Parliament Monsoon Session: देश में वन नेशन वन इलेक्शन (One Nation One Election) को लेकर सरकार को थोड़ा और इंतजार करना पड़ सकता है। लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने से जुड़े विधेयकों की समीक्षा कर रही संयुक्त संसदीय समिति (Joint Parliamentary Committee-JPC) इस मानसून सत्र में अपनी रिपोर्ट संसद में नहीं पेश कर पाएगी।
Indian Express की रिपोर्ट के मुताबिक- जेपीसी ने अभी तक सभी राज्यों से सुझाव नहीं लिए हैं और इसके लिए इसे अभी और वक्त की जरूरत है।
गौरतलब है कि लोकसभा ने समिति का समय मॉनसून सत्र के आखिरी दिन तक बढ़ा दिया था, लेकिन काम अभी अधूरा है। मॉनसून सत्र जुलाई के तीसरे हफ्ते में शुरू होने वाला है और संयुक्त संसदीय समिति को अपनी अंतिम रिपोर्ट सौंपने के लिए और समय है। भाजपा सांसद पीपी चौधरी की अध्यक्षता में बनी 39 सदस्यों वाली यह समिति दो अमह बिलों पर काम कर रही है। पहला-संविधान (129वां संशोधन) बिल 2024 और दूसरा केंद्र शासित प्रदेश कानून संशोधन बिल 2024। ये विधेयक एक बार दिसंबर 2024 में लोकसभा में पेश किए जा चुके हैं। समिति अब तक 10 राज्यों का दौरा कर चुकी है। बुधवार को दिल्ली विधानसभा जाकर वहां लोगों से बात करेगी। कई और राज्यों में अभी दौरा बाकी है। समिति के चेयरमैन ने संकेत दिया है कि भले ही कानूनी प्रक्रिया पूरी हो जाए, लेकिन 2034 से पहले एक साथ दोनों चुनाव को कराने के आसार कम दिख रहे हैं। खबरों के मुताबिक-वन नेशन वन इलेक्शन बिल के साथ ही साथ सरकार इस बार मॉनसून सत्र में डेलिमिटेशन (सीटों की नई सीमाएं तय करना) का बिल भी पास कराने की तैयारी कर रही है। एक्सप्रेस कि रिपोर्ट बताती है कि दोनों मुद्दों को साथ जोड़कर BJP ज्यादा समर्थन जुटाने की कोशिश हो रही है। ध्यान रहे कि बजट सत्र 2026 में केंद्र सरकारी की पूरी कोशिशि के बावजूद भी महिला आरक्षण से जुड़ा डेलिमिटेशन बिल विपक्ष की एकजुटता के कारण लोकसभा में पास नहीं हो सका था। अब सरकार 2029 के लोकसभा चुनाव से पहले महिला आरक्षण लागू करने के लिए यह बिल पास कराना चाहती है। इसके लिए NDA को लोकसभा में 360 वोट यानी दो-तिहाई बहुमत की जरूरत पड़ेगी। सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर केंद्र सरकार One Nation One Election की इतनी पक्षधर क्यों है? जबकि विपक्ष लगातार इसका विरोध कर रहा है। इसके जवाब में सरकार का तर्क है कि बार-बार चुनाव होने से खर्च काफी बढ़ जाता है। जिसका असर सरकारी बजट पर भारी पड़ता है। वहीं दूसरी ओर हर चुनाव के दौरान लागू होने वाली आचार संहिता के कारण राज्यों और शहरों में विकास कार्यों और नीतिगत फैसलों पर असर पड़ता है। सरकार बार-बार अपनी सफाई पेश करते हुए बता रही है कि यदि पूरे देश में एक साथ चुनाव होंगे तो चुनावों पर होने वाला खर्च कम होगा और प्रशासनिक संसाधनों का बेहतर उपयोग होगा। जिससे सरकारें विकास और प्रशासन पर अधिक ध्यान दे सकेंगी। India गठबंधन एकजुट होकर एक राष्ट्र एक चुनाव का लगातार विरोध कर रही है। कांग्रेस इन मुद्दों को लेकर केंद्र सरकार पर फेडरल स्ट्रक्चर पर प्रहार करने का आरोप लगा रही है। विपक्ष का कहना है कि 'वन नेशन, वन इलेक्शन' भारत की संघीय व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। विपक्ष का तर्क है कि यदि किसी राज्य सरकार का कार्यकाल बीच में समाप्त हो जाए तो संवैधानिक संकट पैदा हो सकता है। अगर किसी राज्य में सरकार गिर गई तो क्या पूरे देश में नए चुनाव कराए जाएंगे? यह सवाल भी उठाया जा रहा है। इसी वजह से विपक्ष इस प्रस्ताव पर व्यापक चर्चा और संवैधानिक समीक्षा की मांग कर रहा है। 'वन नेशन वन इलेक्शन' यानी एक देश, एक चुनाव का मतलब है कि पूरे भारत में लोकसभा और सभी राज्यों की विधानसभाओं के चुनाव एक ही समय पर हों। अभी इस पर सभी राज्यों कि स्थिति अलग-अलग थी। हर साल कहीं लोकसभा, कहीं विधानसभा, कहीं पंचायत के चुनाव चलते रहते हैं। गौरतसब है कि इस प्रक्रिया में संवैधानिक संशोधन, राज्यों की सहमति, EC की तैयारियां और राजनीतिक सहमति शामिल हैं। इसलिए इसे लागू करने में अभी कई साल लग सकते हैं।समिति की क्या स्थिति है, किन विधेयकों की समीक्षा कर रही है JPC?
डेलिमिटेशन बिल के साथ जोड़ने की कोशिश
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आखिर मोदी सरकार क्यों चाहती है एक साथ चुनाव?
विपक्ष क्यों कर रहा है इसका विरोध?
क्या है एक देश-एक चुनाव का मतलब?
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