बाबा आमटे नहीं रहे

उनके बेटे ने बताया कि वे कैंसर से जूझ रहे थे. देश के सबसे सम्मानित सामाजिक कार्यकर्ताओं में से एक बाबा आमटे ने अपना पूरा जीवन कुष्ट रोग से पीड़ितों की सेवा में समर्पित कर दिया था. इतना ही नहीं उन्होंने कुष्ट रोग के इलाज के लिए उन्होंने अपने शरीर पर डाक्टरों को प्रयोग करने की छूट दे रखी थी.
बीते दो दशकों से बाबा आमटे का नाम शांति और न्याय के लिए लड़ने वाले इनसान का प्रतीक बन गया था. उन्होंने लंबे समय तक आदिवासियों के अधिकारों के लिए लड़ाई लड़ी और सरदार सरोवर जैसे बड़े बांधों की जबरदस्त मुखालफत की.
कानून की पढ़ाई करने वाले आमटे का जन्म एक धनी ब्राह्णण परिवार में हुआ था. सन 1985 में बाबा आमटे ने कश्मीर से कन्याकुमारी तक भारत जोड़ो आंदोलन चलाया था. इस आंदोलन को चलाने के पीछे उनका मकसद देश में एकता की भावना को बढ़ावा देना और पर्यावरण के प्रति लोगों का जागरुक करना था.


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