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कौन से होते हैं वास्तु के पंच महादोष, क्या होता है असर?

By Pt. Gajendra Sharma
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नई दिल्ली। भारतीय वास्तुशास्त्र की महत्ता प्राचीनकाल से ही रही है और अब एक बार फिर वास्तुशास्त्र के नियमों को बड़े पैमाने पर अपनाया जाने लगा है। मध्य के अनेक दशकों में इस शास्त्र को लगभग भुला दिया गया था, लेकिन जैसे-जैसे जीवन में समस्याएं बढ़ने लगी लोग एक बार फिर इसके सिद्धांतों को अपनाने लगे हैं। वास्तुशास्त्र मुख्यत: दिशाओं के आधार पर कार्य करता है। किसी घर का कौन सा भाग किस दिशा में है, कितना बड़ा या छोटा है। घर का मुख्य द्वार किस दिशा में है ऐसे ही अनेकों सिद्धांत हैं जिन्हें अपनाकर व्यक्ति जिस घर में रहता है वहां सुखपूर्वक बिना तनाव के निवास कर सकता है। इसके उलट यदि वास्तु के नियमों का पालन नहीं किया तो कई तरह की परेशानियां जीवन में आने लगती है।

वास्तुदोषों का वर्णन

आज हम बात करेंगे वास्तुशास्त्र के कुछ प्रमुख दोषों के बारे में। वैसे तो वास्तुशास्त्र में सैकड़ों प्रकार के दोषों का वर्णन मिलता है लेकिन उनमें से प्रमुख पांच ऐसे हैं जिनका पालन करना हर हाल में जरूरी है। इन्हें पंच महादोष भी कहा जाता है। यदि इन दोषों की ओर ध्यान नहीं दिया गया तो बनने वाला घर मुसीबतों का घर बन सकता है।

आइए जानते हैं वे कौन से दोष हैं ...

उत्तर-पूर्व (ईशान) कोण

उत्तर-पूर्व (ईशान) कोण

सबसे पहला महादोष भूमि के आकार-प्रकार से शुरू होता है। आप जिस भूमि पर भवन बनाने जा रहे हैं उसका आकार बहुत मायने रखता है। चौकोर या आयताकार प्लॉट सबसे उत्तम माना जाता है, लेकिन यदि किसी प्लॉट का ईशान कोण यानी उत्तर-पूर्व या नैऋत्य कोण यानी दक्षिण-पश्चिम कोना कटा हुआ है तो यह सबसे बड़ा महादोष है। ऐसे प्लॉट पर बनने वाला भवन आर्थिक रूप से व्यक्ति को कंगाल कर सकता है। ऐसे प्लॉट पर बने भवन में रहने वाले जातकों के बीच में भयंकर विवाद की स्थिति बनती है।

भवन का सबसे महत्वपूर्ण स्थान

किसी भी भवन का सबसे महत्वपूर्ण स्थान होता है उसका मध्य भाग। यह इतना महत्वपूर्ण होता है कि इसे ब्रह्मस्थान कहा जाता है। प्राचीनकाल में ब्रह्मस्थान को खाली छोड़ा जाता था, यानी उसमें कुछ भी निर्माण नहीं किया जाता था, लेकिन अब जगह की कमी के कारण मध्यभाग में भी निर्माण करना मजबूरी बन गया है। ऐसे में यह ध्यान रखना अत्यंत आवश्यक है कि मध्यभाग यानी ब्रह्मस्थान में कोई बड़ा पिलर नहीं होना चाहिए। इससे संपूर्ण भवन में सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बाधित हो जाएगा और फिर अन्य किसी भी शुभ स्थान का कोई प्रभाव नहीं होगा। ऐसे भवन में रहने वाले लोगों को हमेशा कोई न कोई रोग घेरे रहता है।

उत्तर-पूर्व (ईशान) कोण

उत्तर-पूर्व (ईशान) कोण में टॉयलेट या अंडरग्राउंड वॉटर टैंक होना बड़ा वास्तुदोष माना जाता है। यदि भवन के ईशान कोण में टॉयलेट या वॉटर टैंक बना हुआ है तो आय संबंधी परेशानी बनी रहती है। यदि ऐसे भवन में व्यावसायिक गतिविधियां चलती हैं तो वहां बिजनेस करने वालों को हमेशा घाटा ही बना रहता है। वे कभी तरक्की नहीं कर पाते। ईशान कोण में रसोईघर भी नहीं होना चाहिए, यदि ऐसा है तो परिवार के सदस्यों के बीच लड़ाई झगड़े होते रहते हैं।

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कुआं या अंडरग्राउंड वॉटर टैंक

कुआं या अंडरग्राउंड वॉटर टैंक

दक्षिण-पश्चिम दिशा में जल स्थान नहीं होना चाहिए। यदि इस दिशा में बोरवेल, कुआं या अंडरग्राउंड वॉटर टैंक बना हुआ है तो यह पनपने के सारे रास्ते बंद कर देता है। इससे धन का आगमन रूक जाता है और परिवार कर्ज में डूब जाता है। यदि किसी कमर्शियल कॉम्पलेक्स में इस तरह की स्थिति है तो वहां चलने वाले बिजनेस कर्ज में डूबकर दिवालिया हो सकते हैं। घरों की पुश्तैनी संपत्ति भी ऐसी जगह नष्ट हो जाती है।

दक्षिण-पश्चिम कोण

दक्षिण-पश्चिम कोण

वास्तुशास्त्र में दक्षिण-पश्चिम कोण को घर के मुखिया का स्थान कहा जाता है। इस स्थान पर टॉयलेट होने से मुखिया का जीवन अस्थिर रहता है। मुखिया के अस्थिर होने के कारण इसका असर पूरे परिवार पर होता है। रोग, आर्थिक तंगी, विवाद जैसी स्थितियां बनती हैं।

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English summary
Vastu is a Sanskrit word that means architecture and the science of manner is called Vastu shastrra. It is a mainly an Indian concept that was used by generation to construct houses and building.
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