#Badtouch : 'बड़ों के सामने भैया गोद में बैठाते, बाद में किस करते'

By: भूमिका राय - बीबीसी संवाददाता
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''जब लोग अपने बचपन के क़िस्से बताते हैं तो मेरा मन घबराने लगता है. अच्छा नहीं लगता है जब वो पड़ोस के क़िस्से, दोस्तों के साथ मस्ती की बातें शेयर करते हैं. मेरा दिल करता है ज़ोर से चिल्लाकर बोल दूं कि चुप रहो तुम सब. लोगों के लिए ज़िंदगी का सबसे अच्छा हिस्सा बचपन होता है लेकिन मेरा नहीं था. मेरे लिए बचपन सिर्फ़ एक बुरी याद है.''

दीपा के शब्दों से उनकी बेचैनी का अंदाज़ा लगाया जा सकता है. जब दीपा (बदला हुआ नाम) ये सब बता रही थीं तो सिर्फ़ इतना ही समझ आया कि उन्होंने कुछ बहुत क़ीमती खोया है, जिसका पछतावा उन्हें अब भी है.

आज दीपा 26 साल की हैं लेकिन 6 साल की उम्र में जो कुछ उनके साथ हुआ वो अब भी उनके अंदर है. 20 साल में भी यह डर कभी-कभी सामने आ जाता है.

दीपा बताती हैं, ''वो हमारे पड़ोस में ही रहते थे. मुहल्ला कल्चर था, तो पड़ोसी किसी रिश्तेदार से कम नहीं होते थे. मेरी मां उनकी भाभी थीं. दोनों घरों में इतनी नज़दीकी थी कि कभी लगा ही नहीं वो हमारा घर नहीं है. पर ज़रूरत से ज़्यादा भरोसा सवाल पूछने से रोकता है. शक़ नहीं करने देता.''

ये सब साइकिल पर घुमाने के लालच से शुरू हुआ. दीपा उन्हें भैया कहा करती थीं. वो कहती हैं, ''मुझे किस करना या गोद में बैठाना उन्हें कभी अटपटा नहीं लगा. लगता भी क्यों, वो बड़ों के सामने भी तो मुझे गोद में बैठाते थे ही, जब उन्होंने कभी ऐतराज़ नहीं किया तो मैं 6 साल की बच्ची क्या ही करती. लेकिन उस रात से एक नया खेल शुरू हुआ.''

दीपा बताती हैं, ''मेरे साथ ग़लत हो रहा था. जब भी वो घर में अकेले होते, मेरे साथ ग़लत करते. बहुत ग़लत. वो रेप नहीं था लेकिन रेप से कम भी नहीं था. मुझे उस दौरान गंदा तो लगता था लेकिन उन्होंने मुझे न जाने किस तरह ये यक़ीन दिला दिया था कि जो कुछ वो करते हैं, नॉर्मल है. हर कोई ऐसा करता है. सबका एक सीक्रेट पार्टनर होता है, जिसके बारे में बात नहीं की जाती है.'

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'वो मेरे शरीर से ही नहीं, मेरे दिमाग़ और साइकिल पर घूमने के भोले, लालची मन के साथ भी खेल रहा था.'

दीपा बताती हैं कि ऐसा लंबे समय तक चला लेकिन उन्होंने कभी किसी से कहा नहीं.' 'सीक्रेट पार्टनर' वाली बात उन्हें कुछ इस तरह घोंटकर पिलायी गई थी कि उसके आगे कुछ पूछने-समझने की गुंजाइश ही नहीं थी.

वो बताती हैं 'गंदगी मेरी ज़िंदगी का हिस्सा बन चुकी थी. हालांकि मैं उनसे दूर रहने की कोशिश करती थी लेकिन वो बहाने से मुझे अपने पास बुला लिया करते थे. उस घर में उस शख़्स का एक बड़े भाई भी रहते थे. उस दिन वो घर में अकेले थे.

मुझे न जाने क्यों लगा कि ये भी मेरे साथ वही करेंगे. मैं चुपचाप उनके सामने उसी तरह हो गई जैसे उनके छोटे भाई के सामने हो जाया करती थी. लेकिन शायद वो वाकई मुझे भाभी की बेटी मानते थे. ज़ोर से डांटा और भगा दिया. उस दिन पहली बार समझ आया कि ये सब जो हो रहा था नॉर्मल नहीं.'

दीपा बताती है कि उन्हें ये तो अच्छे से याद नहीं कि इन सबका अंत कैसे हुआ लेकिन जब वो लोग उस मुहल्ले से जा रहे थे तो वो ख़ुश बहुत थीं.

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'भरोसा करने में डर लगने लगा'

वो कहती हैं कि उनके घर में सब थे लेकिन उन्हें उन लोगों से बहुत प्यार था. वो उन पर आंख मूंदकर भरोसा करते थे और यही सबसे बड़ा रोड़ा था. उन्हें हमेशा लगता था कि कोई उनकी बात पर यक़ीन नहीं करेगा. सब उन्हें ही ग़लत बता देंगे.

'मेरे घर में बहनें थीं, भाई था, मम्मी-पापा थे लेकिन कभी किसी से बताने की हिम्मत नहीं हुई. यहां तक कि उन्हें अब भी ये बात नहीं पता है और शायद मैं कभी बताऊं भी नहीं. उन्हें उनकी नज़रों में शर्मिंदा होते नहीं देखना चाहती.'

दीपा बताती हैं कि बचपन की इस घटना के चलते ही उन्होंने कभी बहुत दोस्त नहीं बनाए. धोखा खाने का डर हमेशा रहा और इसी वजह से वो अक्सर अकेली ही रहीं. एक डर और रहा कि कहीं उन्हें एड्स तो नहीं हो गया होगा. इस डर का इलाज तो उन्होंने टेस्ट कराकर कर लिया.

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'शादी को लेकर भी हुई परेशानी'

आज की तारीख़ में दीपा एक हाउस-वाइफ हैं लेकिन इस रिश्ते की शुरुआत आसान नहीं थी. वो बताती हैं, 'मुझे हमेशा डर रहता था कि जिस आदमी से मेरी शादी होगी अगर उसे मेरी ज़िंदगी के इस पहलू के बारे में पता चलेगा तो...लेकिन मैंने सच छिपाया नहीं. सब कुछ बताया. साफ़-साफ़. उन्हें कोई परेशानी नहीं थी. उन्होंने सिर्फ़ इतना कहा, जो हुआ उसमें तुम्हारी ग़लती नहीं थी.'

दीपा के अनुसार, सबसे बड़ी चुनौती सामान्य रहना है. आज भी कई मौक़ों पर वो असहज हो जाती हैं. कई बार थोड़ा अबनॉर्मल बिहेव करती हैं, जिसका सबसे बुरा असर उनके साथ रहने वालों पर पड़ता है.

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' घरवाले चाहें तो रोकी जा सकती हैं ऐसी घटनाएं '

वो मानती हैं कि चाइल्ड अब्यूज को सिर्फ़ घर वाले ही रोक सकते हैं. अपने मामले का ज़िक्र करते हुए वो कहती हैं कि एक समय के बाद वो उस शख़्स के पास जाने से कतराती थीं. अगर उनके घर वालों ने ये नोटिस किया होता तो ये सबकुछ बहुत पहले रुक गया होता.

थोड़ी पड़ताल की होती तो... लेकिन उन्होंने ध्यान नहीं दिया. उन्हें कुछ अजीब नहीं लगा और यही चूक ज़्यादातर मामलों में होती है. दीपा से जब हमने पूछा कि क्या उन्होंने किसी डॉक्टर की मदद ली तो उन्होंने कहा, नहीं.

वो कहती हैं कि सोचा तो कई बार कि साइकॉलजिस्ट के पास जाऊं लेकिन उसके लिए भी लोगों को सौ बातें बतानी पड़ेंगी. सबसे बड़ी समस्या यह है कि लोग सुनते समय तो संवेदना दिखाते हैं लेकिन फिर वही इन बातों को अलग-अलग तरह से लोगों को बताते हैं. जो जख्म को कभी भरने ही नहीं देता.

दीपा कहती हैं, ''बच्चे बहुत सी बातें बोल नहीं पाते लेकिन उनकी हरकतें सब कहती हैं, ज़रूरत है तो सिर्फ़ उन पर नज़र रखने की. ये इतना मुश्किल भी नहीं है. अभी मेरा कोई बच्चा नहीं है लेकिन मैं जानती हूं जो मेरे साथ हुआ, उसके साथ ऐसा कुछ नहीं होगा. मैं होने नहीं दूंगी. उसे ये पता होगा कि उसकी मां उसकी हर बात पर यक़ीन करेगी और उसे कुछ भी बोलने में हिचकिचाने की ज़रूरत नहीं होगी.''

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BBC Hindi
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English summary
Badtouch: In front of elders, brother sitting me in the lap, and kissing .
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