Jagannath Rath Yatra 2026: विश्वप्रसिद्ध जगन्नाथ रथ यात्रा 2026 की शुरुआत आज से हो गई है, आपको बता दें कि हजारों की संख्या में लोग रथ यात्रा में शामिल होने के लिए पुरी आते हैं, आस्था की मानक इस यात्रा के बारे में कहा जाता है कि जो कोई भी इस पवित्र यात्रा में शामिल होता है, उस जीवित रहते हुए सुख-शांति और समृद्धि की प्राप्ति तो होती ही है , साथ ही उसे मरने के बाद मोक्ष मिलता है। जगन्नाथ के भक्तों को इसका इंतजार बड़ी ही बेसब्री से होता है।
आपको बता दें कि ये अकेली ऐसी यात्रा है, जिसमें जगन्नाथ जी यानी की भगवान श्रीकृष्ण के साथ ना तो उनकी पत्नी रुक्मिणी होती हैं और ना ही उनकी सखि राधा होती हैं बल्कि उनके साथ उनके भाई बलदाऊ और बहन सुभद्रा होते हैं और खास बात ये है कि ये तीनों ही पूर्ण रूप में नहीं हैं, तीनों भगवान के ऊपरी हिस्से की पूजा होती है, ये अकेली पूजा है जिसमें भाई-बहनों की पूजा होती है।
इस बारे में कई पौराणिक कथाएं प्रचलित हैं लेकिन एक सबसे लोकप्रिय कथा है, जिसे कि हर भक्त को जानना चाहिए। स्कंद पुराण में इस कथा का जिक्र है, जिसके मुताबिक श्री कृष्ण एक बार घोर निद्रा में थे और पत्नी रुक्मिणी उनके चरण दबा रही थीं, तब ही श्रीहरि ने करवट ली और उनके मुंह से निकला 'हे राधे', जो कि रुक्मिणी को अच्छा नहीं लगा। उनके मन में ये विचार आया कि मैं दिन-रात भगवान की सेवा करती हूं, मन से इन्हें खुश रखने का प्रयास करती हूं लेकिन ऐसा उस राधा में क्या है, जिसका ध्यान भगवान को गहरी नींद में भी रहता है। वो तो इनके पास भी नहीं लेकिन हमेशा इनके मन में क्यों रहती है? अपनी जलन और गुस्से में उन्होंने ये बात सारी रानियों से कह दी, मां रोहिणी (बलराम और सुभद्रा की मां) तक भी ये बात पहुंची, उन्होंने तुरंत रुक्मिणी को बुलाया और कहा कि मैं तुम्हें इस बात का उत्तर दूंगी। सभी रानियों को बुला लाओ, रुक्मिणी ने ऐसा ही किया। इसके बाद मां रोहिणी ने कहा कि जब मैं इसका राज बताऊं तो उस वक्त श्रीकृष्ण और बलराम दोनों को ये बात नहीं सुननी चाहिए, इसलिए सुभद्रा तुम महल की पहरेदार बनो। मां की आज्ञा मानकर सुभद्रा महल के दरवाजे पर खड़ी हो गईं लेकिन जैसे ही मां ने अपना कथन शुरू किया वैसे ही भगवान श्री कृष्ण और बलदाऊ दोनों उस कक्ष की ओर आ गए, सुभद्रा ने उन्हें रोकने की कोशिश की लेकिन तब तक मां रोहिणी की सुंदर आवाज उन तीनों के कान में पड़ गई थी, जिसकी वजह से वो तीनों उस वक्त मूर्ति को रूप में बदल गए और उनका शरीर नीचे से गलने लगा। उसी वक्त मेघ रास्ते से नारद मुनि वहां से गुजर रहे थे, वो भगवान का ये अलौकिक रूप देखकर एकदम हक्के-बक्के रह गए। उन्होंने तुरंत भगवान से प्रार्थना की उनके इस रूप को भक्तों को भी देखना चाहिए इसलिए वो उनके सामने इस रूप में सामने आए , प्रभु ने नारद जी की बात मान ली और अपना इसी वादा निभाने के लिए वो हर साल 'रथ यात्रा' के जरिए भक्तों को दर्शन देते हैं। आपको बता दें कि पुरी यात्रा में तीनों भगवान का रूप आधा ही है। आपको बता दें कि हर साल आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष के दिन रथयात्रा निकाली जाती है, जिसमें तीन देवताओं (जगन्नाथ, उनके भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा) को बड़ी संख्या में भक्त तीन विशाल लकड़ी के रथों पर बिठाकर 'बड़ा डंडा' (मुख्य मार्ग) से गुंडिचा मंदिर ले जाते हैं। वहां वे एक हफ़्ते तक रहते हैं और फिर जगन्नाथ मंदिर लौट आते हैं। वापसी की इस यात्रा को 'बहुडा यात्रा' कहा जाता है। माना जाता है कि जो कोई भी इस यात्रा का पार्ट बनता है उसका यश बढ़ता है और उसको धनलाभ भी होता है।रुक्मिणी को हुई राधा के नाम पर जलन
मां रोहिणी ने बताया कारण लेकिन सुभद्रा को बनाया पहरेदार
सुभद्रा ने कृष्ण-बलदाऊ को रोका लेकिन तभी शरीर गलने लगा
नारद मुनि ने किए अलौकिक रूप के दर्शन, भक्तों के लिए किया खास निवेदन
आषाढ़ महीने के शुक्ल पक्ष के दिन होती है रथयात्रा
वापसी की रथ यात्रा को 'बहुडा यात्रा' कहते हैं
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