लेफ्ट बनाम आरएसएस: केरल में विचारधारा और वोट बैंक की हिंसक लड़ाई

Written By: Amit
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नई दिल्ली। केरल के उत्तर में कन्नुर नाम की एक जगह है और यहां कई सालों से वामपंथी और आरएसएस कार्यकर्ताओं के बीच खूनी जंग चल रही है। पिछले 10 सालो में यहां करीब 100 हत्याएं हो चुकी है। पिछले दिनों आरएसएस के कार्यकर्ता की हत्या, फिर उनके कार्यालय को आग के हवाले करना और केरल के सीएम का सिर काट लेने पर इनाम घोषित करने जैसी तमाम घटनाओं ने इस जंग को राष्ट्रीय बहस बना दिया है। यह खुनी खेल पिछले दो या तीन साल में शुरू नहीं हुआ है। दक्षिण के इस राज्य में लेफ्ट बनाम आरएसएस की लड़ाई सन् 1960 से चली आ रहा है। केरल में लेफ्ट और आरएसएस के कार्यकर्ताओं के बीच ना सिर्फ विचारिक लड़ाई है बल्कि वोट बैंक लड़ाई भी है।

वामपंथियों का गढ़ है कन्नुर

वामपंथियों का गढ़ है कन्नुर

अरब सागर के तट पर बसा हुआ कुन्नुर को वामपंथियों का गढ़ कहा जाता है। केरल में पहली बार 1930 में यहीं से कम्युनिस्ट मूवमेंट शुरू हुआ था। कन्नुर ने एके गोपालन जैसे कई बड़े कम्यूनिस्ट नेता दिए है। 1939 में कन्नुर के पिनराई गांव में पहली बार सीपीआई (कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया) पार्टी की स्थापना हुई थी। कन्नुर से निकला कम्युनिस्ट आंदोलन आजादी के बाद जोर पकड़ा और अपनी जड़ों के मजबूत करने के लिए त्रावणकोर और कोच्चि तक लाल परचम फहरा दिया। 1957 में केरल के फर्स्ट असेंबली इलेक्शन में ही सीपीआई ने सरकार बना दी। राजनीति के पंडित बताते है कि केरल के लोगों में कम्युनिस्ट खून है और शायद कारण है कि इस राज्य में ज्यादातर लेफ्ट पार्टियों ने ही राज किया है।

1960 में आरएसएस की दस्तक

1960 में आरएसएस की दस्तक

1948 में आरएसएस नेता गोलवलकर ने पहली बार केरल के तिरुवनंतपुरम में एक भाषण दिया जिसमें उन्होंने राज्य के कम्यूनिस्ट पार्टी पर जमकर हमला बोला। 1952 में गोलवलकर फिर आए और उसी अंदाज में केरल की जनता को सबोंधित किया, यहीं से राज्य में पहली बार हिंसक राजनीति की शुरुआत हुई। लेकिन केरल में वामंपथी बनाम आरएसएस का असली खेल 1960 में तब शुरू हुआ जब राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने लेफ्ट को चुनौती देने के लिए पहली बार कन्नुर में दस्तक दी। जब 1968 में बीड़ी वर्कर्स के लिए केरल की सरकार ने एक एक्ट लाया तो वर्कर्स नाराज होकर हड़ताल पर चले गए। फिर बीड़ी फैक्ट्रियों के मालिक ने आरएसएस के कहने पर अपनी फैक्ट्रियां को मंगलोर (कर्नाटत) में शिफ्ट कर दिया। इसके बाद आरएसएस ने केरल में बीड़ी वर्कर्स को रोजगार देना शुरु किया, जो लेफ्ट बिल्कुल नहीं चाहता था। शुरू में इसको लेकर कई हिंसक घटनाएं भी हुई लेकिन 1971 में जाते-जाते हिंदु-मुसलमानों के दंगे हो गए। इस घटना ने केरल में लेफ्ट और आरएसएस को ना सिर्फ राजनीतिक बल्कि एक व्यक्तिगत दुश्मन भी बना दिया।

कम्युनिस्ट के लोगों ने आरएसएस से नाता जोड़ा

कम्युनिस्ट के लोगों ने आरएसएस से नाता जोड़ा

केरल में आरएसएस ने कम्युनिस्ट लोगों को लुभाना शुरू किया जिसका असर यह हुआ कि कई कम्युनिस्ट आंदोलकारी भी आरएसएस में चले गए। उस दौरान आरएसएस ने कन्नुर और राज्य के कई जगहों पर निराश कॉमरेड को आपाताकाल के खिलाफ अपने राजनीतिक असंतोष को व्यक्त करने के लिए ट्रेनिंग दी। इसका असर आपातकाल के खिलाफ तो कुछ खास नहीं हुआ लेकिन लेफ्ट एक्टिविस्ट जो आरएसएस में आए थे, वे आपातकाल के बाद आरएसएस के बड़े एक्टिविस्ट बनकर उभरे। यहीं से केरल में विचारधार की खुनी लड़ाई शुरू हुई।

थिय्या समुदाय है सबसे ज्यादा पीड़ित

थिय्या समुदाय है सबसे ज्यादा पीड़ित

इस लड़ाई में केरल के थिय्या समुदाय के लोग सबसे ज्यादा पीड़ीत है। केरल में थिय्या समुदाय ही है जिन्होंन कम्युनिस्ट आंदोलन में सबसे ज्यादा बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था, इन्हें कम्युनिस्ट पार्टी का रीढ़ की हड्डी माना जाता है। आज वे ही सबसे ज्यादा पीड़ित है,

इस हिंसा में करीब 90 प्रतिशत थिय्या समुदाय के लोगों की हत्याएं हुई है। एक रिपोर्ट के अनुसार पिछले दस साल में केरल में 112 राजनीतिक हत्याएं हुई है जिसमें 50 लेफ्ट और 45 आरएसएस-बीजेपी के कार्यकर्ता शामिल है।

वोट बैंक की लड़ाई

वोट बैंक की लड़ाई

केरल में शुरु से ही लेफ्ट का दबदबा रहा है। आरएसएस अपनी जमीन को मजबूत करने के लिए पिछले 50 साल से यहां संघर्ष कर रहा है और हिंदु वोट को लुभाने की कोशिश आज भी जारी है। ये बात अलग है कि आरएसएस को केरल में अभी कामयाबी नहीं मिली है लेकिन लेफ्ट को वोट के ध्रुविकरण का डर हमेशा से ही रहा है।

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English summary
Left vs RSS: Blood feud of ideology and votes in Kerala
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