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मजाज या आवारगी का जिंदा दस्तावेज

By Staff
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लखनऊ, 30 मार्च (आईएएनएस)।

लखनऊ, 30 मार्च (आईएएनएस)।

कुछ तबीयत ही मिली थी ऐसी

चैन से जीने की सूरत न हुई

जिसे चाहा उसे अपना न सके

जो मिला उससे मोहब्बत न हुई

ये और ऐसे ही न जाने कितने बेजोड़ कलाम पेश करने वाले असरार-उल-हक मजाज की याद में भारत सरकार ने शुक्रवार को डाक टिकट जारी कर उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया लेकिन कम ही लोगों का मालूम है कि मजाज लखनवी के नाम से मशहूर इस शायर के साथ ताउम्र कैसी बीती। वह खुद अपनी रौ में दीवाने हुए तो उनके अपने बेगाने। लोगों को मालूम होना चाहिए कि आज के नामचीन शायर जावेद अख्तर मजाज के भांजे हैं।

मोहब्बत की नाकामी ने अगरचे उनके कलाम में निखार पैदा किया तो नाकामी के दर्द ने उन्हें शराब की ऐसी अंधी गली में ढकेल दिया वहां से वह कभी लौट नहीं सके और फिर 6 दिसम्बर 1955 की एक सर्द रात में खुले आसमान के नीचे बेहोशी के आलम में पड़े इस शायर की दिमागी नस फटने के बाद लखनऊ के बलरामपुर हास्पिटल में मौत हो गयी।

मजाज का जन्म 1909 में बाराबंकी जिले के रूदौली कस्बे में हुआ था और लखनऊ के अमीनाबाद हाई स्कूल में प्रारम्भिक शिक्षा ग्रहण करने के बाद वह आगरा के सेंट जोंस कालेज में पढ़ने गए वहां उनकी मुलाकात फानी बदायूंनी से हुया जिन्हें बाद में मजाज अपना उस्ताद मानने लगे थे।

इसके बाद अलीगढ़ विश्वविद्यालय पहुंच कर मजाज ने बीए किया। यही वह समय था जब उनके नाम का डंका बजने लगा। अलीगढ़ गर्ल्स कालेज की लड़कियों में उनकी शायरी को लेकर हद दर्जे की दीवानगी देखी जाती थी।

मजाज का अगला पड़ाव दिल्ली था जहां वह रेडिया मैगजीन आवाज के एडिटर बनकर पहुंचे लेकिन एक शादीशुदा लड़की से मोहब्बत कर बैठे। एक साल में ही वह लौटकर लखनऊ आ गए और यहां शराब से उनकी ऐसी टिकाऊ दोस्ती हुयी जो उनकी मौत के साथ ही छूट सकी। उन्हें ज्यादा शराब पीने से नर्वस ब्रेक डाउन हुआ और हालत पागल जैसी हो गयी।

लम्बे इलाज के बाद जब वह ठीक हुए तो शादी का इरादा किया लेकिन अब एक बार पागल हो चुके व्यक्ति को कोई लड़की देने को तैयार नहीं था। मजाज ने अब मुम्बई का रुख किया और बाम्बे इनफारमेशन में नौकरी कर ली। मन फिर भी नहीं लगा और लौटकर लानऊ विश्वविद्यालय में एलएलबी में दाखिला लिया।

इसी बीच उन्होंने सरदार जाफरी के साथ मिलकर नया आदाब मैगजीन निकाली। फिर दिल्ली पहुंचे और हार्डिंग लाइब्रेरी में असिस्टेंट लाइब्रेरियन की नौकरी कर ली। अब हालत यह हो चुकी थी कि धनवानों की महफिल में मजाज को शराब पिलाकर उनकी शेरो शायरी का लुत्फ उठाया जाता और फिर जब दिल भर जाता तो उन्हें वापस भेज दिया जाता।

लखनऊ में ऐसी ही एक महफिल उनकी आखिरी महफिल साबित हुई जब उनके कद्रदान उन्हें सर्द रात में छोड़कर चले गए और खुद मजाज ने भी मानो तय कर लिया कि बस अब और नहीं और वह खुद इस दुनिया को छोड़कर चले गए।

खुद उन्होंने अपने साथियों से कहा-

मेरी बरबादियों के हमनशीनों

तुम्हें क्या खुद मुझे भी गम नहीं है

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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