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आस्थाओं का नगाड़ा नहीं बजाया जाना चाहिए : रघु राय

By Staff
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नई दिल्ली, 28 मार्च (आईएएनएस)। तस्वीर का लंबे अंतराल तक जिंदा रहना ही उसकी महत्ता कायम करता है। यह जरूरी है कि उसमें घटना और विचार सार्थक और विश्वसनीय ढंग से अंकित हों। यह कहना है देश के ख्याति प्राप्त फोटोग्राफर रघु राय का।

नई दिल्ली, 28 मार्च (आईएएनएस)। तस्वीर का लंबे अंतराल तक जिंदा रहना ही उसकी महत्ता कायम करता है। यह जरूरी है कि उसमें घटना और विचार सार्थक और विश्वसनीय ढंग से अंकित हों। यह कहना है देश के ख्याति प्राप्त फोटोग्राफर रघु राय का।

इन दिनों राजधानी के नेशनल गैलरी आफ माडर्न आर्ट में रघु राय द्वारा कैमरे में कैद की गई तस्वीरों की प्रदर्शनी लगी है। इन तस्वीरों को गत 40 वर्षो के दौरान उन्होंने उतारा है। इस मौके पर आईएएनएस से खास बातचीत में उन्होंने कहा, "यहां जो तस्वीरें लगी हैं वह किसी एक ही विचार को प्रस्तुत नहीं करती हैं लेकिन जाहिर है कि जो लम्हा इन तस्वीरों में कैद है वह मुझे बेहद अजीज है।"

शहरी बदलाव और पारिवारिक संबंधों पर आधारित कई तस्वीरें यहां लगी हैं। आज जब परिवार में बुजुर्गो को लेकर बेरुखी के किस्से बड़ी तादाद में सामने आने लगे हैं ऐसे में वर्ष 1969 में रघु राय द्वारा उतारी गई माई फादर एण्ड माई सन नामक तस्वीर उस रिश्ते की गहराई का एहसास कराता है।

उन्होंने कहा, "यकीनन समाज बदला है। परिवार के स्वरूप में तबदीलियां आई हैं। लोगों के पास रुपये भी काफी मात्रा में आए हैं लेकिन वह पहले से अधिक असभ्य हो गए हैं। कुछ लोग अमीर तो हुए पर अंदर से बेहद गरीब हो गए हैं। हमलोग यह भूलते जा रहे हैं कि रुपये से सभ्यता नहीं खरीदी जा सकती है।"

सांस्कृतिक व धार्मिक आस्थाओं और रिवाजों पर खींची गई तस्वीरों के संबंध में उन्होंने कहा, "हिन्दुत्व, इस्लाम या किसी दूसरे-तीसरे धर्मो के आधुनिक आंदोलनों ने हंगामे के सिवा मानवता का क्या भला किया? मैं धर्म से जुड़े मुद्दे को नितांत निजी मानता हूं। आस्थाओं का नगाड़ा नहीं बजाया जाना चाहिए।

आगे इस संबंध में उन्होंने कहा, "मैंने बनारस के गंगा घाटों या किसी दूसरे धार्मिक-सांस्कृतिक स्थलों की जो तस्वीरें कैमरे में कैद की हैं उसमें आमजन के मन में उन स्थलों के प्रति लगाव के क्षण और वस्तुस्थिति को कैद करने की कोशिश भर है।"

रघु राय कला के नाम पर परोसी जा रही अश्लीलता से खासे नाराज हैं। उन्होंने कहा कि हिन्दी सिनेमा आज जहां पहुंचा है और इसमें अश्लीलता जिस हद तक बढ़ी है वह कौन सा धर्म और कौन सी हिन्दुस्तानी संस्कृति है। खैर! इजहारे तहरीर का अपना अंदाज हो सकता है लेकिन जो सच है मैं उसे दर्शाने की कोशिश करता हूं। लादने की कोशिश कदापि नहीं करता।

बड़ी ईमानदारी और साफगोई के साथ वह कहते हैं कि मैं कभी भी पूरे हिन्दुस्तान को अपने कैमरे में कैद करने का दावा नहीं करता। कर ही नहीं सकता! हां मैंने कुछ लम्हों को जरूर कैद किया है।

इंडो-एशियन न्यूज सर्विस।

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