शायद भारत को न मिले गोर्शकोव

अखबार के मुताबिक रुसी सैन्य उद्योग परिसर के एक सूत्र ने रुसी सूचना सेवा आरबीसी को बताया कि रुस और भारत विमान वाहक पोत की मरम्मत को लेकर 2004 के अनुबंध की शतो में बदलाव पर एक समौते की तैयारी कर रहे हैं.
इस नए अनुबंध के तहत भारत को यह युद्धपोत बिना अतिरिक्त राशि के तब मिलेगा जब इसे सेवमाश शिपयार्ड में भारतीय नौसेना के अनुरुप आधुनिकीकृत किया जाये. मूल अनुबंध डेढ अरब डालर का था खबरों के मुताबिक बाद में रुस ने 1.2 अरब डालर की अतिरिक्त राशि की मांग कर दी.
गैर आधिकारिक सूचना के मुताबिक अनुबंधन की राशि एक अरब डालर तक बढाए जाने को लेकर दोनों पक्षों के बीच बातचीत हो रही है. सूत्र के अनुसार अगर भारतीय पक्ष इसके लिए तैयार नहीं हुआ तो एडमिरल गोर्शकोव संभवत रुसी नौसेना को बेच दिया जाएगा.
एडमिरल गोर्शकोव 1978 में बना था तब इसका नाम बाकू था. लेकिन 1991 में इसे एडमिरल गोर्शकोव का नाम दिया गया. इस विमान वाहक पोत पर भारत-रुस संयुक्त उपक्रम के तहत विकसित ब्रह्मोस प्रक्षेपास्त्र तथा रुसी या इजरायली वायु प्रतिरक्षा प्रणाली लगायी जानी है.
युद्धपोत को इस वर्ष अगस्त तक भारत को सौंपे जाने का कार्यक्रम था लेकिन अब इसके 2012 के पहले मिल पाने की संभवना नहीं है. रुस ने कहा है कि इसका आधुनिकीकरण तथा समुद्री संचालनात्मक परीक्षणों में कम से कम चार साल का समय और लगेगा.


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