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नसबंदी कराइए, बंदूक का लाइसेंस पाइए

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शिवपुरी, 1 अप्रैल। कई बार अनोखे तरीके योजना की सफलता में मील का पत्थर साबित होते हैं। ऐसा ही कुछ मध्य प्रदेश के शिवपुरी जिले में हुआ है, जहां नसबंदी कराने पर बंदूक का लाइसेंस देने की पहल ने सफलता के झंडे गाड़ दिए हैं। नसबंदी से परहेज करने वाला पुरुष वर्ग बंदूक की चाहत में परिवार नियोजन के लिए खुद आगे आने लगा|

चंबल के इलाके में परिवार नियोजन की बात करना तक पौरुष के खिलाफ माना जाता है। पुरुष वर्ग की इसी मानसिकता का नतीजा है कि शिवपुरी के अलावा भिंड मुरैना में पुरुष नसबंदी का प्रतिशत काफी कम रहा है। इस इलाके में पुरुष अपनी बजाय महिलाओं की नसबन्दी कराने को अपनी शान समझता है। एक तरफ महिलाओं में बीमारी का जोर और सामाजिक असमानता ने यहां की स्थितियां चिंताजनक बना दी है।

शिवपुरी में पुरुष नसबंदी के प्रति रूझान बढ़ाने के लिए कई तरह के अभियान चले मगर सफलताएं कोसों दूर रहीं। पिछले आठ साल के आंकड़े बताते हैं कि नसबंदी ऑपरेशन का जोड़ दहाई तक नहीं पहुंच पाया है। इसके बावजूद प्रदेश का स्वास्थ्य अमला प्रचार अभियान में लाखों रुपए बहाता रहा।

कलेक्टर मनीष श्रीवास्तव ने आईएएनएस को बताया कि जब वे शिवपुरी आए तो उनके सामने भी पुरूषों को नसबंदी के लिए तैयार करना किसी चुनौती से कम नहीं था। इसके लिए उन्होंने जिले की मानसिक स्थिति का आंकलन किया और मनोविज्ञान को जाना। यहां के लोगों के लिए बंदूक स्टेटस सिंबल है, बस यहीं से उन्होंने एक नए प्रयोग को जन्म दिया। जितने ऑपरेशन दशक भर में नहीं हुए उससे कहीं ज्यादा पिछले दो माह में हो गए हैं। डेढ़ सौ से ज्यादा लोग अब तक नसबन्दी करा चुके हैं।

श्रीवास्तव कहते हैं कि बन्दूक का लाइसेन्स पाने के लिए जिले में लोग परेशान रहते हैं और वे अपने कन्धे पर बन्दूक टांगने के लिए किसी भी हद तक जा सकते हैं। लोगों की इसी चाहत ने उनके रास्ते को आसान बना दिया।

एक तरफ लोग लाइसेन्स चाहते हैं तो दूसरी ओर प्रशासन पुरूष नसबन्दी का आंकडा बढाने को लेकर चिन्तित है। बस इसी बात ने दोनों को एक दूसरे की ओर बढाया और पुरूष नसबन्दी की रफ्तार में तेजी आ गई। लाइसेन्स उन्हीं लोगों को दिए जा रहे हैं जो निर्धारित शतरें को पूरा करते हैं। अभी तक दो दर्जन लोगों को बन्दूक के लाइसेन्स दिये जा चुके हैं।

प्रशासन की इस अनोखी पहल का मध्यम वर्ग तो लाभ उठा ही रहा है और गरीब तबका भी मध्यम वर्ग की राह पर चल पड़ा है। जो काम लाखों रुपये खर्च करने के बाद भी नहीं हुआ वह बन्दूक का लाइसेन्स दिए जाने की पहल ने कर दिखाया। इसीलिए कहा भी जाता है कि साधनों से ज्यादा असर लोगों की जरूरत करती है।

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