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क्या है भूमि अधिग्रहण विधेयक, किन बिंदुओं पर उठे विवाद

नई दिल्ली (विवेक शुक्ला)। क्या विपक्ष देश भक्त होता है और सरकार देश द्रोही? भूमि अधिग्रहण विधेयक के कुछ बिन्दुओं पर जिस तरह से बवाल मचा हुआ, उससे तो यही लगता है। इस सवाल पर अन्ना हजारे से लेकर तमाम विपक्षी नेता और दल आंदोलन कर रहे हैं।

पर सरकार को कुछ सवालों के जवाब देने होंगे। सरकार ने विधेयक के सेक्शन 10(ए) में संशोधन करा है। इससे सरकार,किसी व्यक्ति या कंपनियों को भूमि अधिग्रहण करने से पहले वहां के 80 फीसद लोगों से हरी झंडी लेने की जरूरत नहीं रहेगी। सारा विपक्ष इसी बिंदु पर सरकार से दो-दो हाथ करने के मूड में है।

नाराज विपक्ष

सारा विपक्ष इसी बिंदु पर सरकार से दो-दो हाथ करने के मूड में है। दरअसल जमीन अधिग्रहण का मुद्दा सरकार के लिए बड़ा इम्तिहान साबित होगा। पूरा विपक्ष जमीन अधिग्रहण बिल के खिलाफ है।

संसद के चालू बजट सत्र में इस विधेयक पर तगड़ा बवाल कटेगा। सरकार के लिए इसे राज्यसभा में संख्या बल कम होने के कारण पारित कराना है। हालांकि अब सरकार नरम पड़ती दिख रही है। जमीन अधिग्रहण कानून पर समझौते के संकेत दिखाई दे रहे हैं। सरकार बीच का रास्ता निकालने की कोशिश में है। सरकार ने जमीन अधिग्रहण अध्यादेश में बदलाव के संकेत दिए हैं। सरकार नरमी अपनाते हुए किसानों की सहमति वाली परियोजनाओं का दायरा बढ़ा सकती है।

क्या है मसौदा और कहां आ रही हैं दिक्कतें

जानकारों के मुताबिक, भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास के लिए विधेयक का जो मसौदा तैयार किया है उसके प्रावधानों के मुताबिक मुआवज़े की राशि शहरी क्षेत्र में निर्धारित बाजार मूल्य के दोगुने से कम नहीं होनी चाहिए जबकि ग्रामीण क्षेत्र में ये राशि बाजार मूल्य के छह गुना से कम नहीं होनी चाहिए।

ज़मीन के अधिग्रहण और पुनर्वास के मामलों को सरकार ऐसे भूमि अधिग्रहण पर विचार नहीं करेगी जो या तो निजी परियोजनाओं के लिए निजी कंपनियाँ करना चाहेंगी या फिर जिनमें सार्वजनिक परियोजनाओं के लिए बहु-फ़सली ज़मीन लेनी पड़े।

अगर कानून बनता है तो

यानी अगर ये विधेयक क़ानून बन जाता है तो बहु-फ़सली सिंचित भूमि का अधिग्रहण नहीं किया जा सकेगा। भूमि अधिग्रहण में अरजेंसी प्रावधान की काफ़ी आलोचना हुई है। इसके तहत सरकारें ये कहकर किसानों की ज़मीने बिना सुनवाई के तुरत फुरत ले लेती हैं कि परियोजना तत्काल शुरू करना ज़रूरी है।

मसौदे में ज़मीन के मालिकों और ज़मीन पर आश्रितों के लिए एक विस्तृत पुनर्वास पैकेज का ज़िक्र है। इसमें उन भूमिहीनों को भी शामिल किया गया है जिनकी रोज़ी-रोटी अधिग्रिहित भूमि से चलती है। इस बीच, अधिग्रहण के कारण जीविका खोने वालों को 12 महीने के लिए प्रति परिवार तीन हज़ार रुपए प्रति माह जीवन निर्वाह भत्ता दिए जाने का प्रावधान है।

महत्वपूर्ण है कि अन्ना हजारे के आंदोलन के मूड में आते ही सारा माहौल गरमा गया है। सरकार भूमि अधिग्रहण बिल पर सहमति बनाने की कोशिश में जुटी है। इसी को लेकर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने विपक्ष को साथ लेकर चलने की बात कही। राष्ट्रपति प्रणव कुमार मुखर्जी के अभिभाषण में भी इसका जिक्र आया।

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