जानिए देवशयनी एकादशी का महत्व और विधान

चर्तुमास एक ऐसा विशिष्ट अवसर है, जिसमें हम स्वाद ज्ञानेन्द्रि व कामेन्द्रि पर नियन्त्रण रखकर अध्यात्मिक उर्जा का भरपूर लाभ लेकर तन-मन से स्वस्थ्य रह सकते है। यह काल देवशयनी एकादशी ( अषाढ़ शुक्ल एकादशी) से शुरू होकर देवोत्थानी एकादशी (कार्तिक शुक्ल एकादशी) पर समाप्त होता है। यानि 9 जुलाई से 3 नवम्बर तक चतुमार्स रहेगा। जिसमें सावन, भाद्रपद, आश्विन और कार्तिक मास यह अवधि चैमासा कहलाती है।

पुराणों में ऐसा उल्लेख है कि इन दिनों में विश्व के पालन कर्ता चार मास तक पाताल लोक में क्षीर सागर की अनन्त शैय्या पर पर शयन करते है। इसलिए इन दिनों में कोई धार्मिक कार्य नहीं किया जाता है। इन दिनों तपवस्वी एक स्थान पर रहकर ही जप-तप करते है। धार्मिक यात्राओं में सिर्फ ब्रज की यात्रा की जा सकती है। ब्रज के विषय में ऐसी मान्यता है कि इस काल में सभी देवता ब्रज में ही निवास करते है।

देवशयनी एकादशी व्रत का विधान-

इस व्रत की तैयारी दशमी तिथि से ही करनी चाहिए। दशमी को रात्रि में हल्का व सुपाच्य भोजन करना चाहिए। यह व्रत दशमी से लेकर द्वादशी तक चलता है। इस व्रत में व्यक्ति को भूमि पर शयन करना चाहिए और बिना नमक का भोजन करना चाहिए और गेंहूं, जौं व मॅूग का दान करने से बचना चाहिए। एकादशी के दिन प्रातः काल उठकर नित्य कर्म से निवृत्त होकर किसी तीर्थ के जल में स्नान करना चाहिए।

स्नान जल में तिल और कुश का प्रयोग करें। स्नान के बाद भगवान विष्णु का पूजन करना चाहिए। पूजन करने के लिए धान्य के उपर घड़ा रखकर उसे लाल कपड़े से बांध दें और फिर उसका विधिवत पूजन करें। घड़ें के उपर भगवान विष्णु की प्रतिमा रखकर धूप, दीप व पुष्प से विधिपूर्वक करना चाहिए। इस पूजन को करने से शरीर निरोग रहता है एंव समस्त मनोकामनायें पूर्ण होती है।

चर्तुमास का विधान और महातम्य काफी कुछ वयक्ति के लिए लेकर आता है, इसको जानने के लिेए नीच की स्लाइडों पर क्लिक कीजिये।

चर्तुमास का विधान और महात्म्य

चर्तुमास का विधान और महात्म्य

स्कन्द पुराण में इन चार महीनों को साधनाकाल कहा गया है। इन चार मासों में साधक गण एक ही स्थान पर तप-साधना करते है। अध्यात्मिक पथ के जिज्ञासु आज भी इस परम्परा का पालन करते है। तात्विक दृष्टि से किसान को धरती का पालनहार माना जाता है, क्योंकि अन्न किसान ही पैदा करता है और अन्न पर ही मनुष्य का जीवन निर्भर रहता है।

चर्तुमास का विधान और महात्म्य

चर्तुमास का विधान और महात्म्य

चुर्तमास का काल वर्षा ऋतु होता है। कृषि के लिए वर्षा के चार माह अत्यन्त लाभकारी होते है। इसलिए किसान सामाजिक उत्तरदायित्वों से मुक्त होकर कृषि कार्य में तन-मन-धन से लिप्त हो जाते है। शायद इसी को ध्यान मेें रखकर हमारे मनीषियों ने चर्तुमास में मांगलिक कार्यो को निषेध कर दिया है।

चर्तुमास और स्वास्थ्य

चर्तुमास और स्वास्थ्य

चर्तुमास के काल में हमें पर्याप्त रूप में सूर्य व चन्द्र की उर्जा नहीं मिल पाती है और अधिक नमी वालें वातावरण के कारण हमारी पाचन शक्ति क्षीण हो जाती है। अतः इन दिनों में हमें सुपाच्य व हल्का भोजन करना चाहिए तथा रात्रि का भोजन सूर्यास्त से पहले कर लेना चाहिए। दही का सेंवन कदापि न करे।

चर्तुमास और स्वास्थ्य

चर्तुमास और स्वास्थ्य

चर्तुमास फेफड़ों और पाचन संस्थान को मजबूत करने के लिए उत्तम काल है। इस समय दो बार स्नान करना स्वास्थ्य के लिए हितकर रहता है। स्नान करते वक्त तेज-तेज सांसे लेने से हमारे फेफड़े मजबूत होते है और हल्का भोजन करे एंव सप्ताह में एक बार उपवास करने से हमारी पाचन शक्ति मजबूत होती है, जिससे हम निरोग रह सकते है।

चर्तुमास का जैन धर्म में महत्व

चर्तुमास का जैन धर्म में महत्व

पौराणिक कथा के अनुसार जब भगवान नेमिनाथ ने द्वारिका नगरी में चर्तुमास किया, तब भगवान श्री कृष्ण ने उनसे प्रश्न पूछा गुरूदेव आप चार मास तक एक स्थान पर क्यों रहते है। उत्तर में नेमिनाथ ने कहा इस समय पृथ्वी पर असंख्य जीवों की उत्पत्ति होती है, जो आंखों से दिखाई नहीं देते है। उन जीवों की रक्षा के लिए भ्रमण न करके एक स्थान पर ठहरते है। जैन धर्म में अषाढ़ी पूर्णिमा से कार्तिक पूर्णिमा तक चार माह तक भ्रमण करने वाले भिक्षु एक स्थान पर निवास करते है।

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