नज़रिया: 'नेहरू के खूंटे से नहीं बंधा रह सकता भारत'

By: प्रोफ़ेसर राकेश सिन्हा - राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विचारक
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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद
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राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद

स्वतंत्र भारत के इतिहास में पहली बार ऐसा हुआ जब राष्ट्रपति के शपथ लेते ही उन पर कटाक्ष किया गया, संकीर्णता का आरोप लगाया गया और विवादित बनाने की कोशिश की गई.

रामनाथ कोविंद ने भारत के 14वें राष्ट्रपति के रूप में शपथ लेने के बाद जो राष्ट्र के नाम संदेश दिया उसमें भारत की वास्तविकता और चकाचौंध के बीच असली चुनौती का दर्पण है.

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उन्होंने ऐसे करोड़ों लोगों की वेदना को अभिव्यक्त किया जो न्यूनतम ज़रूरतों के अभाव में आज भी गुजर-बसर कर रहे हैं. वे स्वयं भी उसी प्रकार की ज़िंदगी गुजारकर राष्ट्रपति भवन तक पहुंचे. इस भाषण में वास्तव में संरचनात्मक लोकतंत्र को सारगर्भित लोकतंत्र में परिणत करने का एक संदेश छिपा हुआ है.

वंशवाद के चक्रव्यूह में लिप्त कांग्रेस को यह महत्वपूर्ण संदेश अनुपयोगी लगा. उसकी नज़र सिर्फ़ इस बात पर थी कि कोविंद ने किन-किन महापुरुषों का नाम अपने भाषण में लिया. नेहरू-गांधी परिवार का प्राइवेट लिमिटेड कंपनी बन गए कांग्रेस के नेता भारत को उस परिवार से बाहर देखने में असमर्थ और नाक़ाबिल सिद्ध हो रहे हैं.

मोहन भागवत
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मोहन भागवत

कांग्रेस आगबबूला क्यों?

कोविंद ने अपने भाषण में डॉक्टर राजेन्द्र प्रसाद, महात्मा गांधी, बाबासाहेब आम्बेडकर और पंडित दीनदयाल उपाध्याय जैसे महापुरुषों का उल्लेख किया. कांग्रेस जवाहरलाल नेहरू का नाम नहीं लिए जाने पर आगबबूला हो गई.

उसे ऐसा लगने लगा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के लोग सिलसिलेवार ढंग से नेहरू के कद को छोटा कर रहे हैं. राष्ट्रपति के भाषण पर यह चौकीदारी इस पद की अहमियत, सम्मान और इससे जुड़ी हुई हमारी ऐतिहासिक राजनीतिक परंपरा का पहला सबसे बड़ा अपमान है.

कोई भी व्यक्ति चाहे वह अमरीका का राष्ट्रपति हो, ब्रिटेन का प्रधानमंत्री हो अथवा कोई सामान्य व्यक्ति उसे इस बात की स्वाभाविक और नैसर्गिक आज़ादी होनी चाहिए कि वह इतिहास का मूल्यांकन अपनी नज़र से करे.

ऐसा करने में व्यक्ति तीन बातों से निर्देशित होता है, पहला, अपना विवेक, दूसरा, भावना और तीसरा प्रेरणा का स्रोत अर्थात जिन लोगों से वह अधिक प्रभावित है. यही कारण है कि अलग-अलग लोगों ने अपने भाषणों में कुछ नए नामों को जोड़ा है और कुछ नामों को हटाया है.

लोकतंत्र की यही ख़ासियत होती है. प्रतिभा पाटिल जब राष्ट्रपति बनीं तो उन्होंने सरोजिनी नायडू के नाम का उल्लेख किया था.

नेहरू
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नेहरू का योगदान

नेहरू का भारत के इतिहास में अपने ढंग से योगदान निश्चित रूप से रहा है. वे भारत के प्रथम प्रधानमंत्री थे. लेकिन भारत के इतिहास को नेहरू के खूंटे से नहीं बांधा जा सकता है.

स्वतंत्रता आंदोलन में योगदान करने वाले हज़ारों-लाखों बेनाम लोग मोतीलाल नेहरू जैसे बड़े पिता के पुत्र नहीं थे तो इसका मतलब यह नहीं कि वे इतिहास के पन्नों से हटा दिए जाएंगे. नेहरू किसी को आकर्षित करते हैं तो किसी को विकर्षित भी करते हैं.

दोनों के लिए अपने-अपने कारण हैं. लेकिन जब लोग फांसी के फंदों को हंसते-कूदते चूम रहे थे, साम्राज्यवाद से प्रताड़ित हो रहे थे तब अनेक लोग थे जो 'रायबहादुर' और 'रायसाहब' की शैली में जीवन जी रहे थे. इस तथ्य को इतिहास से नज़रअंदाज नहीं किया जा सकता है.

पंडित नेहरू के जीवन मूल्यों में भी भारत के तत्कालीन संदर्भ में लोकप्रिय संस्कृति से प्रतिकूलता दिखाई पड़ती है. खैर, यह बात उतने महत्व की नहीं है. भारत के निर्माण में डॉ राजेन्द्र प्रसाद की सबसे बड़ी भूमिका राष्ट्रवाद को पुनर्परिभाषित करने की थी. यह बात सोमनाथ मंदिर के जीर्णोद्धार के समय नेहरू से उनके टकराव में साफ़ दिखाई पड़ता है.

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'पाठ्यपुस्तक में नेहरू का 14 बार नाम'

इससे भी बढ़कर राजनीति में सर्वोच्चता के साथ अपने जीवन मूल्यों में कुलीनता को नहीं आने देना और साफ सुथरी शैली में उज्ज्वल चरित्र के साथ जीवन जीना उनकी ख़ासियत थी जो पीढ़ियों को प्रभावित करती रहेगी.

इस संदर्भ में राजस्थान के समाजशास्त्र के पाठ्यपुस्तक को उल्लेख करना ज़रूरी है.

कांग्रेस का कहना है कि वहां भी नेहरू का नाम हटाया गया है. परन्तु ऐसा नहीं है. नेहरू का उल्लेख पाठ्यपुस्तक में 14 बार हुआ है. भारत का इतिहास न तो नेहरू से शुरू होता है और न ही उनसे समाप्त.

आलोचकों को इस बात का भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी की महानता और लोकप्रियता को कोई भी ताक़त कम नहीं कर सकती.

सुकरात को फांसी पर चढ़ा दिया गया. फांसी पर चढ़ाने वाले का नाम लोग नहीं जानते हैं लेकिन सुकरात प्रेरणा के स्रोत बने हुए हैं. भारत में सुभाषचन्द्र बोस को पाठ्यपुस्तक में हाशिए पर रखा गया. उनपर नाजीवादी समर्थक होने का दुष्प्रचार किया गया.

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इतिहास का पुनर्मूल्यांकन

लेकिन लोगों में बोस किसी की भी तुलना में कम लोकप्रिय नहीं रहे. उन्हें अपनी महानता सिद्ध करने के लिए किसी के भाषण और लेखन का मोहताज नहीं होना पड़ा.

ट्रॉट्स्की को स्टालिन ने प्रतिक्रांतिकारी ताकतों का एजेंट घोषित कर बदनाम किया और उनकी हत्या कर दी पर इससे ट्रॉट्स्की की लोकप्रियता कम नहीं हो पाई.

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नेहरू इतिहास की पुस्तकों में अपने कद से ज़्यादा स्थान लेकर बैठे हुए थे और आधुनिक भारत के इतिहासकारों ने नेहरू का अतिशय महिमामंडन कर यह दिखाने की कोशिश की कि उनकी सोच-समझ और व्यक्तित्व का कोई समानांतर नहीं हो सकता.

इतिहास का पुनर्मूल्यांकन एक सतत प्रक्रिया है. इस प्रक्रिया में अनेक ऐसे लोग महानायक के रूप में उभरते हैं जिन्हें या तो जानबूझकर छोड़ दिया गया या इतिहास लेखकों के पूर्वाग्रह के शिकार रहे. भारत का इतिहास इसी असंतुलन से गुजर रहा है.

इसका दो महत्वपूर्ण उदाहरण देखा जा सकता है. स्वतंत्रता संग्राम में महारानी लक्ष्मीबाई के योगदान का साहित्य से लेकर इतिहास की पुस्तकों तक प्रचुर मात्रा में उल्लेख है. वे प्रेरणा की स्रोत भी रही हैं.

लेकिन बाद के दिनों में इतिहास का दायरा बढ़ा तो अनेक ऐसी महिला स्वतंत्रता सेनानियों का नाम आया, जिनमें दक्षिण भारत की कित्तूर रानी चेन्नम्मा, उत्तर-पूर्व की रानी गाइदिन्ल्यू और उत्तर प्रदेश की दलित महिला ऊदा देवी, जिन्होंने अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए, के नाम उभरे और झांसी की रानी के साथ इन नामों का उल्लेख होने लगा.

तो क्या रानी झांसी का अवमूल्यन हो गया? कांग्रेस इस तथ्य को समझ नहीं सकती है क्योंकि वंशवाद के विषाणु ने उसके विवेक को समाप्त कर दिया है.

कभी कांग्रेसियों ने की थी दीनदयाल की तारीफ़

कांग्रेस की ऐसी ही एक और आपत्ति इस भाषण में है कि कोविंद ने पंडित दीनदयाल उपाध्याय का नाम महात्मा गांधी के साथ कैसे लिया? कांग्रेस की विवेक शून्यता किस हद तक है वह इस बात से पता चलता है.

उसने पूछा कि दीनदयाल का क्या योगदान है? वे न तो मंत्री रहे न सांसद रहे और ना ही स्वतंत्रता संग्राम में शामिल रहे. कांग्रेस की वर्तमान पीढ़ी और 50 के दशक की पीढ़ी में कितना बड़ा अंतर है इसे इस बात से समझा जा सकता है.

दीनदयाल उपाध्याय के असामान्य गुणों और उनके भारतीय सामाजिक-राजनीतिक जीवन में योगदान को सबसे अधिक किसी ने रेखांकित किया है तो वह और कोई नहीं बल्कि नेहरू के समकालीन और अपने युग के सबसे लोकप्रिय तथा विचारों के दृष्टि से सिद्धांतकार माने जाने वाले कांग्रेस के वरिष्ठ नेता संपूर्णानन्द थे.

वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी रह चुके थे. उपाध्याय की मृत्यु के बाद उनके लेखन का संकलन 'पॉलिटिकल डायरी' प्रकाशित हुई जिसका प्राक्कथन और कोई नहीं बल्कि सम्पूर्णानन्द ने लिखा. इन लेखों में अनेक लेख समकालीन शासन व्यवस्था पर प्रहार था.

सम्पूर्णानन्द ने प्राक्कथन लिखने के तीन कारण बताए थे, पहला, दीनदयाल उपाध्याय का निर्मूल चरित्र था और सार्वजनिक जीवन में मापदंड की तरह है. दूसरा, उनका देश प्रेम और समर्पण उच्चकोटि का था और तीसरा, यह लेख भविष्य के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए एक मार्गदर्शन की तरह होगा.

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जातिगत राजनीति और दीनदयाल

यह अंतर है कांगेस के संपूर्णान्द की पीढ़ी और आनंद शर्मा के पीढ़ी के बीच का. दीनदयाल उपाध्याय के संदर्भ में एक घटना सिर्फ़ भारत ही नहीं दुनिया के राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए भी मिसाल की तरह है.

1963 में लोकसभा के चार क्षेत्रों में उपचुनाव हो रहा था और विपक्ष के चार दिग्गज नेता इन क्षेत्रों में कांग्रेस को चुनौती दे रहे थे. स्वतंत्र पार्टी के मीनू मसानी, समाजवादी आचार्य जेबी कृपलानी, दूसरे समाजवादी डॉ राम मनोहर लोहिया और पंडित दीनदयाल उपाध्याय.

उपाध्याय उत्तर प्रदेश के जौनपुर से चुनाव लड़ रहे थे. वे जनसंघ के सबसे कद्दावर नेता थे. उनकी बातों को देश की राजनीति में वज़नदार समझा जाता था. सिर्फ उनकी जीत को ही सुनिश्चित माना जा रहा था. बाकी तीन सीटों पर भविष्यवाणी करना कठिन था.

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जौनपुर की सीट जनसंघ के सांसद की मृत्यु के कारण खाली हुई थी और भारत के प्रचलित राजनीतिक अंकगणित में जातीय समीकरण उपाध्याय के पक्ष में था.

लेकिन उपाध्याय ने अपने पूरे चुनाव प्रचार के दौरान उस जातीय समीकरण से ऊपर उठकर चुनाव प्रचार किया. उन्होंने जातीय ध्रुवीकरण और जातियों के परस्पर गठबंधन को समाज के लिए नुकसानदायक बताया. उनके समर्थक भी इस बात से निराश थे.

उन्हें लग रहा था कि जनसंघ जानबूझकर अपनी सीट को खो रही है. जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आने लगा उपाध्याय संकीर्ण मानसिकता पर आक्रामक होते गए और वैसे-वैसे ही उनकी हार भी सुनिश्चित होती गई. बाकी तीन विपक्ष के उम्मीदवार चुनाव जीत गए और दीनदयाल हार गए.

'दीनदयाल हार गया, जनसंघ जीत गई'

हारने के बाद दीनदयाल उपाध्याय का संदेश था, 'दीनदयाल हार गया, जनसंघ जीत गई.' वास्तव में यह भारत के लोकतंत्र के लिए एक ऐसा प्रकाश स्तम्भ है जो युगों-युगों तक पीढ़ियों को प्रभावित करती रहेगी. इसी उपचुनाव के दौरान नेहरू ने आचार्य जेबी कृपलानी को चुनाव में हराने के लिए संकीर्णता और तिकड़म दोनों का सहारा लिया.

वे कृपलानी को संसद में आने से रोकना चाहते थे. कृपलानी उत्तर प्रदेश के अमरोहा से चुनाव लड़ रहे थे. कांग्रेस की ज़िला ईकाई से लेकर केन्द्रीय नेतृत्व ने राम शरण के नाम का अनुमोदन किया लेकिन नेहरू ने अंतिम समय में चतुराई और रहस्यमय तरीके से राम शरण का नाम हटाकर अपने कैबिनेट के ऊर्जा मंत्री जो आस्था से मुस्लिम थे, को उम्मीदवार बना दिया.

इसके पीछे नेहरू की मंशा अल्पसंख्यक वोटों को बटोरने की थी. यद्यपि वे सफल नहीं हो पाए लेकिन भारतीय राजनीति में वोट बैंक की स्थापना उन्होंने कर दी. यदि यह घटना भी आनंद शर्मा को समझ में नहीं आ सकती है तो इसमें उनकी ग़लती है न कि कोविंद की.

राजनीतिक संरचनाओं पर बैठे लोग ही महान हो सकते हैं यह एक निकृष्ट धारणा है. अगर ऐसा होता तो स्वयं महात्मा गांधी, विनोबा भावे और जयप्रकाश नारायण मंत्री और प्रधानमंत्री तो दूर विधायक और सांसद भी नहीं रहे. तो क्या गांधी, विनोबा व जेपी की महानता एवं लोकप्रियता और प्रेरणा देने की क्षमता किसी से कम हो गई?

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देश कांग्रेस मुक्त, संघ युक्त

संघ की विचारधारा को लगातार राजसत्ता के प्रभाव एवं दबाव में हाशिए पर रखने की कोशिश होती रही. लेकिन इतिहास ने पलटी मारी. हाशिए पर खड़े लोग केन्द्र में हैं और देश की कार्यपालिका पूर्ण रूप से कांग्रेस मुक्त और संघ युक्त है.

यह सिर्फ़ कार्यपालिका और राजनीति में व्यक्तियों का विस्थापन नहीं बल्कि असली भारत के उदय का संकेत है जो यूरोप और मार्क्सवाद के चश्मों से अपने आप को नहीं देखकर अपनी महान बौद्धिक एवं सांस्कृतिक विरासत एवं जीवन मूल्यों के आईने में देख रही है.

इसमें संस्कृति भी है, समानता का बोध भी है और भौतिक उत्थान का लक्ष्य भी है. रामनाथ कोविंद के भाषण में इन्हीं तीनों का समन्वय है. उसमें व्यक्ति पूजा और वंशवाद तथा कुलीनता नहीं है.

उनके शपथ के बाद संसद कक्ष में 'जय श्रीराम' का नारा गूंजना भी कुछ लोगों को रास नहीं आया. ये वही लोग हैं जिन्हें भारत की विरासत नापसंद है. जो भारतीय तो हैं लेकिन दृष्टि में अभारतीयता कूट-कूट कर भरी हुई है.

'राम' शब्द और उससे उपजता हुआ भाव राजधर्म, सत्य-निष्ठा, शाश्वत-मूल्य और जनसमर्पण का द्योतक है. वह भारत की सभ्यता और सांस्कृतिक परम्परा को भी अपने आप में अभिव्यक्त करता है जिसमें विविधता और सहिष्णुता विद्यमान है.

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' जय श्रीराम ' के नारे से तिलमिलाहट क्यों?

इस सहिष्णुता में तो धर्म सम्प्रदाय क्या पेड़-पौधों और निर्जीवों का भी स्थान है. यह हमें पश्चिम की बहुसंस्कृतिवाद की कृत्रिम अवधारणा से अलग अपनी मौलिक जीवन शैली का आभाश कराता है. जिस जीवन शैली ने दुनिया भर के किसी भी हिस्से में प्रताड़ित किसी भी समुदाय को समान और सम्मान का स्थान दिया.

1921 की जनगणना बताती है कि भारत में एक लाख यहूदी थे जो बहुसंख्यक हिन्दुओं के कारण अपने आप को सुरक्षित एवं सम्मानित अनुभव करते थे. फिर इस नारे से इस पीढ़ी के एक वर्ग को उसके पूरे जीवन काल में आपत्ति तो होगी ही जो प्रगति और आधुनिकता के नाम पर भारत की संस्कृति और नायकों को धूल में मिला देना चाहती है. पर ऐसा नहीं होगा.

आखिर मार्क्सवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाले हिन्दी कवि सूर्यकांत त्रिपाठी 'निराला' ने 'राम की शक्ति पूजा' नामक महाकाव्य लिखा तो इसी विचारधारा के लोगों में ऐसी ही तिलमिलाहट हुई थी जैसा कि 'जय श्रीराम' का नारा गूंजने से अब हुई है.

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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English summary
India can not be tied to Nehru's pegs.
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