एक DM और एक डॉक्टर की खुदकुशी, हमें कुछ सोचने पर मजूबर करती है

By: प्रेम कुमार
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आत्महत्या की दो घटनाओं ने हर उस शख्स को झकझोर दिया है जो संवेदनशील हैं। एक घटना में आत्महत्या करने वाले डीएम हैं जिन्हें समाज में 'कलक्टर' के तौर पर जिले का मालिक माना जाता रहा है और दूसरी घटना में हैं पुणे की एक महिला डॉक्टर। डॉक्टर को जान बचाने वाला और देवी-देवता का दूसरा रूप माना जाता रहा है। ये घटनाएं हमारी मान्यता पर आघात हैं।

ज़िले का मालिक, जिसे आईएएस बने हुए महज 5 साल हुए हों, जिसका करियर संभावनाओं से भरपूर था, जो देश और समाज की संपदा थे, निवेश थे- अचानक दुनिया से क्यों रूठ गये? वजह चाहे पारिवारिक दबाव ही क्यों ना हो, परिवार से लेकर देश का नुकसान हुआ है। माता-पिता से पत्नी की अनबन क्या मुकेश पांडे जैसे युवा आईएएस को मौत के मुंह में धकेल सकती है? यह कैसी अनबन है?

मुकेश पांडे ने जिस तरीके से सुसाइड नोट की सीरीज़ छोड़ी है वो बताती है कि आत्महत्या की वजह का वे खुलासा करना नहीं चाहते थे। उन जैसे होनहार युवक के लिए वाकई ऐसी वजह शर्मनाक है। लेकिन मसला ये है कि सबकुछ समझते हुए भी उन्होंने आत्महत्या जैसा कदम क्यों उठाया? ये दबाव पैदा ही क्यों हुआ जो उन्हें आत्महत्या की ओर ले गया?

सुसाइड नोट में लिख छोड़े गये सारे नंबर पत्नी या ससुराल पक्ष के थे। जाहिर है नजदीकी भी वही थे, आत्महत्या की सूचना भी उनको ही देनी थी। और, मनोविज्ञान कहता है कि मौत की वजह भी इन्हीं परिजनों के बीच हो सकती है। शादी के बाद जब पत्नी लड़के के मां-बाप से एडजस्ट नहीं कर पाती है तो सबसे ज्यादा पीड़ा बेटे को होती है क्योंकि उसे 'लायक' बनने के पीछे दरअसल वही मां-बाप होते हैं। न पत्नी को छोड़ते बनता है, न मां-बाप को। यह दबाव युवक पर और अधिक होता है अगर वह दहेज की दौलत से खरीद लिया गया हो। बिक जाने का अहसास, पत्नी को खुश रखने की जरूरत और मां-बाप को दुखी नहीं करने की बेचैनी की कोई दवा नहीं है समाज में।

मृतक नहीं होता आत्महत्या का दोषी

मृतक नहीं होता आत्महत्या का दोषी

कायदे से सोचें तो मुकेश पांडे अपनी आत्महत्या के लिए जिम्मेदार नहीं हैं। उन्होंने तो समस्या से नहीं लड़ पाने की विवशता के आगे सर्वोच्च त्याग किया है। ऐसा करके उन्होंने अपने दुखी मां-बाप को उनके जीते-जी श्रद्धांजलि दी है। लेकिन, इसका मतलब ये भी नहीं है कि दोष पत्नी और ससुरालवालों का है। ये लोग उस परिस्थिति की वजह हो सकते हैं जिसमें यह घटना घटी हो, लेकिन मौत की वजह इन्हें ठहराना न्यायसंगत नहीं होगा।

जान बचाने वाली डॉक्टर ही दे बैठी जान

जान बचाने वाली डॉक्टर ही दे बैठी जान

पुणे में महिला डॉक्टर बीमारी से परेशान थी। इसलिए बिल्डिंग से कूदकर जान दे दी। कितनी आश्चर्यजनक है यह घटना! एक डॉक्टर बीमारी का उपचार करता है, समाधान देता है। लेकिन, जब वह खुद बीमार हुआ तो उसने मौत को गले लगा लिया? पुणे के कोंढवा में सुखसागर इलाके की यह घटना है जहां डॉ इंदू डोंगरे ने बीमारी से जूझने के बजाए मौत को गले लगाना ही उचित समझा। पति-पत्नी दोनों डॉक्टर हैं और यह घटना उनके अपने ही नर्सिंग होम में घटी, जहां चौथे मंजिल से कूदकर डॉ इंदू ने अपनी जान दे दी।

क्यों सांत्वना देने में फेल रहे परिजन?

क्यों सांत्वना देने में फेल रहे परिजन?

निश्चित रूप से जब कोई व्यक्ति जान दे रहा है तो वह कम से कम जाने देने का विवेक तो रखता ही है, उसका मतलब भी समझता होगा। एक डॉक्टर के रूप में डॉ इंदू को भी अपनी बीमारी का अहसास होगा। लंबे समय से बीमारी से जूझते हुए वह अचानक असहाय कैसे हो गयी? उसके पति डॉक्टर से पूछे जाने की जरूरत है कि उन्हें मानसिक रूप से मजबूत करने के लिए क्या उन्होंने कुछ नहीं किया? अगर किया और फिर भी फेल हो गये, तब भी यह जानकारी महत्वपूर्ण है। (तस्वीर में-मुकेश पांडे का सुसाइड नोट)

जब कोई व्यक्ति आत्मग्लानि के भाव से भर जाए

जब कोई व्यक्ति आत्मग्लानि के भाव से भर जाए

जब कोई व्यक्ति आत्मग्लानि के भाव से भर जाए, खुद को दूसरों पर बोझ महसूस करने लगे, जीवन उसे बेमतलब लगने लगे, किसी को अपनी मौत से ही सबक सिखाने का भाव आ जाए, तो ऐसे ही हालात में आत्महत्याएं होती हैं। निस्संदेह इनमें से कोई ऐसा कारण नहीं है जिसका उपचार न किया जा सके।

 आत्महत्याओं से सबक लेने का जज्बा ही नहीं दिखता

आत्महत्याओं से सबक लेने का जज्बा ही नहीं दिखता

दिक्कत ये है कि आत्महत्या की घटनाओं से सबक लेने का जज्बा समाज में नहीं दिखता। ये तनाव कैसे कम होगा, ये दबाव कैसे घटे- इस पर ठहरकर सोचने के बजाए हम इन घटनाओं को भूलकर अगली घटनाओं का इंतज़ार करने लगते हैं। आत्महत्या की घटना को क्लोज्ड केस मानकर देखने की आदत हो गयी है हमें।

जरूरत इस बात की है

जरूरत इस बात की है

जबकि, जरूरत इस बात की है कि आत्महत्या की घटनाओं की नये सिरे से मुकम्मल जांच हो। न सिर्फ किसी को सज़ा देने-दिलाने के मकसद से, बल्कि इसके वास्तविक कारणों को जानने और अगली घटनाएं रोकने के मकसद से ऐसा किया जाना चाहिए।

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English summary
suicidal tendencies among people- mukesh pandey -dm buxer,
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