मुख्यमंत्री अखिलेश यादव: असफलता के ये आंकड़े बोलते नहीं चिल्लाते हैं

आंकड़ों और राजनीतिक फैसलों से देखें तो अखिलेश यादव एक असफल मुख्यमंत्री हैं। पढ़िए सांप्रदायिक दंगे, महिलाओं के खिलाफ अपराध और भ्रष्टाचार जैसे गंभीर मामलों में कैसा रहा प्रदेश का हाल।

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उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव 2017 का बिगुल बज चुका है। समाजवादी पार्टी में बाप-बेटे की सियासी जंग बेशक चरम पर हो लेकिन 5 साल से सत्ता पर काबिज रहे अखिलेश यादव वापसी के लिए एड़ी-चोटी का जोड़ लगा रहे हैं। चुनाव से पहले 60 हजार करोड़ की योजनाओं का उद्घाटन हो, सरकारी विज्ञापनों की आंधी या हार्वड विश्वविद्यालय के राजनीतिक विशेषज्ञ स्टीव जॉर्डिंग की मदद। अखिलेश यादव सत्ता में वापसी के लिए हर संभव प्रयास कर रहे हैं लेकिन वो भूल गए कि जनता काम पर वोट देती है और ब्रांडिंग पर नहीं। 

अखिलेश यादव

अखिलेश सरकार के 5 साल के कार्यकाल की बात की जाए तो सीधे तौर पर वो हर जगह फेल साबित हुए हैं। कानून व्यवस्था, सांप्रदायिक दंगे, भ्रष्टाचार और कड़े राजनीतिक फैसले, हर जगह वो बतौर मुख्यमंत्री जूझते दिखे।

5 साल की सरकार में पिता मुलायम सिंह और चाचा शिवपाल सिंह यादव ने उनके फैसलों की धज्जियां उड़ाते दिखे। बार-बार अखिलेश यादव की बर्खास्तगी के बाद भी बदनाम मंत्री गायत्री प्रजापति, सपा प्रमुख मुलायम सिंह के आशीर्वाद से मंत्रिमंडल में वापसी करते दिखे। पढ़िए कब-कब और किन मुद्दों पर अखिलेश यादव प्रदेश के कागजी मुख्यमंत्री से ज्यादा कुछ नहीं लगे।

1. सांप्रदायिकता की आग में झुलसा प्रदेश

2012 में जोरदार जीत के बाद अखिलेश यादव सरकार ने धूमधाम से भव्य सैफई महोत्सव मनाया। बड़े-बड़े सितारों और कलाकारों ने इसमें शिरकत की। फिर अगले ही साल जो हुआ, उसने पूरे पश्चिमी उत्तर प्रदेश को हिलाकर रख दिया। 2013 में कवाल गांव में हुई एक छोटी से छेड़छाड़ की वारदात ने दंगों का रूप ले लिया। पूरा मुजफ्फरनगर जिले इसकी चपेट में आया और 43 से ज्यादा लोग मारे गए।

साल 2013 में दंगों का सिलसिला यहीं नहीं थमा। साल 2013 में पूरे प्रदेश में 823 दंगों की वारदातें हुईं। इनमें 133 लोगों ने जान गंवाई और 2269 से ज्यादा लोग घायल हुए। अगले साल 2014 में भी दंगे नहीं रुके और 644 वारदातें हुईं। इन घटनाओं में कुल 95 लोग हताहत हुए। 2014 से 2015 के बीच सांप्रदायिक हिंसा में 17% बढ़ोत्तरी हुई। 2015 में भी 751 दंगे की घटनाएं हुईं और 97 लोग मारे गए। साल दर साल पुलिस-प्रशासन दंगाई के आगे घुटने टेकता दिखाई दिया। मुजफ्फरनगर, सहारनपुर, जहानाबाद और कई जगह दंगों की गवाह बनी।

यूपी में दंगे

2. महिलाओं के लिए बना बदतर प्रदेश

मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने बेहतर पुलिस व्यवस्था के लाख दावे किए हों लेकिन आंकड़े उनकी पोल खोलते रहे। प्रदेश में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराध ने आसामां छुआ। साल 2014 में प्रदेश भर में करीब 3,467 रेप की घटनाएं हुईं। हैरानी वाली बात ये थी कि अगले ही साल 2015 रेप की वारदात में 161% की बढ़ोत्तरी हुई और 9075 रेप के मामले दर्ज हुए।

बुलंदशहर हाइवे गैंगरेप और लखनऊ आशियाना रेप केस जैसे न जाने कितने मामले थे, जो अखिलेश सरकार की नाक के नीचे हुए। ऐसी घटनाओं को रोकने की बजाए आजम खां जैसे सपा के कद्दावर मंत्री रेप के मामलों को राजनीतिक रंग देते नजर आए।

साल 2016 में 15 मार्च से 18 अगस्त के बीच महज 6 महीनों में 1012 रेप के मामले दर्ज हुए। इस दौरान छेड़छाड़ के भी रिकॉर्ड 4520 मामले दर्ज हुए। ये वो मामले हैं जो दर्ज हो सके, न जाने ऐसी कितनी वारदातें ऐसी होंगी जो पुलिस-प्रशासन की नाकामी के कारण थानों तक पहुंच नहीं पाई होंगी। 2014 की NCRB की सूची में उत्तर प्रदेश सबसे असुरक्षित राज्यों में से एक था। साल 2015 में NCRB रिपोर्ट में प्रदेश के सबसे हाई-प्रोफाइल और वीआईपी शहर लखनऊ को सबसे असुरक्षित शहर कहा गया। 

रेप के आंकड़े यूपी

3. भ्रष्टाचार पर मूंदी आंखें

बीते 5 सालों के दौरान खुद अखिलेश यादव पर कोई व्यक्तिगत आरोप न लगा हो लेकिन उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरी रही। भूमि पर कब्जा, ठेका पट्टा, नियुक्ति के नाम पर उगाही जैसे आरोप विपक्षी दल खुलेआम लगाते नजर आए।

खुद एक IAS अधिकारी ने अखिलेश सरकार के भ्रष्टाचार की पोल खोली थी। आईएएस अशोक कुमार ने आरोप लगाया कि जो मोटी रकम अदा करता है, उसे सरकार पदोन्नति देती है। ज्यादा रुपए देने वाले अधिकारी ही जिले में डीएम बनाकर भेजे जाते हैं। अशोक कुमार का दावा था कि डीएम के पद के लिए 60 से 70 लाख रुपए तक की रकम वसूल की जाती है। अशोक कुमार यूपी सरकार में सचिव राष्ट्रीय एकीकरण के पद पर थे, जो बाद में सस्पेंड कर दिए गए।

खनन मंत्री गायत्री प्रजापति उनकी सरकार के ऐसे चेहरे थे जिन पर भ्रष्टाचार के कई गंभीर आरोप थे। हाईकोर्ट के आदेश पर उनके खिलाफ सीबीआई जांच चल रही है। गायत्री प्रजापति की पहुंच कहां तक थी, इसका अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि उन्हें तीन बार प्रमोशन मिला।

पहले वो राज्यमंत्री बने और तभी उन पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे। बावजूद इसके उन्होंने प्रमोशन कर स्वतंत्र प्रभार दे दिया है। जब उनकी बदनामी और बढ़ी तो उन्हें कैबिनेट मंत्री का दर्जा दे दिया गया।

उनके ऊपर सरकार का हाथ कुछ ऐसा था जब हाईकोर्ट ने गायत्री के खिलाफ CBI जांच का आदेश दिया तो सरकार उसे रुकवाने के कोर्ट पहुंच गई। प्रजापति के खिलाफ 6 से ज्यादा लोगों ने लोकायुक्त में शिकायत की और अवैध खनन में करीब 60 जनहित याचिकाएं उनके खिलाफ हाईकोर्ट में आईं।

2002 में BPL रेखा से नीच आने वाले गायत्री के पास 2012 में 1.81 करोड़ की जायजाद थी। अपने करीबी 21 लोगों के नाम पर उन्होंने बेशुमार 84 संपत्तियां खरीदीं, जिनकी कीमत 1500 करोड़ से ज्यादा थी

सिर्फ गायत्री प्रजापति ही नहीं, पूर्व मंत्री राजकिशोर सिंह के खिलाफ भी भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप थे। राजकिशोर पर भी जमीन हड़पने और भ्रष्टाचार के आरोप लगे। अखिलेश यादव ने दोनों को निकाल एक बार संदेश देने की कोशिश भी की लेकिन पिता के आगे असहाय नजर आए।

यूपी में भ्रष्टाचार

4. सपा सरकार में पुलिस लाचार

अखिलेश सरकार में अपराधियों के हौंसले कितने बुलंद थे और पुलिस की कितनी तैयार, इसकी पोल खुद आजम खान ने फरवरी 2016 में विधानसभा में पेश किए आंकड़ों में खोली। मंत्री आजम खान ने बताया कि 4 सालों के दौरान पुलिस पर हमले की 1,044 वारदात हुईं। 2012-13 में पुलिस पर 202 हमले हुए और 2013-14 में पुलिस पर 264 बार हमले हुए।

2014-15 में ये आंकड़ा बढ़कर 300 तक पहुंच गया। साल 2015-16 की बात की जाए तो ये संख्या 278 रही। फरवरी 2016 तक के आंकड़ों में सामने आया कि पुलिस पर हुए हमले में 2 पुलिस कर्मी मारे गए और 572 घायल हुए। मायावती के 5 साल के कार्यकाल में पुलिस पर सिर्फ 547 बार हमले हुए थे।

जून 2016 में मथुरा के जवाहर बाग में जो घटा, वो हैरान कर देने वाला था। जिलाधिकारी के कार्यालय के पास उपद्रवियों से हुई मुठभेड़ में एक आईपीएस अधिकारी मुकुल द्विवेदी और एसएचओ संतोष कुमार यादव की मौत हुई थी।

जवाबी कार्रवाई में पुलिस ने 22 उपद्रवियों को भी मार गिराया। बीते कई महीनों से सरकारी जमीन पर कब्जा जमाए बैठे उपद्रवियों के सामने पुलिस-प्रशासन लाचार नजर आया। पूरे घटनाक्रम के बाद विपक्षी पार्टियों ने आरोप लगाया कि उपद्रवियों का नेतृत्व कर रहे रामवृक्ष यादव को सरकार के कद्दावर मंत्री का संरक्षण प्राप्त था। इसके पीछे भी जमीन कब्जाने की कहानी की सुगबुगाहट थी।

यूपी में पुलिस पर हमले

5. अखिलेश के फैसले, जो पलट दिए गए

उत्तर प्रदेश में बतौर मुख्यमंत्री चेहरा बेशक अखिलेश यादव रहे हों लेकिन उनके पास फैसले लेने की ताकत ना के बराबर थी। एक नहीं कई बार ऐसे मौके आए जब, उनके सख्त फैसलों को पलट दिया गया और सार्वजनिक तौर पर उन्हें शर्मिंदगी उठानी पड़ी। मुख्यमंत्री बनने के बाद अखिलेश यादव ने फैसला लिया था कि सभी मॉल को रात में जल्दी बंद करा दिया जाएगा। कैबिनेट में फैसले के बावजूद इसे वापस लेना पड़ा।

गोंडा में सीएमओ के साथ अभद्रता के मामले में चर्चा में आए विनोद सिंह उर्फ पंडित सिंह से अखिलेश यादव ने इस्तीफा ले लिया। लेकिन फिर उनका फैसला पलटा गया और विनोद सिंह की बतौर कैबिनेट मंत्री वापसी हुई। अखिलेश ने 2012 के विधानसभा चुनाव में इलाहाबाद से अतीक अहमद की राह बेशक रोक दी थी लेकिन 2014 लोकसभा चुनाव में अतीक को सपा से टिकट दिया गया।

अखिलेश कुंडा कांड के बाद बाहुबली विधायक रघुराज प्रताप सिंह राजा भैया को शामिल नहीं करना चाहते थे लेकिन पिता की जिद के आगे उन्हें झुकना पड़ा। अखिलेश कैबिनेट ने फैसला लिया था कि विधायक अपनी निधि से 20 लाख रुपए की कार खरीद सकते हैं लेकिन इस फैसला का विरोध हुआ फिर वो बैकफुट पर नजर आए। पूरे 5 साल के कार्यकाल में अखिलेश कितने ही मौके पर सिर्फ कागजी सीएम थे।

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English summary
According to statistics akhilesh Yadav is unsuccessful Chief Minister of uttar pradesh
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