यूपी चुनाव 2017- हार कर भी क्यों मजबूत हो रही है भाजपा?

यूपी का चुनाव भाजपा के लिए कई ऐसे संकेत लेकर आया है जो पार्टी के लिए बड़ा हौसलाअफजाई का काम कर सकता है। हाल के चुनावों से भाजपा की हार के बीच भी पार्टी के लिए कई सकारात्मक संकेत हैं।

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लखनऊ। उत्तर प्रदेश का चुनाव ना सिर्फ प्रदेश बल्कि देश के लिए काफी अहम होने वाला है, इस चुनाव में सत्ता किसे हासिल होगी इसपर देशभर के लोगों की निगाहें टिकी हैं। यूपी की देश में राजनीति में क्या महत्ता है इसका अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि देश में 15 में से 9 प्रधानमंत्री यूपी के हुए यही नहीं खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने केंद्र में पहुंचने के लिए यूपी का रास्ता अख्तियार किया और वाराणसी से चुनाव जीता।

यूपी से होती है केंद्र में धमक

उत्तर प्रदेश कितना अहम है इस बात का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि यह दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला राज्य है, छह में से एक भारतीय उत्तर प्रदेश में रहता है। लोकसभा में 543 सीटों में से अकेले यूपी से सबसे अधिक 80 सांसद पहुंचते हैं, यही नहीं राज्यसभा में यूपी से कुल 30 सांसद पहुंचते हैं, जिसकी कुल क्षमता 250 है। ऐसे में इन आंकड़ों से समझा जा सकता है कि केंद्र की राजनीति में उत्तर प्रदेश क्या महत्ता रखता है। यह चुनाव सिर्फ राज्य का चुनाव नहीं है बल्कि भाजपा के भविष्य का भी चुनाव है, राज्य सभा में भाजपा की क्या स्थिति होगी यह पूरी तरह से इस चुनाव पर निर्भर है। हालांकि भाजपा ने लगातार कई राज्यों में शानदार जीत दर्ज की है लेकिन इसके बावजूद कई ऐसी जगहें है जहां पार्टी को हार का सामना करना पड़ा है और पार्टी ने अपेक्षा के अनुसार प्रदर्शन नहीं किया है, आइए डालते हैं एक नजर

2015 में भाजपा को लगातार दो चुनावों में हार का सामना करना पड़ा था, पहली बार उसे दिल्ली उसके बाद बिहार में बुरी हार का सामना करना पड़ा था। कई विश्लेषकों का मानना था कि दिल्ली में पहली बार मोदी लहर की हवा निकली थी लेकिन इससे इतर भी कई आंकड़ें हैं जो इस धारणा को झूठलाते हैं।

कांग्रेस की हार और आप की जीत में भाजपा के लिए अच्छे संकेत

दिल्ली के चुनाव में भाजपा को हार का सामना करना पड़ा था लेकिन उसके वोट प्रतिशत में कोई कमी नहीं आई थी। 2013 के दिल्ली चुनाव में भाजपा के पास 69 में से 31 सीटें थीं, और पार्टी को 33.07 फीसदी वोट हासिल हुए थे, यानि पार्टी को कुल 2604100 वोट। वहीं 2015 में पार्टी को तकरीबन उतने ही वोट मिले जितने उसे 2013 में मिले थे। चुनाव आयोग के आंकड़ों के अनुसार भाजपा का वोट फीसदी सिर्फ एक फीसदी गिरा था और 2015 में उसे 32.1 यानि 2779810 वोट मिले थे।

वहीं 2013 के चुनाव में कांग्रेस को 70 में से 8 सीटों पर जीत मिली थी और उसका वोट फीसदी 24.55 फीसदी यानि 1932933 था। लेकिन 2015 में पार्टी को सिर्फ 9.8 फीसदी वोट हासिल हुए थे और उसे कुल 8.4 लाख वोट मिले थे, यानि पार्टी को कुल 15 फीसदी वोट का नुकसान हुआ था। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी का काफी बढ़त मिली, 2013 में आप को 70 में से 28 सीटों पर जीत हासिल हुई और उसे 29.49 फीसदी वोट हासिल हुए थे। लेकिन 2015 के चुनावों में पार्टी को कुल 54.3 फीसदी वोट मिले और पार्टी 67 सीटें जीतने में सफल हुई। यानि इस लिहाज से कांग्रेस का पूरा जनमत आप के खाते में चला गया। इन नतीजों के आधार पर देखा जाए तो भाजपा ने पहले की ही तरह अपना प्रदर्शन किया, लेकिन कांग्रेस के बदतर प्रदर्शन का पूरा और सीधा लाभ आप को मिला।

बिहार चुनाव में वोट फीसदी के लिहाज से भाजपा सबसे बड़ी पार्टी

बिहार में भी भाजपा दिल्ली की तरह मुख्य विपक्षी पार्टी थी, नीतीश कुमार की अगुवाई में महागठबंधन हुआ और इस गठबंधन को सबसे अधिक 46 फीसदी वोट मिले, जबकि भाजपा के गठबंधन एनडीए को कुल 34 फीसदी वोट हासिल हुए। वहीं अकेले भाजपा के आंकड़ों पर नजर डालें तो भाजपा को 24.8 फीसदी वोट हासिल हुए जोकि किसी भी अकेली पार्टी की तुलना में सबसे अधिक था, आरजेडी के खाते में 18.5 फीसदी, 16.7 फीसदी वोट जदयू को हासिल हुआ था, ऐसे में बिहार में भी सबसे बड़ी पार्टी वोट के आधार पर भाजपा थी। इस चुनाव में कांग्रेस जोकि महागठबंधन का हिस्सा थी उसे सिर्फ 6.7 फीसदी वोट हासिल हुए थे।

तमिलनाडु, केरल और पश्चिम बंगाल नतीजे भाजपा के लिए शुभ संकेत

वर्ष 2015 भाजपा के लिए सबसे मुश्किल साबित हुआ, लेकिन 2016 में तमिलनाडु के चुनाव में भाजपा को पिछले चुनाव की तुलना में 0.6 फीसदी वोट अधिक मिले, उसे इस चुनाव में कुल 2.8 फीसदी वोट मिले थे जबिक पिछले चुनाव में सिर्फ 2.2, जिसे पार्टी ने खुद की जीत के तौर पर बताया था। वहीं केरल के आंकड़ों पर नजर डालें तो यहां भी पार्टी को पिछले चुनाव में 6.03 फीसदी वोट मिले थे जबकि इस चुनाव में उसे 10.7 फीसदी वोट हासिल हुआ था। यही नहीं पार्टी छटनूर में दसरे स्थान पर रही। पश्चिम बंगाल में भी वोट प्रतिशत में बढ़ोत्तरी हुई, पार्टी को पिछले चुनाव में 4.06 फीसदी तो इस चुनाव में 10.2 फीसदी वोट हासिल हुए थे। वहीं लोकसभा चुनाव में भाजपा को कुल 17.5 फीसदी वोट हासिल हुए थे, इस लिहाज से पार्टी का वोट प्रतिशत गिरा था।

क्या खत्म होगा यूपी में वनवास

उत्तर प्रदेश में भाजपा का 2012 के चुनाव में प्रदर्शन कुछ खास नहीं रहा और उसका वोट प्रतिशत सिर्फ 15 फीसदी पर सिमट गया था। वहीं 1996 के नतीजों पर नजर डालें तो पार्टी को 32.51 फीसदी वोट मिले थे, जबकि 2002 में उसे 20.12 फीसदी वोट हासिल हुए थे, 2007 में 16.97 फीसदी। लगातार वोट प्रतिशत में कमी पार्टी के लिए चिंता का विषय थी। 2012 में भाजपा को कुल 47 सीटें मिली थी, जबकि 2007 में उसे 51, वहीं 2002 में 88। ऐसे में प्रदेश में पार्टी की स्थिति हमेशा से गिरती रही। हालांकि पिछले चुनावों में भाजपा को लगातार हार का सामना करना पड़ा था ,लेकिन जिस तरह से पार्टी अन्य प्रदेश में मोदी के केंद्र की राजनीति में आने के बाद अच्छा प्रदर्शन किया है वह पार्टी के लिए शुभ संकेत हो सकते हैं और मुमकिन है कि पार्टी एक बार फिर से यूपी में बड़ा बदलाव करते हुए सत्ता के करीब पहुंच जाए, लेकिन यह देखना दिलचस्प होगा कि बिना सीएम फेस के पार्टी सत्ता के कितने करीब पहुंचती है।

 

 

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English summary
While the BJP has lost major electoral battles, its greatest test yet stares it in the face. It will be interesting to see will BJP be back in the state
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