अगले दिशानिर्देशों तक आईआईएम दाखिले टले

IIM
नई दिल्ली 11 अप्रैल: उच्च शिक्षण संस्थानों में अन्य पिछड़े वर्गो को 27 फीसदी आरक्षण दिये जाने के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले पर राजनैतिक दलों की मिलीजुली प्रतिक्रियाएं व्यक्त की गई हैं। इस बीच आईआईएम ने केंद्र से दिशा निर्देश मिलने तक नए दाखिले को टाल दिया है। अधिकांश राजनीतिक दलों ने न्यायालय के इस फैसले का स्वागत किया है लेकिन कुछ ने क्रीमी लेयर को बाहर रखे जाने पर आपत्ति जताई है।

उल्लेखनीय है कि कुछ छात्र संगठनों व यूथ फार इक्वोलिटी जैसे सामाजिक कार्यकर्ताओं के समूहों ने केंद्र सरकार के उस फैसले को उच्चतम न्यायालय में चुनौती दी थी जिसके तहत ओबीसी छात्रों को उच्च शिक्षण संस्थानों में 27 फीसदी आरक्षण की व्यवस्था लागू करने के लिए संसद ने केंद्रीय शिक्षण संस्थान (प्रवेश में आरक्षण) कानून, 2006 को सर्वसम्मति से पारित किया था।

मुख्य न्यायाधीश के. जी. बालाकृष्णन की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संवैधानिक खंडपीठ ने पांच सौ से अधिक पृष्ठों के अपने फैसले में केंद्र सरकार के आरक्षण संबंधी नियम को वैध ठहराया है और कहा है कि इस फैसले से संविधान का उल्लंघन नहीं होता है। खंडपीठ के अन्य सदस्य थे न्यायमूर्ति अरिजीत पसायत, न्यायमूर्ति सी. के. ठक्कर, न्यायमूर्ति आर. वी. रवींद्रन और न्यायमूर्ति दलवीर भंडारी।

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने इस फैसले को ऐतिहासिक बताया है और कहा कि इससे अन्य श्रेणी के छात्रों का हक नहीं मारा जाएगा। उन्होंने छात्रों को आश्वस्त किया कि देश के सभी केंद्रीय संस्थानों में सीटों की संख्या बढ़ाई जाएगी।

सर्वोच्च न्यायालय के इस ताजा फैसले के बाद देश के सभी छह भारतीय प्रबंधन संस्थानों (आईआईएम) ने नये दाखिले को सरकार के अगले दिशा-निर्देश तक टाल दिया है। सरकारी दिशा निर्देशों के जारी होने के बाद सभी आईआईएम में 1500 ओबीसी छात्रों के दाखिले का द्वार खुल जाएगा। आरक्षण की यह सुविधा लागू होने के बाद देश के सभी छह भारतीय प्रबंधन संस्थानों और सभी भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आईआईटी) में कुल 49.5 फीसदी सीटें आरक्षित हो जाएंगी। अभी तक इन संस्थानों में 22.5 फीसदी सीटें आरक्षित थी।

आरक्षण के दायरे से क्रीमी लेयर को बाहर रखने फैसला सुनाते हुए अदालत ने कहा कि क्रीमी लेयर की परिभाषा आठ सितंबर 1993 के भारत सरकार के आधिकारिक मानकों के आधार पर निर्धारति होगी। उल्लेखनीय है कि अनुसूचित जाति व अनुसूचित जनजाति में क्रीमी लेयर का कोई जिक्र नहीं है। अदालत ने फैसले में यह भी कहा है कि इस कानून को लागू किए जाने के बाद हर पांच साल पर इसके प्रभाव की समीक्षा की जानी चाहिए।

इस बीच, अधिकतर राजनीतिक दलों ने सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्वागत किया है। जबकि कुछ राजनीतिक दलों ने आरक्षण के दायरे से क्रीमी लेयर को बाहर किये जाने के फैसले पर निराशा जताई है।

चुनावी तैयारियों के साल में हुए इस फैसले से सबसे ज्यादा खुश कांग्रेस पार्टी है। अदालत के फैसले पर अपनी प्रतिक्रिया देते हुए कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने कहा, "यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा। न्यायालय ने बेहद समझदारी से बीच का रास्ता अख्तियार किया है।"

भारतीय जनता पार्टी ने भी अदालत के फैसले का स्वागत किया है। उसके प्रवक्ता रविशंकर प्रसाद ने कहा कि अल्पसंख्यक संस्थानों में भी आरक्षण की यह सुविधा लागू की जानी चाहिए। उन्होंने कहा कि यह संवैधानिक खंडपीठ का फैसला है इसलिए इसके सभी पहलुओं का अध्ययन करने के बाद ही पार्टी अपनी विस्तृत प्रतिक्रिया देगी।

वहीं दूसरी ओर वाम दलों, जनता दल युनाईटेड, राष्ट्रीय जनता दल और लोक जनशक्ति पार्टी ने क्रीमी लेयर को आरक्षण से वंचित रखने पर खासी आपत्ति जताई है।

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