आखिर क्‍यों अभी तक चैन की नींद नहीं सोया है #OROP का भूत

एक बार फिर से ओआरओपी के मुद्दे को सूबेदार राम किशन ग्रेवान की मौत ने फिर दिया सियासी रंग। छह सितंबर 2015 को ओआरओपी की घोषणा के बाद भी आज तक शांत नहीं हुआ है मुद्दा।

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नई दिल्‍ली। पिछले वर्ष छह सितंबर को केंद्र सरकार ने वन रैंक वन पेंशन (ओआरओपी) को लागू करने की घोषणा की थी। लोगों को लगा कि अब यह मुद्दा और इस पर जारी बहस ठहर जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बुधवार को रिटायर सूबेदार राम किशन ग्रेवाल की आत्‍महत्‍या से बड़ी मुश्किल से बोतल में बंद हुआ ओआरओपी का जिन्‍न फिर से बाहर आ गया।

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सरकार से निराश पूर्व सैनिक

कहा जा रहा है कि ग्रेवाल इस मुद्दे पर सरकार के पीछे हटने की वजह से विरोध करने के लिए दिल्‍ली आए थे। कई पूर्व सैनिकों का कहना है कि ओआरओपी लागू होने के बावजूद इससे जुड़ी उनकी चिंताएं अभी तक बरकरार हैं।

एक नजर डालिए कि आखिर वह कौन सी वजहें हैं जो हर बार इस ओआरओपी की 'चिंगारी' को भड़का कर इसे आग बना देती हैं।

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क्‍या चाहते हैं वेटरेंस और क्‍या किया सरकार ने

  • वेटरेंस का कहना है कि इस स्‍कीन को एक अप्रैल 2014 से प्रभावी करना चाहिए और वर्ष 2015 को बेस ईयर मानना चाहिए। 
  • वर्तमान समय में यह स्‍कीम एक जुलाई 2014 से प्रभावी है और वर्ष 2013 को बेस ईयर माना गया है। 
  • वेटरेंस हर वर्ष इस स्‍कीम को रिन्‍यू करने की मांग कर रहे हैं लेकिन सरकार हर पांच वर्ष में ऐसा करना चाहती है। 
  • सरकार की ओर से ओआरओपी के हर पहलू का अध्‍ययन करने के लिए एक न्‍यायिक पैनल बनाया गया था।
  • वेटरेंस चाहते हैं कि ओआरओपी के लिए जो न्‍यायिक पैनल बनाया गया सरकारी उसकी सिफारिशों को सार्वजनिक करे। 
  • सरकार ने पहले कहा था कि जो सैनिक वीआरएस लेंगे वह ओआरओपी के पात्र नहीं होंगे। 
  • सरकार के मुताबिक जो सैनिक इस स्‍कीम के लागू होने से पहले रिटायर हुए हैं उन्‍हें भी इसका फायदा मिलेगा। 
  • करीब 40 प्रतिशत सैनिक जल्‍दी रिटायर हो जाते हैं और ऐसे में सरकार का यह प्‍वाइंट बहस का मुद्दा बन गया। 
  • सरकार की ओर से एरियर की पहली किश्‍त भी अदा कर दी गई है। 
  • बाकी बचे एरियर को चार अर्धवार्षिक किश्‍तों में अदा किया जाएगा। 
  • इसकी वजह से करीब 10,000 करोड़ रुपए का बोझ खजाने पर पड़ने की संभावना है।

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English summary
The issue relating to One Rank One Pension has once again hogged headlines the death of former army jawan, Ram Kishan Grewal.
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