यूपी विधानसभा चुनाव 2017: कांग्रेस के समाजवादी पार्टी से गठबंधन की ये है असल वजह

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लखनऊ। करीब चार दशकों तक उत्तर प्रदेश में राज करने वाली कांग्रेस को साइकिल की सवारी के जरिए ही प्रदेश की सत्ता में वापसी की उम्मीद नजर आ रही है, इसीलिए कांग्रेस ने समाजवादी पार्टी से गठबंधन की रणनीति को अपनाया।

यूपी चुनाव के लिए सपा और कांग्रेस में गठबंधन

कांग्रेस नेतृत्व को इस गठबंधन की जरुरत कितनी थी इसका पता इसी से चल जाता है कि पार्टी को कुल सीटों में महज एक चौथाई सीट ही दी गई है। साथ ही गठबंधन का चेहरा भी समाजवादी पार्टी का नेतृत्व कर रहे अखिलेश यादव को ही माना गया है। आखिर कैसे एक पार्टी जो कभी प्रदेश की सत्ता के केंद्र में थी आज जूनियर की तरह गठबंधन की हर शर्त को मानने को तैयार नजर आ रही है, उसकी इस स्थिति की वजह क्या है?

उत्तर भारत में कब और कैसे खिसका कांग्रेस का वोट बैंक

उत्तर भारत में कब और कैसे खिसका कांग्रेस का वोट बैंक

27 सितंबर, 1989 का वो दिन था जब केंद्रीय गृह मंत्री बूटा सिंह लखनऊ पहुंचे थे। सूर्य भी उस समय उदय नहीं हुआ था, वो तुरंत मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी के सरकारी बंगले पर पहुंचे। इसी दौरान अशोक सिंघल के नेतृत्व भगवा पहने हुए राम जन्म भूमि न्यास से जुड़े संतों का एक प्रतिनिधिमंडल उनसे मुलाकात के लिए पहुंचा। उनसे मुलाकात के बाद बूटा सिंह ने केंद्र सरकार की ओर से न्यास को राम जन्मभूमि/बाबरी मस्जिद परिसर में शिलान्यास की सशर्त अनुमति दे दी। इसके बाद 10 नवंबर, 1989 में विश्व हिंदू परिषद-बीजेपी के नेतृत्व में विवादित स्थल से दूर राम मंदिर निर्माण के लिए शिलान्यास और आधारशिला रखी गई। ये चुनाव का दौर था। इस फैसले के बाद प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने राम राज्य के नाम पर फैजाबाद से पार्टी का चुनाव अभियान शुरू किया। यहीं से कांग्रेस पार्टी का उत्तर भारत में वोटबैंक खिसकने लगा, इसके बाद लगातार पार्टी की मुश्किलें बढ़ने लगी।

वो घटनाएं, जिससे यूपी में खिसका कांग्रेस का वोट बैंक

वो घटनाएं, जिससे यूपी में खिसका कांग्रेस का वोट बैंक

उत्तर भारत में पार्टी ने मुस्लिम समुदाय का समर्थन लगभग खो दिया। इसमें 1984 के दौरान दरवाजे खोलने और फिर 1989 में शिलान्यास कार्य को मंजूरी देना मुख्य वजहें थी। इसके बाद रही सही कसर कांग्रेस के नेतृत्व वाली नरसिम्हा राव सरकार के दौरान बाबरी मस्जिद विध्वंस की घटना ने पूरी कर दिया। इस घटना के बाद मुस्लिम वोटबैंक समाजवादी पार्टी की ओर खिसक गया। यही वजह है कि रविवार को सपा और कांग्रेस के बीच गठबंधन के पीछे अहम वजह यही है कि कांग्रेस पार्टी एक बार फिर मुस्लिम वोटरों को अपने साथ जोड़ना चाहती है। बीजेपी को रोकने के लिए पार्टी ने सेक्युलर ताकतों को एक करने के लिए कदम उठाया है।

आखिर कांग्रेस दोबारा यूपी में फिर से मजबूत क्यों नहीं हुई?

आखिर कांग्रेस दोबारा यूपी में फिर से मजबूत क्यों नहीं हुई?

कांग्रेस की जमीन खिसकने के पीछे एक अहम वजह क्षेत्रीय पार्टियों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी का उभार है। इसमें समाजवादी पार्टी ने मुस्लिम वोटरों को अपने साथ जोड़ लिया, दूसरी ओर से बहुजन समाज पार्टी ने दलित वोटरों को अपने साथ जोड़ लिया। कांग्रेस के कमजोर होने की दूसरी वजह नेतृत्व कमजोर होना रहा। राजीव गांधी के निधन के बाद के बाद पार्टी में नेतृत्व का संकट रहा। सोनिया गांधी के हाथों में नेतृत्व जाने से पहले कांग्रेस के अध्यक्ष पीवी नरसिम्हा राव और सीताराम केजरी रहे। यूपी की जनता इनसे खुद को जोड़ने में असमर्थ रही। दूसरी ओर राज्य में भी पार्टी का कोई बड़ा नेता सामने नहीं आया। जिससे कांग्रेस का जनाधार खिसका। 1997 में सोनिया के हाथों में पार्टी का नेतृत्व आने के बाद इसकी स्थिति में सुधार नजर आया। हालांकि यूपी में पार्टी की स्थिति को सुधारने की कवायद कामयाब नहीं हो सकी।

आखिरकार कांग्रेस नेतृत्व ने क्यों अपनाई गठबंधन की रणनीति

आखिरकार कांग्रेस नेतृत्व ने क्यों अपनाई गठबंधन की रणनीति

करीब 20 साल के बाद आखिरकार कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में गठबंधन की रणनीति समझ में आई। पार्टी ने बीजेपी की प्रदेश की सत्ता से दूर रखने के लिए समाजवादी पार्टी से गठबंधन की रणनीति को आगे बढ़ाया। इसकी वजह भी थी कि बसपा सुप्रीमो मायावती चुनाव पूर्व गठबंधन को तैयार नहीं थी, सपा का नेतृत्व कर रहे यादव परिवार में झगड़ा चल रहा था। मुलायम सिंह यादव लगातार कांग्रेस के खिलाफ थे, ऐसे में जब अखिलेश यादव के हाथ में सपा का नेतृत्व आया तो कांग्रेस की ओर राहुल गांधी और प्रियंका गांधी ने बातचीत शुरू की और आखिरकार गठबंधन फाइनल हो सका। कुल मिलाकर अब कांग्रेस पार्टी को यही सीधा रास्ता नजर आया कि यूपी की सत्ता में वापसी कर सकें। हालांकि उनका ये दांव कितना कामयाब होगा ये तो चुनाव के बाद पता चलेगा।

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English summary
up assembly election 2017: Why Congress must alliance with Samajwadi party cycle?
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