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यूसुफ और श्याम के लिए बौनी हैं मजहबी दीवारें

By Staff
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झांसी, 6 अप्रैल (आईएएनएस)। लाशें ढोना उनका कर्म है और अंतिम संस्कार करना इबादत। यूसुफ मौलाना और पंडित श्याम सुंदर शर्मा के जीवन का मकसद ही यही बन गया है। जाति और धर्म की दीवारें उनके लिए कोई मायने नहीं रखती क्योंकि यह उन लोगों ने खड़ी की है जो इसके जरिए कुछ हासिल करना चाहते हैं।

झांसी, 6 अप्रैल (आईएएनएस)। लाशें ढोना उनका कर्म है और अंतिम संस्कार करना इबादत। यूसुफ मौलाना और पंडित श्याम सुंदर शर्मा के जीवन का मकसद ही यही बन गया है। जाति और धर्म की दीवारें उनके लिए कोई मायने नहीं रखती क्योंकि यह उन लोगों ने खड़ी की है जो इसके जरिए कुछ हासिल करना चाहते हैं।

बुन्देलखंड के झांसी में ये वो दो लोग हैं जिनका मजहब अलग-अलग है मगर मकसद एक है और वह है जिनका दुनिया में कोई नहीं, उन्हें सम्मानजनक विदाई देना। यूसुफ चार दशक और श्याम सुन्दर दो दशक से अज्ञात तथा लावारिस लाशों का अन्तिम संस्कार करते आ रहे हैं। मृतक जिस जाति का होता हैं उसका अंतिम संस्कार वे उसी रीति रिवाज के मुताबिक करते हैं।

यूसुफ और श्याम सुन्दर दोनो के भरे पूरे परिवार हैं, उनके लिए रोजी रोटी का इन्तजाम करने के बाद वे खुद अपने लिए कुछ करना चाहते हैं जो उन्हें सुकून दे। दोनों का धर्म अलग अलग होने के बावजूद उनमें कभी टकराव नहीं होता। ऐसा इसलिए क्योंकि उनके लिए धर्म से ऊपर सेवा है। वे दोनों अपने साथ जुड़ी कुछ घटनाओं के चलते लाशों के दोस्त बन गए हैं।

यूसुफ मौलाना टैम्पो चलाते हैं। बात अब से चार दशक पहले की है जब उन्हें पुलिस वाले लाशें ढोने के लिए ले जाया करते थे। उसके बाद उन्हें लगा कि ये काम दूसरों के कहने पर क्यों किया जाए इसलिए वे खुद इसी काम में जुट गए। सुबह के वक्त वे सवारियां ढोते हैं तो शाम के वक्त लाशों को अंतिम विदाई देते हैं। श्याम सुन्दर भी इसी तरह इस काम को अपना धर्म मानने लगे।

दोनों बताते हैं कि कई ऐसी लाशें आती हैं जिनकी तरफ लोग देखने से भी डरते हैं और दूर भागते हैं, मगर उन्हें ऐसी लाशों से घृणा नहीं होती। वे मानते हैं कि यह ईश्वर की दी हुई काया है और इसका हर वक्त सम्मान होना होना चाहिए। इसीलिए वे इस काम को अपना धर्म मानते हैं। हिन्दू लाश को जलाते हैं अथवा नदी में प्रवाहित कर देते हैं और मुस्लिम को दफना देते हैं।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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