करवा चौथ: सुहाग की लंबी उम्र का व्रत..जानिए क्यों है इतना खास
महिलाएं हर अग्नि परीक्षा को उत्तीर्ण करने के लिए प्रतिबद्ध रहती है। लगभग हर नारी की ख्वाहिश रहती है उसका पति चांद की तरह खूबसूरत, शीतल, ऊर्जावान, मन मोहक, सौन्दर्य प्रेमी और गगन को चूमने वाला हो। भावनाओं का कारक चन्द्र स्त्रियों के मन और मस्तिष्क पटल पर विशेष अधिकार जमाये रहता है। तभी तो स्त्रियों में भावनाओं की नदियां बहती रहती है।
करवा चौथ: प्यार, विश्वास और त्याग का पर्व
करवा चौथ में क्यों दिया जाता है चन्द्रमा को अर्ध्य?
करवा चौथ का व्रत कार्तिक मास की कृष्ण चतुर्थी को रखा जाता है। कार्तिक महीना हेमन्त ऋतु में पड़ता है और इस समय आकाश एक दम साफ रहता जिस कारण चन्द्रमा का अधिक प्रकाश पृथ्वी पर पड़ता है। चन्द्र मन का प्रतिनिधित्व करता है। स्त्रियों का मन अधिक चंचल होता है इसलिए मन को स्थिर और शक्तिशाली बनाने के लिए करवा चौथ के दिन चन्द्रमा को अघ्र्य देने की परम्परा है।
करवा चौथ के बारे में जानेंगे कुछ और रोचक बातें..जिन्हें पढ़ने के लिए नीचे की स्लाइडों को क्लिक कीजिये..

इस बार करवा चौथ पर अमृत बरसेगा
इस बार 30 अक्टूबर को अमृत सिद्ध योग में करवा चौथ पड़ रहा है। उस दिन चन्द्रमा रोहिणी नक्षत्र एंव वृष राशि में गोचर करेगा। यानि इस बार के इस बार करवा चौथ में स्त्रियां चन्द्रमा की शीतल ऊर्जा का अधिक से अधिक लाभ प्राप्त कर सकती है।

चन्द्रोदय का समय
चन्द्रोदय का समय- रात्रि 8 बजकर 26 मिनट पर होगा।

करवा चौथ व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक साहूकार के सात बेटे थे और एक बहन जिसका नाम करवा था। सभी सातों भाई अपनी बहन से बहुत प्यार करते थे। एक दिन की बात है करवा अपने ससुराल से मायके आयी हुयी थी। शाम के वक्त जब सभी भाई अपना व्यवसाय बन्द करके घर वापस हुये तो भोजन करने के लिए अपनी बहन को भी साथ में बैठने का आग्रह किया। किन्तु बहन ने बताया कि आज उसका करवा चैथ का निर्जला व्रत है। इसलिए आज वह चन्द्रमा को अघ्र्य देकर ही भोजन ग्रहण करेगी। चन्द्रमा अभी अदृश्य था इसलिए करवा भूख, प्यास से व्याकुल थी। यह देखकर सबसे छोटे भाई से रहा नहीं गया वह दूर जाकर एक पीपल के पेड़ पर दीपक जलाकर उसकी ओट में चलनी रख दी जिससे वह चन्द्रमा जैसा प्रतीत होने लगा।

करवा चौथ व्रत कथा
तत्पश्चात भाई ने अपनी बहन करवा को आकर बताया देखो चांद उदित हो गया है। यह सुनकर करवा नंगे पैर दौड़कर छत पर चढ़ गई और चांद को देखकर खुशी से झूम उठी। फिर उसने पूरे विधि-विधान से चन्द्र को अघ्र्य देकर पूजन किया और जैसे ही भोजन का पहला कौर खाया तुरन्त छींक आ गई, दूसरा कौर ग्रहण करने पर भोजन में बाल निकलता है और तीसरे कौर को मुख में डालने से पहले उसके पति की मृत्यु का समाचार मिलता है। यह खबर सुनते ही करवा हाल-बेहाल हो जाती है।

करवा चौथ व्रत कथा
करवा के पति की मृत्यु क्यों हुयी इस बात से उसकी भाभी अवगत कराती है कि करवा चौथ का व्रत गलत तरीके से टूटने के कारण देवता नाराज हो गये है। सच्चाई जानने के बाद करवा निश्चय करती है कि अपने पति की मृत्यु का वह अन्तिम संस्कार नहीं करेगी बल्कि अपने सतीत्व के बल पर पति को पुनः जीवित कराकर रहेगी। वह पूरे एक वर्ष तक अपने पति के शव के पास बैठकर उसकी देखभाल करती रही एंव उसके ऊपर उगने वाली सुईनुमा घास को एकत्रित करती रही है।

करवा चौथ व्रत कथा
एक वर्ष बाद पुनः करवा चौथ का व्रत आता है। उसकी सभी भाभियां करवा चैथ का व्रत रखती है जब भाभियां उससे आशीर्वाद लेने आती है तो वह प्रत्येक भाभी से कहती है कि यम सुई ले लो और पिय सुई दे दो और मुझे भी अपनी जैसी सुहागिन बना दो। सभी भाभियों से वह यही आग्रह करती है किन्तु हर भाभी टाल देती है।

करवा चौथ व्रत कथा
जब छठें नम्बर की भाभी आती है तो वह बताती है कि सबसे छोटे भाई की वजह से तुम्हारा व्रत टूटा है इसलिए सबसे छोटी भाभी में ही शक्ति है कि वह तुम्हारे पति को जिंदा कर सकती है। इसलिए जब सबसे छोटी भाभी आये तो उसका हाथ पकड़ लेना और उसका हाथ तब-तक न छोड़ना जब-तक वह तुम्हारे पति को जिंदा न करा दे।

करवा चौथ व्रत कथा
सबसे अन्त में छोटी भाभी आयी तो उससे भी करवा सुहागिन बनने का आग्रह करने लगी। वह भी टालमटोल करती है किन्तु करवा उसका कसकर हाथ पकड़ लेती है और अपने सुहाग को जिंदा करने के लिए गिड़गिड़ती व मिन्नतें करती है। काफी प्रयास के बाद उसकी भाभी का दिल पसीज जाता है और अपनी छोटी अंगुली को चीरकर अमृत उसके मृत पति के मुख में डाल देती है जिससे करवा का पति जीवित हो जाता है। गणेश भगवान जी की कृपा से करवा का सुहाग वापिस आ जाता है।












Click it and Unblock the Notifications