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    नियाजी का समर्पण उनकी मजबूरी थी : जैकब

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    ढाका, 29 मार्च (आईएएनएस)। भारतीय सेना के लेफ्टिनेंट जनरल (सेवानिवृत्त) जे. एफ. आर. जैकब ने खुलासा किया है कि 1971 के भारत-पाक युद्ध के बाद बांग्लादेश की आजादी के समय पाकिस्तानी फौज के तत्कालीन जनरल ए. ए. के. नियाजी का समर्पण उनकी मजबूरी थी।

    बांग्लादेश सेना के प्रमुख जनरल मोईन यू. अहमद के न्यौते पर बांग्लादेश गए लेफ्टिनेंट जनरल जैकब ने घटना के 36 वर्ष से भी अधिक समय बाद यह खुलासा किया है।

    उन्होंने कहा कि पहले-पहल जनरल नियाजी बांग्लादेशी जनता के समक्ष समर्पण करना नहीं चाहते थे। वह केवल संयुक्त राष्ट्र के अधीन युद्धविराम के पक्ष में चर्चा करने चाहते थे।

    जैकब का कहना था कि लंबी जद्दोजहद के बाद ही जनरल नियाजी समर्पण को तैयार हुए थे। उन्होंने कहा कि तीन बार पूछे जाने के बाद भी जनरल नियाजी ने जब समर्पण पत्र स्वीकार नहीं किया तो उन्होंने स्वयं ही उसे स्वीकृत मान लिया था।

    लेफ्टिनेंट जनरल जैकब ने बताया कि उस समय उनका कार्य केवल समर्पण कार्य संपन्न कराना था। भारत सरकार की ओर से सिर्फ समर्पण कार्य संपन्न कराने का ही आदेश उन्हें मिला था।

    उन्होंने बाद में जनरल नियाजी द्वारा दिए गए इस बयान को सरासर बेबुनियाद बताया कि उन्हें ब्लैकमेल किया गया था।

    उन्होंने माना कि तत्कालीन बांग्लादेशी सेना प्रमुख जनरल एम.ए.जे. ओस्मानी का उस समय वहां उपस्थित न होना भी एक दुखद घटना थी।

    जैकब के अनुसार जनरल ओस्मानी उस समय देश के एक दूर-दराज क्षेत्र में थे और उन्हें लेने गया हेलीकॉप्टर हमले का शिकार हो गया और इस कारण वह समय पर नहीं पहुंच सके थे।

    इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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