'9वीं क्लास में क्यों पढ़ा रहे तीसरी भाषा', SC में जस्टिस नागरत्ना ने CBSE को क्यों लगाई फटकार?

SC Language Policy Verdict: सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार, 16 जुलाई को CBSE के तीन भाषा नीति को लेकर अहम टिप्पणी की है। क्लास 9वीं के छात्रों को तीसरी भाषा पढ़ाने को लेकर अहम टिप्पणी की। अदालत ने कहा कि 9वीं में छात्रों के उपर काफी प्रेशर रहता है।

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ऐसे समय में उन पर एक नई भाषा का बोझ डालना उचित नहीं है। यदि बोर्ड को तीसरी भाषा पढ़ानी ही है तो इसकी शुरुआत कक्षा 6 से की जानी चाहिए, ताकि बच्चों को धीरे-धीरे सीखने का समय मिल सके और बोर्ड परीक्षा के दौरान उन पर अनावश्यक दबाव न पड़े।

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CBSE पर यह टिप्पणी न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना और न्यायमूर्ति आर. महादेवन की पीठ ने सुनवाई। हालांकि यह मामला सीधे तौर पर CBSE की तीन-भाषा नीति से जुड़ा नहीं था, लेकिन सुनवाई के दौरान इस विषय पर विस्तार से चर्चा हुई।

CBSE की तीन भाषा नीति क्या है पूरा मामला?

दरअसल, सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाई कोर्ट के 2017 के फैसले को चुनौती दी है। शीर्ष अदालत में हाई कोर्ट के इसी फैसले पर सुनवाई हो रही थी। इस फैसले में HC ने राज्य सरकार को हर जिले में जवाहर नवोदय विद्यालय (JNV) स्थापित करने में सहयोग करने का निर्देश दिया था।

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ध्यान रहे कि तमिलनाडु सरकार लंबे समय से नवोदय विद्यालयों का विरोध करती रही है। राज्य का कहना है कि वहां दो-भाषा नीति लागू है, जबकि नवोदय विद्यालयों में तीन-भाषा नीति अपनाई जाती है। इसी पर सुनवाई के दौरान अदालत ने बताया कि तीसरी भाषा किस कक्षा से पढ़ाई जानी चाहिए।

9वीं में नई भाषा शुरू करना ठीक नहीं: जस्टिस बीवी नागरत्ना

सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान जब तमिलनाडु सरकार की ओर से कहा गया कि तीसरी भाषा कक्षा 9 से अनिवार्य होती है। इस पर न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना ने तुरंत प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह सही तरीका नहीं है। उन्होंने कहा कि "9वीं कक्षा छात्रों के लिए पहले से ही प्रेशर देती है। ऐसे में नई भाषा शुरू करना ठीक नहीं है। अगर तीसरी भाषा पढ़ानी है तो उसकी शुरुआत कक्षा 6 से करनी चाहिए। जितनी जल्दी बच्चे सीखना शुरू करेंगे, उतना ही उनके लिए आसान होगा।"

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इस दौरान कोर्ट में न्यायमूर्ति नागरत्ना ने अपने स्टूडेंट लाइफ का उदाहरण भी दिया। उन्होंने बताया कि जब वह स्कूल में पढ़ती थीं, तब तीसरी भाषा की पढ़ाई मिडिल स्कूल यानी छठी से शुरू हो जाती थी।

इससे छात्रों को कई सालों तक सीखने का मौका मिलता था और बोर्ड परीक्षा तक वे लैंग्वेज में सहज हो जाते थे। उन्होंने कहा कि शुरुआती कक्षाओं में नई भाषा सीखना बच्चों के लिए आसान होता है, जबकि 9वीं में अचानक नई भाषा जोड़ने से उनका मानसिक तौर पर दबाव बढ़ सकता है।

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तीसरी भाषा का मतलब सिर्फ हिंदी नहीं

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति नागरत्ना ने यह भी साफ किया कि तीन-भाषा नीति का मतलब केवल हिंदी पढ़ाना नहीं है। इसमें स्टेटे लैंग्वेज और अंग्रेजी के अलावा किसी भी तीसरी भाषा को पढ़ाने की बात कही गई है। इसमें कहीं भी यह नहीं लिखा कि तीसरी भाषा केवल हिंदी ही होगी। स्टेट ऑफ तमिलनाडु ने कहा कि राष्ट्रीय शिक्षा नीति किसी भी भाषा को थोपने की अनुमति नहीं देती, तब न्यायमूर्ति ने तमिलनाडु सरकार से सवाल किया कि "अगर हिंदी नहीं, तो संस्कृत पढ़ाने पर क्या आपत्ति है?"

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CBSE ने मई में जारी किया था नया आदेश

दरअसल, CBSE ने 15 मई 2026 को एक सर्कुलर जारी किया था। इसमें सभी स्कूलों को निर्देश दिया गया था कि 1 जुलाई 2026 से कक्षा 9 के छात्रों के लिए तीसरी भाषा अनिवार्य की जाए। सबसे बड़ी परेशानी यही थी कि इस बैच के छात्रों ने पहले से दो भाषाओं के साथ पढ़ाई शुरू कर दी थी।

अचानक तीसरी भाषा जोड़ने से स्कूलों, छात्रों और अभिभावकों में चिंता बढ़ गई। इतना ही नहीं, CBSE ने यह भी कहा था कि जब तक नई किताबें उपलब्ध नहीं होतीं, तब तक कक्षा 6 की थर्ड लैंग्वेज की बुक से पढ़ाई कराई जाए।

CBSE के इस फैसले का स्कूलों ने किया था विरोध

CBSE के इस फैसले का कई राज्यों, स्कूलों और छात्रों ने विरोध किया। उनका कहना था कि न्यू एक्डमिक सेशन शुरू होने के बाद नियम बदलना छात्रों पर मेंटल टॉर्चर करने जैसा है। इसके बाद 29 जून 2026 को CBSE ने राहत देते हुए स्पष्ट किया कि फिलहाल कक्षा 9 के छात्र और अभी कक्षा 7 और 8 में पढ़ रहे वे छात्र, जिन्होंने पहले से दो अदर लोकल लैंग्वेज चुनी हैं, उन्हें केवल एक भारतीय भाषा जोड़नी होगी। बोर्ड ने ये भी कहा कि इस बैच के लिए तीसरी भाषा का इवैल्यूएशन केवल स्कूल लेवल पर होगा। इसे कक्षा 10 की बोर्ड परीक्षा का हिस्सा नहीं बनाया जाएगा।

11 अगस्त को होगी अगली सुनवाई

सुप्रीम कोर्ट ने बताया कि केंद्र सरकार और तमिलनाडु सरकार के बीच जवाहर नवोदय विद्यालयों को लेकर बातचीत जारी है। मामले की अगली सुनवाई 11 अगस्त को होगी। सुनवाई के दौरान अदालत ने तमिलनाडु सरकार को यह भी सलाह दी कि केवल इसलिए किसी केंद्रीय योजना का विरोध नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि वह केंद्र सरकार की योजना है।

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