युवा बदल रहे फूड हैबिट, डेयरी प्रोडक्ट्स छोड़ अपना रहे वीगनिज्म! एक्सपर्ट ने बताई वजह
कई पीढ़ियों तक भारतीय थाली में दूध और डेयरी उत्पाद अहम हिस्सा रहे हैं। सुबह की चाय में दूध, दोपहर के खाने में दही, और त्योहारों में पनीर की डिश। लेकिन अब हालात बदल रहे हैं। आज के समय में बहुत से युवा भारतीय महसूस कर रहे हैं कि दूध अब उतना सुकून नहीं देता जितना पहले देता था।
खाने के बाद गैस, पेट फूलना, ऐंठन, एसिडिटी या अचानक थकान जैसी समस्याएं अब आम हो गई हैं। अक्सर इन्हें "सामान्य" मान लिया जाता है। दरअसल, इन लक्षणों की जड़ में लैक्टोज इनटॉलरेंस (Lactose Intolerance) यानी दूध को पचाने में असमर्थता होती है।

शरीर खुद देता है संकेत
लैक्टोज इनटॉलरेंस कोई एलर्जी नहीं है, बल्कि शरीर की वह स्थिति है जिसमें दूध में मौजूद शुगर लैक्टोज को तोड़ने में दिक्कत होती है। बहुत से लोगों को इसका पता अचानक चलता है। जैसे एक हफ्ते तक चाय में दूध न डालने या दही छोड़ देने पर पेट हल्का और आरामदायक महसूस होना।
डॉक्टरों के अनुसार, यह समस्या काफी आम है। इसमें जेनेटिक्स (वंशानुगत कारण) भूमिका निभाता है, लेकिन तनाव, एंटीबायोटिक का ज़्यादा इस्तेमाल, या गलत खानपान की आदतें भी पाचन को कमजोर कर देती हैं। कई लोग सालों तक इस समस्या से जूझते हैं, पर इसे पहचान नहीं पाते।
अब बढ़ रहा है प्लांट-बेस्ड (वनस्पति आधारित) विकल्पों का चलन
जब लोग महसूस करते हैं कि डेयरी से दूर रहना उनके पेट के लिए बेहतर है, तो वे विकल्प ढूंढना शुरू करते हैं। यही वह समय है जब वीगन या प्लांट-बेस्ड विकल्प सामने आते हैं। बादाम दूध, सोया दूध, ओट मिल्क, नारियल दूध, काजू चीज़, मूंगफली दही, और टोफू (पनीर का विकल्प) आज शहरों में आसानी से उपलब्ध हैं। अब ये "नए या अजीब" नहीं लगते। सुपरमार्केट और कैफ़े में ये आम हो चुके हैं। ये सिर्फ लैक्टोज इनटॉलरेंस वालों के लिए नहीं हैं। ये हल्के, पचने में आसान और शरीर को ऊर्जा और संतुलन देते हैं।
भारतीय स्वाद से समझौता नहीं
- डेयरी छोड़ने का मतलब यह नहीं कि भारतीय स्वाद को अलविदा कहना पड़े।
- नारियल दूध दक्षिण भारतीय करी में बेहतरीन फिट बैठता है।
- टोफू से वही डिश बन सकती है जो पहले पनीर से बनती थी।
- बादाम दूध स्मूदी या खीर में आसानी से घुल जाता है।
- मूंगफली का दही कढ़ी, रायता या छाछ में इस्तेमाल किया जा सकता है।
- अगर सही संतुलन रखा जाए तो स्वाद बिल्कुल भी कम नहीं होता।
त्वचा और फिटनेस पर भी असर
कई डर्मेटोलॉजिस्ट (त्वचा विशेषज्ञ) बताते हैं कि डेयरी घटाने से एक्ने (मुंहासे) में कमी आती है। वहीं फिटनेस प्रेमियों का कहना है कि प्लांट-बेस्ड डाइट से पाचन सुधरता है और रिकवरी तेज़ होती है। स्टेरिस हेल्थकेयर के चेयरमैन जीवन् कसारा के अनुसार, "लैक्टोज इनटॉलरेंस अब कोई दुर्लभ समस्या नहीं है। युवा भारतीय समझ रहे हैं कि दूध के बाद पेट में भारीपन या थकान सामान्य नहीं है। जब वे डेयरी छोड़कर बेहतर महसूस करते हैं, तो वे दोबारा उसे अपनाना नहीं चाहते।" उन्होंने कहा, "यह बदलाव किसी ट्रेंड से नहीं, बल्कि शरीर की प्रतिक्रिया से प्रेरित है। जब दूध, दही या पनीर सुकून देना बंद कर दें, तो प्लांट-बेस्ड विकल्प ही सबसे व्यावहारिक लगने लगते हैं।"
यह बदलाव अब रुकने वाला नहीं
आज अधिकतर भारतीय अपने खाने की आदतों पर फिर से सोच रहे हैं। जब वे डेयरी छोड़ने के बाद पेट की तकलीफ, सुस्ती या स्किन की समस्या से राहत महसूस करते हैं, तो यह बदलाव उन्हें "ट्रेंड" नहीं बल्कि जरूरत लगता है। आख़िर बात बस इतनी है - जो शरीर को अच्छा लगे, वही खाओ। अगर इसका मतलब दूध या पनीर की जगह वनस्पति आधारित विकल्पों को अपनाना है, तो यह बदलाव न सिर्फ आसान है बल्कि शरीर को सुकून देने वाला भी।












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