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Moon in Janma Kundali: जानिए कुंडली में किस स्थान का चंद्र कैसा फल देता है

By Pt. Gajendra Sharma
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नई दिल्ली, 11 मई। किसी जातक की जन्मकुंडली में सूर्य के बाद दूसरा सबसे महत्वपूर्ण ग्रह होता है चंद्र। चंद्र प्रत्येक सवा दो दिन में अपनी राशि बदल लेता है। चंद्र का संबंध मन से होता है और यह जातक के संपूर्ण व्यक्तित्व पर प्रभाव डालता है। आइए आज चंद्र के बारे में ही जानते हैं कि कुंडली के किस भाव में बैठकर जातक पर किस प्रकार का प्रभाव दिखाता है। आप भी अपनी कुंडली के जन्मांग चक्र अर्थात् लग्न कुंडली में चंद्र की स्थिति देखकर पता कर सकते हैं।

जानिए कुंडली में किस स्थान का चंद्र कैसा फल देता है
  • प्रथम : चंद्र यदि प्रथम भाव अर्थात् लग्न में हो तो जातक दुष्ट प्रकृति का, पागल, बहरा, अशांत मन वाला, गूंगा और काली देह वाला होता है।
  • द्वितीय : चंद्र द्वितीय भाव में हो तो जातक अपरिमित सुख, धन, मित्रों से युक्त तथा अधिक धन का स्वामी व कम बोलने वाला होता है।
  • तृतीय : कुंडली के तीसरे भाव में बली चंद्रमा हो तो जातक को भाई-बंधुओं का अच्छा सहयोग रहता है। प्रसन्न् रहने वाला, वीर, विद्या-वस्त्र-अन्न् से भरपूर होता है।
  • चतुर्थ : चौथे भाव का चंद्रमा व्यक्ति को बंधु-बांधवों से युक्त बनाता है। सेवाभावी, दानी, जलीय स्थानों को पसंद करने वाला तथा सुख-दुख से मुक्त होता है।
  • पंचम : पांचवे भाव का चंद्रमा जातक को कमजोर बनाता है। ऐसे व्यक्ति में वीरता की कमी होती है लेकिन विद्या, वस्त्र, अन्न् का संग्रहकर्ता होता है। इसके पुत्र अधिक होते हैं, मित्रवान, बुद्धिमान और उग्र प्रकृति का होता है।
  • षष्ठम : छठे भाव का चंद्र हो तो जातक के शत्रु अधिक होते हैं। वह तीक्ष्ण, कोमल शरीर वाला, क्रोधी, नशे में चूर, पेट रोगी होता है। क्षीण चंद्र होने पर जातक अल्पायु होता है।
  • सप्तम : सप्तम भाव का चंद्र हो तो जातक सुशील, संघर्षशील, सुखी, सुंदर शरीर वाला, कामी होता है। कृष्ण पक्ष का निर्बल चंद्र हो तो दीन एवं रोगों से पीड़ित होता है।
  • अष्टम : आठवे भाव का चंद्रमा जातक को बुद्धिमान, तेजवान, रोग-बंधन से कृश देहधारी बनाता है। चंद्रमा क्षीण हो तो जातक अल्पायु होता है।
  • नवम : नवम भाव में चंद्रमा हो तो जातक देव-पितृकार्य में तत्पर, सुखी, धन-बुद्धि पुत्र से युक्त, स्त्रियों का प्रिय तथा उद्यमी होता है।
  • दशम : दसवें भाव में चंद्र हो तो जातक खेद से रहित, कार्य में तत्पर, कार्यकुशल, धन से संपन्न्, पवित्र, अधिक बली, वीर एवं दानी होता है।
  • एकादश : 11वें भाव का चंद्रमा हो तो जातक धनी, अधिक पुत्रवान, दीर्घायु, सुंदर, इच्छित नौकरी वाला, मनस्वी, उग्र, वीर एवं कातिमान होता है।
  • द्वादश : कुंडली में 12वें भाव का चंद्रमा हो तो जातक द्वेषी, पतित, नीच, नेत्ररोगी, आलसी, अशांत, सदा दुखी रहने वाला होता है।

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चंद्र के दुष्प्रभाव कम करने के उपाय

  • चंद्रमा खराब फल दे रहा है तो माता या माता के समान स्त्रियों की सेवा करें।
  • पत्नी, बेटी, बहन और स्त्री मित्रों का कभी दिल न दुखाएं।
  • सोमवार को शिवजी का अभिषेक गाय के कच्चे दूध से करें।
  • चतुर्थी का व्रत रखें और चंद्रमा को जल और अक्षत का अर्घ्य दें।
  • सफेद चंदन की माला धारण करें। सफेद चंदन का तिलक नित्य लगाएं।
  • सोमवार के दिन दूध और दूध से बनी मिठाई आदि का सेवन न करें।
  • चंद्र के मंत्रों का जाप करें या पंडित से करवाएं।

English summary
In Vedic Astrology, Moon represents mind that is impressionable, receptive and perceptive. here is full details.
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