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आर्थिक रुप से अब भी पिछड़ा है अत्तराखंडः रिपोर्ट

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Uttarakhand
देहरादून, 8 मार्चः उत्तराखड में गत पांच वर्षो में 49 प्रतिशत विधायक निधि का उपयोग नहीं होने से विकास कार्य संबंधी इस योजना का उदेश्य पूरा नहीं हो सका है. भारत के नियंत्रक महालेखा परीक्षक के वर्ष 2007 के प्रतिवेदन के अनुसार वर्ष 2002 से 2007 की अवधि में चार चयनित जिलो अल्मोड़ा चमोली देहरादून और टिहरी में विकास के कुल स्वीकृत 13676 कामों में से 7224 ही पूरे हो सके.

14735 काम प्रगति पर थे और 1717 कार्य प्रारम्भ ही नही हुए. रिपोर्ट में कहा गया है कि कार्य प्रस्तावो को चिन्हित कर स्वीकृत करने में विधायको के स्तर पर देरी के कारण धन के उपयोग समय पर नहीं हो सका. देहरादून जिले में कार्य की प्रगति विशेष रुप से धीमी थी. कार्यो को सम्पादित करने के लिए जिम्मेवार जिला ग्रामविकास अभिकरण के पास जिले का वर्षवार विवरण उपलब्ध नहीं था. वर्ष 2006-07 मे इस जिले में स्वीकृत 922 कार्यो में से मात्र चार काम ही उस वर्ष पूरे किये गये.

रिपोर्ट के अनुसार चयनित जिलो में दिशानिर्देशो के प्रावधान के विपरीत 508 करोड़ 62 लाख रुपये की लागत के ऐसे 710 कार्य जो अनुमन्यता की श्रेणी में नहीं आते विधायको द्वारा प्रस्तावित किये गये और अभिकरण ने उन्हे स्वीकृति भी दी. दिशानिर्देशो के अनुसार किसी विशेष निर्वाचन क्षेत्र के लिए अवमुक्त धन को उसी क्षेत्र में विकास कार्यो के लिए व्यय किया जाना चाहिए लेकिन देहरादून में 32 लाख 30 हजार रुपये के कार्य अन्य जिलो को अवमुक्त किये गये.

इसी के साथ रिपोर्ट में कहा गया है कि निष्पादित कार्यो की गुणवत्ता नियंत्रण की कोई सुनिश्चित प्रणाली नहीं थी. योजना के प्रारम्भ से न तो राज्यस्तर पर कोई अनुश्रवण समिति गठित की गयी और न ही योजना का मूल्याकंन किया गया था. इसके अलावा आन्तरिक नियंप्ण प्रणाली भी प्रभावी नहीं थी. ग्रामीण विकास अभिकरण द्वारा योजना का तुलनापत्र तैयार नहीं किये जाने से चार्टड एकाउन्टेन्ट द्वारा लेखों का आडिट नहीं किया गया था.

उल्लेखनीय है कि राज्य में विधायक निधि योजना वर्ष 1998-99 में उस समय लागू की गयी थी जब यह उत्तर प्रदेश का एक हिस्सा था. शुरु में प्रत्येक विधायक के लिए पचास लाख रुपये इस निधि में आवंटित किये गये. बाद में वर्ष 2006-7 मे इसे बढ़ाकर सवा करोड़ रुपये कर दिया गया.

योजना का उददेश्य था कि विधायको को अपने क्षेत्र में स्थानीय आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए विकास कार्यों को प्रस्तावित करने के लिए सक्षम बनाया जाये. इसके साथ ही स्थायी प्रकृति की सम्पतियो को जनता के उपयोग के लिए सृजित करने पर जोर दिया जा सके.

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