5 बड़े कारण, जिनके चलते उत्तर प्रदेश की लड़ाई हार सकती है भाजपा

उत्तर प्रदेश की सत्ता जीतने के लिए हर पार्टी अपनी एड़ी-चोटी का जोर लगा रही है। भाजपा भी 2019 की लड़ाई के मद्देनजर अपनी पूरी ताकत झोंके हुए है। जानिए कौन से 5 बड़े कारण उसकी हार का कारण बने सकते हैं।

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नई दिल्ली। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले चरण का मतदान संपन्न हो चुका है। यूपी में किसका राज होगा, इसका परिणाम पश्चिमी उत्तर प्रदेश की जनता ने 73 सीटों पर वोटिंग कर बता दिया है। पहले चरण के बाद हर दल अपनी बढ़त का दावा कर रहा है। भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने भी 50 सीटें जीतने का दावा किया है। अब ये दावा कितना सही होता है, ये वक्त बताएगा। लेकिन भाजपा यूपी में पराजित होती है तो इसके एक नहीं कई कारण होंगे। पढ़िए वो 5 कारण जिनके चलते उत्तर प्रदेश में भाजपा को हार का मुंह देखने को मिल सकता है।

भाजपा की हार

1. सांसद 73 लेकिन पहचान शून्य

लोकसभा चुनाव 2014 में उत्तर प्रदेश में भाजपा ने जो प्रदर्शन किया उसकी उम्मीद किसी को नहीं थी। टीवी इंटरव्यू में खुद भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने माना था कि उन्हें 50-55 सीटों की उम्मीद थी लेकिन ये परिणाम चौंकाने वाले थे। यूपी में भाजपा इससे पहले कभी मजबूत नहीं थी। 1991 लोकसभा चुनाव में भाजपा को 51, 1996 में 52, 1998 में 58 और 1999 में 29 सीट हासिल हुईं थीं। विकास के दम पर जीत हासिल करनी वाली भाजपा के सांसद करीब 3 साल बाद भी अपने क्षेत्र में कोई विशेष काम नहीं कर पाए।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हर सांसद को आदर्श ग्राम योजना के तहत एक एक गांव गोद लेने के लिए अनुरोध किया। पहले चरण में सभी भाजपा सांसदों ने आदेशों का पालन करते हुए गांवों को गोद लिया और विकास के लिए कुछ कदम उठाए लेकिन दूसरे चरण में यही सांसद योजना में पलीता लगाते दिखे। दूसरे चरण में 73 में से 39 भाजपा सांसद ऐसे थे जिन्होंने विकास के लिए पिछड़े गांवों को गोद नहीं लिया।

इन सांसदों में बड़े भाजपा नेता जैसे मुरली मनोहर जोशी, उमा भारती, संजीव बालियान, कलराज मिश्र और अपना दल की अनुप्रिया पटेल जैसे नाम है। बजट से लेकर चुनावों तक हर भाषण में इसकी तस्दीक की जाती है कि देश का विकास बिना गांव के विकास के संभव नहीं है लेकिन सांसदों की इसकी फिक्र नहीं है। सिर्फ प्रधानमंत्री का गोद लिया जयापुर गांव एक मात्र रहा जिसके विकास की चर्चा हुई।

2. वादा-खिलाफी जो पड़ेगी यूपी में भारी!

भाजपा ने 2014 में अपने चुनाव प्रचार में इस बात पर सबसे ज्यादा जोर दिया था कि किसानों को उत्पादन लागत से 50 फीसदी अतिरिक्त लाभ दिया जाएगा। मोदी सरकार ने गेहूं तथा धान के दाम में महज 50 रुपए प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की और दूसरी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य में कोई बढ़ोतरी ही नहीं हुई। 20 फरवरी 2015 को मोदी सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में यह कहा था कि किसानों को उत्पादन लागत पर 50 प्रतिशत अधिक देना संभव नहीं है। ऐसे वायदे पूरे नहीं होने पर किसानों ने खुद को ठगा महसूस किया।

दूसरी तरफ लोकसभा चुनावों के दौरान भाजपा ने जाटों को आरक्षण देने का वायदा किया था लेकिन 3 साल बीतने के बाद भी वादा पूरा नहीं कर सकी। जाट बिरादरी इस बात को लेकर भाजपा से खासी नाराज है। इसी नाराजगी का परिणाम था कि रैलियों में गरजने वाले राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह का एक कथित टेप लीक हुआ, जिसमें उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में दबी और धीमी आवाज में जाटों को मनाते हुए सुनाई दिए।

उत्तर प्रदेश में कानून व्यवस्था एक बड़ा मुद्दा रहा। लोकसभा में धमाकेदार जीत के बाद जनता को भरोसा था कि सांसद और केंद्र सरकार हालात सुधारने के लिए सड़क से संसद तक जनता की आवाज उठाएंगे। लेकिन यूपी में बुलंदशहर हाइवे गैंगरेप से लेकर जवाहर बाग जैसे कई मामले घटित हुए और गृहमंत्रालय सिर्फ कड़ी कार्रवाई की जगह सिर्फ रिपोर्ट मांगता रह गया।

3. बागियों को एंट्री, अपने हुए बाहर

73 सांसदों के बाद यूपी में सरकार बनाने के लिए ताल ठोंक रही भाजपा पर एक गलती और भारी पड़ सकती है। हर हाल में जीत के लिए तड़प रही भाजपा ने बाहरी नेताओं को अपने कार्यकर्ता और नेताओं से ज्यादा तरजीह दी। टिकट के बंटवारे में अपने और बाहरी का मुद्दा साफ दिखाई दिया। विरोध इतना बढ़ गया कि प्रदेश अध्यक्ष केशव प्रसाद मौर्य के जगह-जगह पुतले जले और टिकट बेचने के आरोप लगे।

बाहरियों को पार्टी में टिकट देने पर कार्यकर्ताओं के गुस्से का सामना अमित शाह को भी करना पड़ा। एयरपोर्ट पर उनके सामने जमकर प्रदर्शन हुआ। घोषणा पत्र जारी होने से ऐन पहले नाराज कार्यकर्ता और पार्टी पदाधिकारियों के बीच मामला मारपीट तक जा पहुंचा। जिस स्वामी प्रसाद मौर्य की पूरी राजनीति भाजपा को कोसने में निकली, उनका स्वागत खुद अमित शाह करते नजर आए।

सिर्फ स्वामी प्रसाद को नहीं बल्कि उनके बेटे को भी टिकट मिली। अमित शाह और केशव प्रसाद मौर्य बेशक इसे राजनीति की एक चाल माने लेकिन जमीनी स्तर पर सालों से काम करने वाला नेता निराश और गुस्सा है।

4. नोटबंदी पर जनता को क्या मिला?

8 नवंबर को प्रधानमंत्री ने अचानक नोटबंदी का फरमान सुनाया और पूरे देश में खलबली मच गई। जिंदगी भर पाई-पाई जोड़ने वाली ईमानदार और गरीब जनता अपने नोट बदलवाने के लिए घंटों लाइनों में खड़ी दिखाई दी। भ्रष्टाचार और कालेधन के खिलाफ नोटबंदी को जब प्रधानमंत्री ने हथियार बताया तो जनता ने भी उनका खूब साथ दिया।

देशभक्ति और बेइमानी से जंग के नाम पर जनता ने बिना थके और शिकायत के मुहिम में साथ दिया। जनता को उम्मीद थी कि मोदी सरकार इस कष्ट के बदले उन्हें राहत पैकेज जैसा कोई रिटर्न गिफ्ट देगी। 31 दिसंबर को जनता के नाम संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी से करोड़ों लोग उम्मीद लगाए बैठे थे। लेकिन उन्हें निराशा हाथ लगी।

नोटबंदी के बाद हुए भाषणों में प्रधानमंत्री ने साफ कहा कि भ्रष्टाचारियों पर सख्त कार्रवाई होगी। आयकर, ईडी और सीबीआई ने कार्रवाई तो की लेकिन उत्तर प्रदेश इनसे अछूता रहा। यूपी में कोई बड़ी कार्रवाई नहीं हुई जबकि काले धन वाले आसानी से अपना पैसा बदलवा रहे थे।आम आदमी लाइनों में लगा सुबह से शाम तक जूझ रहा था लेकिन तमाम एजेंसियां एक भी बड़े नेता को अपनी गिरफ्त में नहीं ले सकीं।

मायावती के भाई आनंद कुमार को लेकर मीडिया में रिपोर्ट्स आईं लेकिन मामला कुछ आगे नहीं बढ़ा। बसपा के खाते में 100 करोड़ रुपए जमा हुए लेकिन इसकी जांच कहां तक पहुंची कुछ पता नहीं चला।

5. विवादित बयानों की बौछार

विकास के मुद्दे पर बंपर जीत हासिल करने वाली भाजपा सांसदों ने काम की बजाए विवादास्पद भाषणों की झड़ी लगा दी। यूपी से लेकर दिल्ली तक एक से एक विवादित बयान दिए गए। ऐसे बयान देने वालों में यूपी से ही सांसद साक्षी महाराज और साध्वी निरंजन ज्योति प्रमुख थे। विकास की बात करने की बजाए ये सांसद शाहरुख खान से लेकर बच्चे पैदा करने तक जैसे मुद्दों पर बोलते नजर आए। पढ़िए कुछ विवादित बयान-

1. 'वे लोग 4 बीबी और 40 बच्चों के नियम का पालन करते हैं, जिससे कई क्षेत्रों में हिन्दू अल्पसंख्यक हो गए हैं'- गोपाल नारायण (राज्यसभा सांसद)

2. 'मदर टेरेसा हिन्दुओं को इसाई बनाने के उस षडयंत्र का हिस्सा थी जिसमें सेवा के नाम पर धर्म परिवर्तन कराया जा रहा था'- योगी आदित्यनाथ (भाजपा सांसद गोरखपुर)

3. 'महात्मा गांधी का हत्यारा, नाथूराम गोडसे देशभक्त था'- साक्षी महाराज (भाजपा सांसद, उन्नाव)

4. 'देश में बढ़ती जनसंख्या के लिए चार पत्नियों और 40 बच्चों वाले लोग जिम्मेदार हैं'- साक्षी महाराज (भाजपा सांसद, उन्नाव)

5. 'तंजील अहमद (दिवंगत एनआईए अधिकारी) पाकिस्तानी है'- (साध्वी निरंजन ज्योति, फतेहपुर सांसद)

6. 'मायावती जिस तरह से मोलभाव कर रही हैं, इस तरह एक वेश्या भी अपने पेशे को लेकर नहीं करती'- दयाशंकर सिंह (निष्काषित भाजपा नेता)

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English summary
5 Big Reasons Why BJP May Lose the Battle of Uttar Pradesh
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