माकपाः परमाणु समझौता देशहित के खिलाफ
नई दिल्ली, 29 नवंबरः भारत-अमरीका परमाणु समझौते पर वामदलों ने एक बार फिर सरकार को आगाह किया है कि यह समझौता देश की आर्थिक, सामरिक और स्वतंत्र विदेश नीति के लिये घातक होगा इसलिये इस पर अमल की ओर बढ़ने से पहले उसे संसद की राय को मानना चाहिये.
भारत-अमरीका असैन्य परमाणु समझौते पर आज लोकसभा में नियम 193 के तहत चर्चा की शुरुआत करते हुये मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (माकपा) के पचंद पाल ने कहा कि वामदलों ने सरकार को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के पास जाने की अनुमति इसलिये दी कि वह वहां से निर्बाध इंधन आपूर्ति का पक्का आश्वासन लेकर आये. उन्होंने कहा कि समझौते में अब तक जो भी प्रावधान किये गये हैं उनमें इधन की लगातार और निर्बाध आपूर्ति के बारे में कोई स्पष्ट उल्लेख नहीं है.
पचंद पाल ने वामदलों के रुख को एक बार फिर स्पष्ट करते हुये कहा कि वह इस समझौते के खिलाफ हैं और सरकार से इस मुद्दे पर संसद के रुख को समझने और उसपर अमल करने का आग्रह करते हैं.उन्होंने कहा कि अमरीका के साथ परमाणु समझौते का देश के परमाणु कार्यक्रम, आर्थिक विकास और उसकी स्वतंत्र विदेश नीति सभी पर बुरा असर पड़ेगा. उन्होंने कहा कि इस समझौते पर अमरीका के मुख्य वार्ताकार निकोलस बर्न्स ने स्वंय कहा है कि समझौते के बाद भारत के 90 प्रतिशत नागरिक परमाणु संयंत्र अमरीकी निगरानी में आ जायेंगे. उन्होंने चेताया कि सरकार को अमरीका के दबाव में नहीं आना चाहिये क्योंकि यह केवल परमाणु समझौते का प्रश्न ही नहीं है बल्कि अमरीका यहां बैंक. वित्तीय सेवाओं. खुदरा और हथियारों के बाजार में छा जाना चाहता है.
वहीं कह हुई चर्चा में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के नहीं बोलने से नाराज विपक्ष ने इसके विरोध में लोकसभा से वाकआउट किया. विदश मंत्री प्रणव मुखर्जी ने बाद में विपक्ष के इस व्यवहार की आलोचना की.
भारत-अमरीका परमाणु समझैते पर हुई चर्चा का उत्तर देने के लिये जब उपाध्यक्ष चरणजीत सिहं अटवाल ने मुखर्जी का नाम पुकारा तो नेता विपक्ष लालकृष्ण आडवाणी और सदन में भारतीय जनता पार्टी संसदीय दल के उपनेता विजय कुमार मल्होत्रा ने इसपर नाराजगी जताई. भाजपा के वाकआउट की आलोचना करते हुये मुखर्जी ने कहा कि भाजपा संसदीय लोकतंत्र की मर्यादाओं और गरिमा का बार-बार उल्लंघन करती रहती है इसलिये उन्हें विपक्ष के इस कदम से कोई आश्चर्य नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि परमाणु समझौते के बारे में प्रधानमंत्री सदन में कई बार बयान दे चुके हैं अत. भाजपा की यह मांग की चर्चा का उत्तर प्रधानमंत्री ही दें. उचित नहीं है.
सरकार की तरफ से जैसे ही मुखर्जी ने बोलना शुरु किया भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व में शिव सेना, बीजू जनता दल और अकाली दल के सदस्य "शर्म करो-शर्म करो" के नारे लगाते हुये सदन से उठकर बाहर चले गये.
विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी के इस कथन पर कि इस समझौते से हमने परमाणु परीक्षण का अधिकार खो दिया है. प्रधानमंत्री ने स्पष्ट किया कि .भारत ने परमाणु परीक्षण करने का अधिकार छोड़ा नहीं है. जरुरत पड़ने पर हम परीक्षण कर सकते हैं.
प्रधानमंत्री ने चर्चा में अपने संक्षिप्त हस्तक्षेप में कहा कि पूर्व राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन सरकार ने सन 1998 में परमाणु परीक्षण पर एकतरफा रोक लगाने की घोषणा की थी. हमारी सरकार भी इसी रवैये पर कायम है. विदेशमंत्री ने अपने विस्तृत बयान में कहा कि परमाणु समझौते के दो चरण अभी बाकी है. प्रथम चरण के रुप में भारतीय वार्ताकार अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी के साथ भारत केन्द्रीय निगरानी उपायों पर बातचीत कर रहे है तथा दूसरे चरण में परमाणु सामग्री आपूर्तिकर्ता देशों की सहमति हासिल की जायेगी.


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