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मुस्लिम महिलाएं भी करा रहीं नसबंदी

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Muslim Women
वाराणसी, 3 अप्रैलः इस्लाम में परिवार नियोजन की इजाजत भले ही न दी गई हो लेकिन वाराणसी के लल्लापुरा इलाके की मुस्लिम महिलाओं ने महंगाई और गरीबी से तंग आकर अब चोरी-छिपे से ही सही नसबंदी कराना भी शुरू कर दिया है।

जनसंख्या विस्फोट का असल नजारा देखना हो तो आपको इस मुस्लिम बस्ती में आना पड़ेगा, जहां एक छोटे से कमरे में दर्जन भर लोग न सिर्फ एक साथ रहने को मजबूर हैं' बल्कि बंटवारा दर बंटवारा ने इनके रहन-सहन के स्तर में कोढ़ में खाज का काम किया है।

हालत ऐसे हुए हैं कि गरीब मुसलमानों के यहां दो-दो दर्जन लोग एक छोटे से कमरे में न सिर्फ रहने को मजबूर हैं बल्कि दो वक्त की रोटी भी उन्हें मयस्सर नहीं हो पा रही है। तो कहना न होगा की दर्जनों बच्चे पैदा करने की त्रासदी पुरुषों से ज्यादा महिलाओं को झेलना पड़ती है। इसलिए महिलाओं ने अब परिवार नियोजन का सहारा लेना शुरू कर दिया है।

लल्लापुरा इलाके की शाही दुल्ली बेगम का परिवार पूरे मुहल्ले में बड़ी इज्जत की नजरों से देखा जाता है क्योंकि इनका बड़ा बेटा अच्छे स्कूल में पढ़ता है और छोटी बेटी डाक्टर बनना चाहती है। पेशे से बुनकर इस परिवार के लिए यह मंजिल सिर्फ इसलिए दूर नहीं है क्योंकि इन्होंने दो बच्चे के बाद परिवार नियोजन का सहारा लिया और आज यह परिवार पूरे मुहल्ले में सबसे सुखी माना जाता है।

मुस्लिम समाज में इस क्रांतिकारी कदम को उठाने वाली दुल्ली बेगम अकेले ऐसी महिला नहीं हैं, जिन्होंने मजहब की दकियानूसी दीवार को गिराने की कोशिश की है बल्कि इस मुहल्ले की दर्जनों ऐसी मुस्लिम महिलाएं हैं, जिन्होंने पुरुष वर्चस्व की वर्जनाओं को तोड़ते हुए न सिर्फ नसबंदी कराई है बल्कि अब वे अपने निर्णय को सही ठहराने से भी डर नहीं रही हैं।

इन्हीं में से एक हैं साहिबा (काल्पनिक नाम) जिन्होंने एक लड़की के बाद मायके जाकर नसबंदी सिर्फ इसलिए करा ली क्योंकि उनके पति का बुनकरी का धंधा मंदा हो जाने से घर का खर्च चलना मुश्किल हो गया था। साहिबा हाथ जोड़कर कहती हैं कि उसका नाम पता चल जाएगा तो उसे विरादरी से निकाल दिया जाएगा और उसके पति उसका जीना हराम कर देंगे।

नाजनीन और नजमा जो बीए की छात्रा हैं उन्होंने दो शादियों के प्रस्ताव सिर्फ इसलिए ठुकरा दिए क्योंकि उनका होने वाला पति बच्चों को अल्ला ताला का करम मानने वाला था। उनका मानना है कि दो से ज्यादा बच्चे परिवार के विकास में बाधक तो हैं साथ ही वे देश की तरक्की में भी बाधक बनते हैं।

इसी मुहल्ले की ही जमिलुन्निसा जिसके पास एक कमरा है उसके पांच बच्चे हैं और छठा पेट में है। रिजवाना के हिस्से में भी एक ही कमरा है जिसमें पांच बच्चों के साथ गुजारा बड़ा मुश्किल होता है। लल्लापुरा की ही जूही बेगम के छह बच्चे हैं जो झ्रुझलाकर आंखों में आंसूभरकर कहती हैं कि तंगहाली की इस जिंदगी से तो अच्छा है कि हम बे औलाद ही रहते।

ऐसा नहीं की गरीबी और तंगहाली की इस जिंदगी से पुरुष समाज इत्तेफाक नहीं रखता। बड़ा बाजार के शमीम अंसारी बशीर बद्र के एक शेर से अपनी स्थिति का हाल बताते हुए कहते हैं कि जिंदगी कब्र से भी कम जगह दी तूने पांव फैलाता हूं तो दीवार से सिर टकराता है, लेकिन इस्लाम से गद्दारी नहीं कर सकता हूं।

एक टी वी चैनल में काम करने वाले फरहान अंसारी का कहना है कि इस्लाम भी उतने ही बच्चे पैदा करने की इजाजत देता है जितने अच्छी तरह से पाले जा सकें। फरहान भाई का कहना है कि धर्म इंसानों के लिए बनाए गए थे न की इंसान धर्म के लिए। इसलिए आबादी बढ़ने में इस्लाम की कोई भूमिका नहीं है।

कहते हैं कि इंसान का गरीबी में पैदा होना पाप नहीं है बल्कि गरीबी में मरना सबसे बड़ा अभिशाप है। वाराणसी की मुस्लिम महिलाएं अब यह बखूबी समझ चुकी हैं कि कठमुल्लों की दीनी बातें न तो उनके हित में है और न ही आने वाली पीढ़ी के। इसलिए वे अब न सिर्फ परिवार नियोजन को अपना रही हैं बल्कि शादी में भावी पति के सामने दो बच्चे पैदा करने की शर्ते भी रख रही हैं।

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