स्वरोज़गार और रोज़गार निर्माण: मोदी जी की मुद्रा योजना की प्रगति के बारे में जानें

By: नितिन मेहता और प्रणव गुप्ता
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मोदी सरकार ने चुनाव से पहले प्रतिवर्ष जॉब मार्केट में आने वाले लाखों युवाओं को रोज़गार प्रदान करने का वादा किया था। मुद्रा योजना (माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रिफाइनेंस एजेंसी) का वास्तविक उद्देश्य रोज़गार प्रदान करना है। परन्तु इसका अर्थ रोज़गार उत्पन्न करना नहीं हैं बल्कि लोगों को स्वरोजगार के अवसर उपलब्ध करवाना है। लघु उद्यमों और नए उद्यमियों को बढ़ावा देने के उद्देश्य के साथ ही मुद्रा योजना रोज़गार मुहैया करने के लिए मोदी जी के योजना ढाँचे का एक महत्वपूर्ण आयाम है।

mudra yojana

2015 के यूनियन बजट में इस योजना की घोषणा की गयी और अगस्त 2015 में प्रधानमंत्री जी ने औपचारिक रूप से इसे शुरू किया। इस लेख में पिछले दो वर्षों में मुद्रा योजना की प्रगति के बारे में जांच की गयी है। हालाँकि पहले भी कई सरकारों ने लघु उद्यमियों और स्व-नियोजित लोगों को दिए जाने वाले क्रेडिट में सुधार के लिए कई प्रावधान रखने की पहल की थी। इन कार्यक्रमों के सीमित प्रभाव के कारण ही मुद्रा योजना की आवश्यकता महसूस हुई।

मुद्रा योजना क्या है?

मुद्रा योजना के तहत सरकार माइक्रो उद्यमों को वित्त उधार देने वाले माइक्रो क्रेडिट संस्थानों और गैर बैंकिंग वित्तीय निगमों को पुनर्वित्त प्रदान करती है। एनएसएसओ 2013 के अनुसार देश में 5 करोड़ से भी अधिक छोटी व्यापार इकाईयां हैं। इन उद्योगों में से अधिकाँश व्यक्तिगत स्वामित्व वाले हैं और हमारी अर्थव्यवस्था का एक बहुत बड़ा अनौपचारिक क्षेत्र है। इनमें से अधिकाँश फर्मों/लोगों के लिए औपचारिक क्रेडिट अनुपलब्ध होता है और क्रेडिट के लिए वे अनौपचारिक स्त्रोतों पर निर्भर होते थे। इस कार्यक्रम के तहत आवेदक तीन तरह की श्रेणियों के अंतर्गत आवेदन कर सकता है।

शिशु: 50,000 रूपये तक का ऋण

तरुण: 50,000 रूपये से लेकर 5 लाख तक का ऋण

मधुर: 5 लाख से अधिक का ऋण

मुद्रा लाभार्थी कौन हो सकता है?

मुद्रा लाभार्थी वह व्यक्ति/उद्यम हो सकता है जिसे औपचारिक स्त्रोतों से क्रेडिट मिलने में समस्या आती है और उसे क्रेडिट के लिए महंगे स्त्रोतों जैसे स्थानीय सूदखोरों आदि पर निर्भर रहना पड़ता है। ये गैर मशीनीकृत विनिर्माण, श्रम प्रधान उद्यम, व्यापार या सेवा प्रदान करने वाला उद्यम आदि हो सकते हैं। छोटे दुकानदार, फल/सब्जी विक्रेता, छोटी वर्कशॉप/रिपेयर शॉप आदि भी मुद्रा प्रणाली के अंतर्गत आते हैं। वार्षिक आधार पर ऋण के वितरण में उचित समेकन

यह बात प्रोत्साहित करने वाली है कि पिछले वित्त वर्ष में मुद्रा योजना में काफी सुधार हुआ है। उदाहरण के लिए वर्ष 2016-17 में लगभग 4 करोड़ ऋण दिए गए जबकि वर्ष 2015-16 में 3.5 करोड़ ऋण दिए गए थे। यहाँ तक कि माइक्रोफाइनेंस संस्थानों, बैंक और एनबीएफसी द्वारा लेनदारों को दी जाने वाली राशि में भी वृद्धि हुई है। वर्ष 2016-17 में 1.75 लाख करोड़ रूपये बांटे गए जो वर्ष 2015-16 में बांटे गए रुपयों की तुलना में 33,000 करोड़ अधिक थे।

एक तिहाई से अधिक (36%) ऋण नए उद्यमियों द्वारा लिए गए

इससे यह संकेत मिलता है कि मौजूदा उद्यम जिन्हें अपने विस्तार के लिए पैसे या पूंजी की आवश्यकता है, केवल उन्हें ही इस योजना से फायदा नहीं नही मिलेगा। इस योजना से नए उद्यम प्रारंभ हुए हैं। हालाँकि यह पता लगाने के लिए एक विस्तृत विश्लेषण आवश्यक है कि जॉब मार्केट में कितने अनुपात में नए उद्यमी है और कितने लोग जॉब से स्वरोज़गार में स्थानांतरित हुए हैं।

पांच में से चार मुद्रा लोन महिला लाभार्थियों को दिए गए हैं

यह बेहद दिलचस्प है क्योंकि पारंपरिक तौर पर महिलाओं की औपचारिक क्रेडिट तक पहुँच बहुत कम थी। इस परम्परा का क्या कारण था? महिलाओं की औपचारिक क्रेडिट तक कम पहुँच होने का कारण प्रमाणन की कमी था। शिशु श्रेणी के ऋण के लिए प्रमाणन की आवश्यकता नहीं होती। यही कारण है कि यह कार्यक्रम बहुत सी महिलाओं तक पहुंचा। इसका एक अन्य कारण यह भी है कि इसमें महिलाओं को ब्याज में 25 अतिरिक्त बेस पॉइंट की छूट दी गयी है।

90 प्रतिशत से अधिक ऋण शिशु श्रेणी के अंतर्गत दिए गए

इससे यह संकेत मिलता है कि यह कार्यक्रम सबसे छोटे उद्यम तक पहुँचने में बहुत सफल रहा है। यह महत्वपूर्ण है कि औपचारिक क्रेडिट प्रणाली अनौपचारिक सेक्टर तक पहुँच रही है क्योंकि इस सेक्टर में बहुत अधिक संख्या में श्रम बल काम करता है। इनमें से कई उद्यम एकल व्यक्ति उद्यम हैं। सरकार को अब अपना ध्यान उन उद्यमियों की ओर केंद्रित करना चाहिए जो एक सफल उद्यम चला रहे हैं और अपने काम का विस्तार करना चाहते हैं। इसे आगे चलकर नौकरियों की संभावनाएं बहुत अधिक बढेंगी।

मुद्रा योजना के आधे से अधिक लाभार्थी सीमित समुदायों के हैं: 35 प्रतिशत ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग), 20 प्रतिशत एससी( अनुसूचित जाति) और 5 प्रतिशत आदिवासी।

स्वरोज़गार और व्यापार के लिए ऋण की व्यवस्था होने से इन समुदायों में नौकरियों की संभावनाएं बढेंगी। अतीत में कई ऐसे उदाहरण सामने आये हैं जब सत्तारूढ़ पार्टी ने सरकारी योजनाओं का फायदा अपने समर्थकों को पहुँचाया है या राजनीतिक समर्थन के साथ सरकारी योजनाओं के लाभों को बांटा है।

अंत में स्थानीय नेता के पास ही शक्ति होती है कि वह निश्चित करे कि किसे लाभ मिलेगा और कौन लाभ से वंचित रहेगा। यह यह बात बहुत अधिक ध्यान देने योग्य और महत्वपूर्ण है कि मुद्रा योजना के लाभ में किसी प्रकार के पक्षपात या राजनीतिक पूर्वाग्रह की कोई रिपोर्ट अभी तक नहीं मिली है। संभावित लेनदारों को केवल देनदारों से जुड़ने की आवश्यकता होती है और इसमें किसी भी राजनीतिक मध्यस्थ की आवश्यकता नहीं होती।

निष्कर्ष

मुद्रा, तकलीफ मुक्त स्थानीय स्वरोजगार के लिए मोदी सरकार द्वारा किया गया एक प्रयास है और इसके द्वारा छोटे उद्यमों को ज़मीनी स्तर पर जॉब प्रदान करने वाले इंजन के रूप में विकसित करने का प्रयत्न किया जा रहा है। हालाँकि आवश्यकता इस बात की है कि योजना के लाभार्थियों को उचित निगरानी और मार्गदर्शन प्रदान किया जाए। सरकार को एक संचालन समर्थन के साथ ऋण वितरण की कार्यवाही करनी चाहिए। उसी के साथ हमें यह याद रखना चाहिए कि मुद्रा योजना सरकार की रोज़गार सृजन नीति का केवल एक आयाम है। रोज़गार को सुचारू रूप से बढ़ाने के लिए मुद्रा के अलावा और अधिक प्रयास करने की भी आवश्यकता है।

(नितिन मेहता, रणनीति कंसल्टिंग एंड रिसर्च के मैनेजिंग पार्टनर हैं, प्रणव गुप्ता एक स्वतंत्र शोधकर्ता हैं।)

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English summary
self employment and job creation tracking the progress of mudra yojana under narendra modi
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