मैं अपने देश के लोगों के लिए कुछ कर सकूं।"

मेवात में काम करने के दौरान आई चुनौतियों का जिक्र करते हुए डा. सहगल ने कहा, "भारत जैसे देश में जहां आज भी किसान खेती के लिए इंद्र देवता का मुंह तकते हैं वहां लोगों की मानसिकता बदल पाना आसान काम नहीं है। यहां तो हर कोई हर काम को भगवान के भरोसे छोड़ने का आदी है। कोई भी कार्यक्रम शुरू करने से पहले हम स्थानीय लोगों से बात करते हैं। जाहिर है शुरू में लोग थोड़ा हिचकिचाते हैं लेकिन काम की उपयोगिता को समझकर वो मान जाते हैं।"

दीर्घकालीन विकास की अपनी योजनाओं के बारे में उन्होंने कहा, "दीर्घकालीन विकास की अवधारणा आसान नहीं है। जब हमने अपनी पहली परियोजना शुरू की थी तो हमने सोचा था कि चार सालों तक हमारे सहयोग करने के बाद उस इलाके के लोग इतने सक्षम हो जाएंगे कि वे अपनी जिम्मेदारी खुद उठा सकें लेकिन ऐसा नहीं हो पाया हमें उम्मीद से कहीं ज्यादा लंबे समय तक वहां रुकना पड़ा।"

देश के विकास के लिए अपने आप से किए गए वादे को निभाने के लिए डा. सहगल ने सन 1999 में सहगल फाउंडेशन की स्थापना की। इस फाउंडेशन ने गुड़गांव में एक ग्रामीण शोध और विकास संस्थान खोला है। 'इंस्टीट्यूट आफ रूरल रिसर्च एंड डेवलपमेंट' (इराद) नामक यह संस्थान देश में अपनी तरह का पहला संस्थान है। संस्थान में देश के ग्रामीण क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए 'इंटीग्रेटेड सस्टेनेबल विलेज डेवलपमेंट'(आईएसवीडी) मॉडल यानी दीर्घकालिक समेकित ग्रामीण विकास कार्यक्रम लागू किया जाएगा।

डा. सहगल ने आईएएनएस से एक विशेष भेंटवार्ता में इस संस्थान के बारे में कहा, "हम हर जगह जाकर काम तो नहीं कर सकते लेकिन, अपना ज्ञान और अपने शोध को औरों के साथ बांट तो सकते हैं इसीलिए हमने इराद की स्थापना की। इराद प्रशिक्षण, अनुसंधान और नीति निर्माण तीन स्तरों पर काम करेगा। यहां से प्रशिक्षित हुए लोग दूसरी जगहों पर जाकर काम करेंगे।"

देश में दिनों दिन बढ़ती अरबपतियों की संख्या और किसानों की आत्महत्याओं के विरोधाभास के बारे में डा. सहगल ने कहा, "हम अमीरों को गरीब बनाकर तो गरीबी हटा नहीं सकते इसलिए अमीरों को ही आगे आना होगा। मेरी इच्छा है कि अधिक से अधिक संख्या में अरबपति आगे आएं और रोजगार के अवसर उपलब्ध कराएं ताकि देश से बेरोजगारी कम की जा सके।"

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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