लकी है सदर विधानसभा सीट, यहां से खुलता है यूपी की सत्ता का दरवाजा, जानें कैसे?

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सुल्तानपुर। यूपी विधानसभा चुनाव में सरकार किसकी होगी इसका फैसला राज्य की जनता ही करेगी। लेकिन प्रदेश के राजनीतिक गलियारे में सदर विधानसभा सीट ऐसी है जिसे सत्ता के लिए 'लकी' माना जाता है। पिछले 45 वर्षों का ये इतिहास रहा है कि सदर सीट पर सत्तारूढ़ दल का विधायक ही विराजमान रहा है। या यूं कह लिया जाए कि इस सीट पर जिस पार्टी का विधायक जीतता है उसी पार्टी के हाथ में राज्य की सत्ता भी आती है। मौजूदा समय में इस सीट से सपा के अरुण वर्मा विधायक हैं और अपनी दूसरी पारी खेलने के लिए उन्होंने नामिनेशन भी फाइल किया है। बात दें कि 2009 के परिसीमन से पहले इस सीट का नाम जयसिंहपुर था। यह सीट चर्चा में ऐसे आई, जब मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने 2017 के आगामी विधानसभा चुनावों का शंखनाद करने के लिए इस सीट को चुना। इस सीट की सबसे बड़ी खासियत यह है कि जब भी राज्य में सत्ता की लहर में परिवर्तन हुआ तो यहां के वोटर्स परिवर्तन की उस लहर को फौरन ही भांप गए।

सदर विधानसभा का ये है इतिहास

सदर विधानसभा का ये है इतिहास

इस सीट के भाग्यशाली होने का सिलसिला 1969 में कांग्रेस प्रत्याशी श्यो कुमार के जीतने से शुरू हुआ। 1977 में पूरे देश की राजनीतिक फिजा बदली और जनता पार्टी की लहर चली तो यहां से भी जनता पार्टी के प्रत्याशी मकबूल हुसैन खान ने बाजी मारी। लेकिन तीन साल बाद ही 1980 में कांग्रेस प्रत्याशी देवेंद्र पांडे जयसिंहपुर सीट से जीते और राज्य में कांग्रेस सरकार की वापसी हुई। फिर जनता पार्टी से टूटकर अलग हुई जनता दल ने 1989 में उत्तर प्रदेश की सत्ता पर पहली बार कब्जा जमाया और इस बार जयसिंहपुर की अवाम ने जनता दल के उम्मीदवार सूर्यभान सिंह को सत्ता की चाबी सौंपी।

90 की लहर में भाजपा खोल सकी है खाता

90 की लहर में भाजपा खोल सकी है खाता

90 का दशक सिर्फ राज्य में ही नहीं बल्कि पूरे देश में भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए नई राजनीतिक शक्ति के रूप में उभर कर आने का दशक रहा। 1991 में जयसिंहपुर सीट से पहली बार भाजपा का कोई उम्मीदवार जीता और राज्य में भी पहली बार भाजपा ने सरकार बनाई। भाजपा की सरकार 1992 में बाबरी विध्वंस के साथ गिर गई और सपा ने बसपा से गठबंधन कर सरकार बनाई। 1993 के उप-चुनाव में जयसिंहपुर से भी सपा के प्रत्याशी ए. रईस को जीत मिली। वहीं, 1996 से 2007 तक बसपा के पास रही सीट और फिर 1996 से 2007 के बीच बसपा राज्य की सत्ता के केंद्र में रही और इस दौरान जयसिंहपुर सीट भी लगातार बसपा के कब्जे में रही। 1996 में बसपा प्रत्याशी राम रतन यादव जीते तो 2002 और 2007 में बसपा के ही ओ. पी. सिंह इस सीट की जनता को रिझाने में सफल रहे।

बसपा ने भी तीन बार जमाई थी इस सीट पर अपनी साख

बसपा ने भी तीन बार जमाई थी इस सीट पर अपनी साख

साल 1996 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर बसपा का कब्ज़ा रहा जबकि भाजपा यहां रनर रही। बसपा के रामरतन यादव 38687 मत पाकर इस सीट से चुनाव जीतकर विधायक हुए थे और रनर भाजपा प्रत्याशी दुखहरन वर्मा 36235 मत पाकर 2452 वोटों के अन्तर से बसपा के रामरतन यादव से चुनाव हार गए थे। साल 2002 का विधानसभा चुनाव आया तो फिर इस सीट पर बसपा का कब्ज़ा हुआ। जबकि काँग्रेस यहाँ रनर रही है । इस सीट पर चुनाव जीतकर बसपा के ओम प्रकाश सिंह उर्फ़ ओपी सिंह 31963 मत पाकर विधायक हुए और कांग्रेस प्रत्याशी जय नरायण तिवारी 25198 मत पाकर 6765 वोटों के अन्तर से बसपा के ओम प्रकाश सिंह से चुनाव हार गए थे। साल 2007 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर तीसरी बार भी बसपा का कब्ज़ा हुआ। जबकि कांग्रेस फिर से यहां रनर रही है। इस सीट पर चुनाव जीतकर बसपा के ओम प्रकाश सिंह उर्फ़ ओपी सिंह दूसरी बार 37013 मत पाकर पुनः विधायक हुए थे और कांग्रेस प्रत्याशी जय नरायण तिवारी दूसरी बार 19903 मत पाकर 17110 वोटों के अन्तर से बसपा के ओम प्रकाश सिंह से चुनाव हार गए थे।

पहली बार 2012 में सपा ने किया इस सीट पर कब्जा

पहली बार 2012 में सपा ने किया इस सीट पर कब्जा

साल 2012 के विधानसभा चुनाव में इस सीट पर तीन बार से जीतती आ रही बसपा का तिल्सिम टूटा और सपा ने बसपा की इस सीट पर कब्ज़ा किया जबकि बसपा यहां विनर से रनर हो गयी। इस सीट पर पहली बार सपा ने पूरे सूबे में सबसे कम उम्र के युवा प्रत्याशी अरुण वर्मा को विधानसभा भेजा। अरुण वर्मा को 71939 वोट मिले जबकि बसपा के रनर प्रत्याशी राज प्रसाद उपाध्याय उर्फ़ राज बाबू 51032 वोट पाकर 20907 वोटों के अन्तर से सपा के अरुण वर्मा से चुनाव हार गए। फिलवक्त सुल्तानपुर सदर सीट पर इस बार सपा के सीटिंग एमएलए अरुण कुमार को भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के प्रत्याशी सीताराम वर्मा और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के प्रत्याशी राज बाबू उपाध्याय चुनौती दे रहे हैं।

सपा-कांग्रेस गठजोड़ के बाद क्या इतिहास दोहराएगा ?

सपा-कांग्रेस गठजोड़ के बाद क्या इतिहास दोहराएगा ?

अब राज्य के आगामी विधानसभा चुनाव में भाजपा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में फिर से सत्ता पाने के लिए पूरी ताकत झोंक चुकी है। तो सत्तारूढ़ सपा ने कांग्रेस से गठजोड़ कर लिया है। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या इस बार भी सुल्तानपुर सदर से राज्य की सत्ता का द्वार खुलता है? वहीं, वोटर्स और जातीय समीकरण पर डाले एक नज़र तो 189 सदर विधानसभा सीट पर कुल मतदाताओं की संख्या (323650) है। जिनमें पुरुष मतदाता की संख्या (169757) है और महिला मतदाताओं की संख्या (153833) है।

मतदाता और जातीय समीकरण

मतदाता और जातीय समीकरण

यहां तकरीबन 15 % ब्राह्मण वोटर जिनकी संख्या (48547) है। इनके अलावा 8 % क्षत्रीय वोटर जिनकी संख्या (25892) है। वहीं यादव 10 % -- (32365), मुस्लिम - 7 % -- (22655), दलित - 19 % --(61493), कुर्मी - 13 % -- (42074), कायस्थ - 2 % -- (6473), निषाद - 5 % -- (16182), प्रजापति - 3 % -- (9709), मौर्य - 5 % -- (16182), वेश्य - 4 % -- (12946),
पाल - 4 % -- (12946), अन्य (चौरसिया) - 5 % -- (16182)है। ये भी पढ़ें: Live- अखिलेशजी कान खोलकर सुन लो, 11 मार्च को आपका कच्चा चिट्ठा खुल जाएगा- मोदी

 
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English summary
sultanpur sadar assembly seat battle in uttar pradesh, akhilesh selected his previous mla for this seat again.
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