उत्तर प्रदेश चुनाव: जान गंवा रहे बुंदेलखंड के किसान, चुनाव में राजनीतिक दलों के लिए यह मुद्दा नहीं

उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में सात जिले बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, जालौन, झांसी और ललितपुर हैं, यहां विधानसभा की 19 सीटें हैं।

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बांदा। उत्तर प्रदेश के हिस्सेवाला बुंदेलखंड पिछले कई दशकों से महाराष्ट्र के विदर्भ जैसे हालातों से गुजर रहा है। 'कर्ज' और 'मर्ज' के दबाव में हर साल कई किसान अपनी जान गंवा रहे हैं, लेकिन कोई भी राजनीतिक दल इसे चुनावी मुद्दा नहीं बना सका। Read Also:'अखिलेश यादव की समाजवादी एंबुलेंस से हो रहा आचार संहिता का उल्लंघन'

उत्तर प्रदेश के हिस्से वाले बुंदेलखंड में सात जिले बांदा, चित्रकूट, महोबा, हमीरपुर, जालौन, झांसी और ललितपुर हैं, यहां विधानसभा की 19 सीटें हैं। जिनमें बांदा की नरैनी, हमीरपुर की राठ, जालौन की उरई और ललितपुर की महरौनी सीट अनुसूचित वर्ग के लिए आरक्षित है। पिछले 2012 के विधानसभा चुनाव में सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी और मुख्य विपक्षी दल बहुजन समाज पार्टी को सात-सात, कांग्रेस को चार और भारतीय जनता पार्टी को एक सीट पर जीत मिली थी। इन उन्नीस सीटों के मतदाता पिछले कई दशक से महाराष्ट्र के विदर्भ की तर्ज पर 'कर्ज' और 'मर्ज' के बोझ तले दबकर अपनी जान गंवा रहे हैं।

दैवीय आपदाओं के बाद अब बुंदेलखंड में आवारा जानवर भी किसानों के लिए बवाले-जान बने हैं। आवारा जानवरों से फसल की रखवाली के लिए किसान 'रतजगा' तक कर रहे हैं। पूर्व चुनावों की तरह इस चुनाव में भी राजनीतिक दल के उम्मीदवार किसानों का हिमायती होने का ढोंग करेंगे, लेकिन कोई भी दल 'कर्ज', 'मर्ज' और 'दैवीय आपदा' को अपना चुनावी मुद्दा नहीं बन सका।

किसानों के हक-अधिकार की लड़ाई लड़ने वाले 'बुंदेलखंड तिरहार विकास मंच' के अध्यक्ष प्रमोद आजाद का कहना है कि 'उन्होंने कमासिन के कठार पंप कैनाल को चालू करने की मांग को लेकर किसानों के साथ अब तक दिल्ली के जंतर-मंतर से लेकर लखनऊ और बांदा जिला मुख्यालय में 37 बार धरना-प्रदर्शन कर चुके हैं, राज्य सरकार सिंचाई सुविधा तो नहीं दे पाई, अलबत्ता उन्हें डेढ़ माह की जेल जरूर नसीब हुई।' उन्होंने बताया कि 'दैवीय आपदा से बड़ी समस्या यहां आवारा जानवरों की है, जो बची-खुची फसल रात में चट कर जाते हैं।' बकौल आजाद, 'इन जानवरों से रखवाली के लिए किसान रात को अपने खेतों में 'रतजगा' तक कर रहे हैं, इससे वह ठंड़ लगने के शिकार हो जाते हैं।'

किसान नेता और जिला पंचायत बांदा के पूर्व अध्यक्ष कृष्ण कुमार भारतीय ने कहा कि 'अब भी सभी दल चुनाव जीतने के लिए किसानों के साथ छल कर रहे हैं। कर्ज, मर्ज और दैवीय आपदा में मरने वाले किसानों की लंबी फेहरिस्त है, इस फेहरिस्त से कहीं ज्यादा बुंदेलखंड से पलायन करने वाले हैं।' उन्होंने बताया कि 'पूर्ववर्ती केन्द्र सरकार के एक दल ने बुंदेलखंड में पलायन करने वाले किसानों की रिपोर्ट प्रधामंत्री कार्यालय (पीएमओ) को सौंपी थी, जिसमें करीब 65 लाख किसानों के अन्यत्र पलायन का जिक्र किया गया था, यह रिपोर्ट अब भी पीएमओ में धूल फांक रही हैं।'

बुजुर्ग वामपंथी राजनीतिक विश्लेषक रणवीर सिंह चौहान का कहना है कि 'कर्ज और मर्ज को चुनावी मुद्दा बनाने के लिए किसानों को खुद आगे आना होगा, तभी वह अपनी लड़ाई लड़ पाएंगे।' उन्होंने बताया कि 'किसान क्रेडित कार्ड के जरिए सिर्फ बांदा जिले के किसान करीब पांच अरब रुपये से ज्यादा सरकारी ऋण लिए हैं और दैवीय आपदा की वजह से अदायगी नहीं कर पा रहे। यह भी विदर्भ जैसे हालात पैदा करने का एक अहम कारण है।' Read Also:केंद्रीय मंत्री ने ही भाजपा के लिए यूपी में खड़ी की मुश्किल

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English summary
Debt and disease are major issues of Bundelkhand but in Uttar Pradesh election not any political party is serious about these problems.
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