जापान में रखी अस्थियां ही खोलेंगी नेताजी सुभाषचंद्र बोस की मौत का राज?

By: प्रेम कुमार (वरिष्ठ पत्रकार)
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नई दिल्ली। अगर सुभाष चंद्र बोस जिन्दा होते तो आज उनकी उम्र होती 120 साल। अगर 18 अगस्त 1945 को ताइवान में विमान दुर्घटना में उनकी मौत हुई, तो वे महज 48 साल जीवित रहे। अगर गुमनामी बाबा ही थे सुभाष चंद्र बोस, तो वे 1985 तक यानी 88 साल तक जीवित रहे यानी आज़ादी के बाद 43 साल तक हमारे बीच रहे। इन दावों के अलावा ऐसा कोई दावा नहीं है जो यह कहता हो कि सुभाष चंद्र बोस अमुक समय तक जीवित रहे।

नेताजी सुभाष चंद्र बोस की Biography: तुम मुझे खून दो, मैं तुम्हें आजादी दूंगा

कुछ ऐसे दावे जरूर हैं जो ये बताते हैं कि सुभाष चंद्र बोस की मौत 18 अगस्त 1945 को नहीं हुई थी। एक दावा कर्नल निजामुद्दीन का है, जो सुभाष चंद्र बोस के ड्राइवर और बॉडीगार्ड रह चुके थे। उनका दावा है कि उन्होंने 1947 में बर्मा की सितांग नदी के किनारे नेताजी को छोड़ा था, जहां से वे जापानी अफसरों के साथ चले गये।

देवनाथ दास ने 1948 में कहा था कि सुभाष चंद्र बोस जिन्दा हैं

पश्चिम बंगाल सरकार ने नेताजी से जुड़ी जिन फाइलों को सार्वजनिक किया है उनमें से एक 22 नंबर की फाइल में कहा गया है कि नेताजी के सहयोगी रहे देवनाथ दास ने 1948 में कहा था कि सुभाष चंद्र बोस जिन्दा हैं। उन्होंने उनके चीन के मंचूरिया में होने का दावा किया था।

विमान दुर्घटना में मौत की थ्योरी ही विश्वसनीय

विमान दुर्घटना में मौत की थ्योरी ही विश्वसनीय

18 अगस्त 1945 को विमान दुर्घटना में मौत होने के बारे में दावे अधिक हैं। ताज़ा दावा ब्रिटेन की वेबसाइट का है जिसने नेताजी के सहयोगी के हवाले से उनकी मौत हवाई दुर्घटना में होने की पुष्टि की है। कर्नल हबीबउर रहमान ने कहा था कि उड़ान भरने के कुछ ही देर बाद एक ज़बरदस्त विस्फोट हुआ। नेताजी इस हादसे में जल गये थे और गम्भीर रूप से ज़ख्मी थे। उन्हें अस्पताल ले जाया गया लेकिन बच नहीं सके। अंतिम संस्कार के बाद जापान के एक मंदिर में उनकी अस्थियां रखने का दावा भी किया।

परिजन भी मानने लगे हैं दुर्घटना में मृत्यु की बात

परिजन भी मानने लगे हैं दुर्घटना में मृत्यु की बात

नेताजी सुभाष चंद्र बोस के परनाती आशीष रे भी मानते हैं कि तथ्यों की रोशनी में ये मान लेना चाहिए कि नेताजी की मौत 18 अगस्त 1945 को ताइवान में हुई थी। उनका कहना है- "ऐसी तीन रिपोर्टें हैं, जिनमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि बोस 1945 के विमान हादसे में मारे गए थे और उन्हें सोवियत संघ में प्रवेश का अवसर नहीं मिला..." उन्होंने जापान के रेनकोज़ी मंदिर में रखे अस्थिकलश को भारत वापस लाने की भी मांग की।

सोवियत संघ जाने का कोई प्रमाण नहीं मिला

सोवियत संघ जाने का कोई प्रमाण नहीं मिला

अगर ताइवान में विमान दुर्घटना में नहीं मारे गये थे सुभाष चंद्र बोस, तो क्या वे सोवियत संघ चले गये? इस सोच का आधार तत्कालीन अंतरराष्ट्रीय परिस्तिथियां रही हैं। जापान आत्मसमर्पण कर चुका था और द्वितीय विश्वयुद्ध में धुरी राष्ट्रों की सेना की हार हो चुकी थी। ऐसे में ब्रिटेन पर दबाव डालने की जिम्मेदारी सोवियत संघ निभा सकता था। इसलिए उनके सोवियत संघ जाने की थ्योरी बनी हो, ऐसा हो सकता है। लेकिन रूस के सरकारी अभिलेखागार की रिपोर्ट इस थ्योरी को खारिज करती है। सुभाष चंद्र बोस के सोवियत संघ जाने का कोई प्रमाण नहीं मिलता। रूस की ओर से भी आधिकारिक तौर पर इस बारे में स्पष्टीकरण दिया जा चुका है। जब पीएम मोदी ने इस मामले को पुतिन के समक्ष उठाया था, तब भी वही जवाब दोहराया गया।

 भारत सरकार ने भी माना नेताजी 1945 में मारे गये

भारत सरकार ने भी माना नेताजी 1945 में मारे गये

भारत सरकार ने भी अब ये मान लिया है कि सुभाष चंद्र बोस की मृत्यु विमान दुर्घनटा में हुई थी। एक आरटीआई के जवाब में गृहमंत्रालय ने विभिन्न जांच एजेंसियों के निष्कर्षों के हवाले से यह उत्तर दिया है। हालांकि सुभाष चंद्र बोस केपरिजनों ने यह कह कर इस पर आपत्ति जताई कि अगर मौत के रहस्य से सरकारी तौर पर पर्दा नहीं उठाया गया है तो इसे मान कैसे लिया जाए।

 क्यों नहीं होता डीएनए टेस्ट?

क्यों नहीं होता डीएनए टेस्ट?

एक बात समझ से परे है कि जब इतने दावे के साथ कहा जाता है कि सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां जापान के रेनकोज़ी मंदिर में पड़ी हुई हैं तो सरकार उन अस्थियों का डीएनए टेस्ट क्यों नहीं करा लेती? इस लिटमस टेस्ट से संदेह की कोई गुंजाइश ही नहीं रह जाएगी? सुभाष चंद्र बोस के परिजनों ने तब भी ऐसी मांग की थी जब सरकार ने सुभाष चंद्र बोस से जुड़ी फाइलों को सार्वजनिक करना शुरू किया था।

 होते नेताजी तो मिलने जरूर आते- बेटी अनिता बोस

होते नेताजी तो मिलने जरूर आते- बेटी अनिता बोस

सुभाष चंद्र बोस की मौत से जुड़ी जांच कमेटियां किसी निष्कर्ष तक कभी नहीं पहुंची। यही वजह है कि यह रहस्य समय के साथ-साथ गहराता चला गया। सुभाष बाबू के जिन्दा रहने को लेकर सबसे प्रामाणिक भावनात्मक बयान उनकी बेटी अनिता बोस का है जो विमान दुर्घटना के वक्त पौने तीन साल की थीं। उन्होंने पूरे विश्वास से कहा है कि अगर सुभाष चंद्र बोस जिन्दा होते, तो ऐसा हो ही नहीं सकता था कि वे अपने परिवार से मिलने की कोशिश नहीं करते।

गुमनाम रहने वाली शख्सियत नहीं हैं नेताजी

गुमनाम रहने वाली शख्सियत नहीं हैं नेताजी

राजनीतिक रूप से भी सोचें तो जिस शख्स ने तुम मुझे ख़ून दो मैं तुझे आज़ादी दूंगा का नारा दिया हो, वह शख्स क्या कभी गुमनाम हो सकता है? गुमनाम होकर जीने वालों में सुभाष चंद्र बोस तो हो नहीं सकते। इसलिए गुमानी बाबा के तौर पर 1985 में जिस शख्स की मौत हुई थी, वे सुभाष चंद्र बोस होंगे। इस दावे पर यकीन नहीं होता। 1947 में बर्मा सीमा पर छोड़ आने का कर्नल निजामुद्दीन का दावा भी बहुत समय बाद सामने आया और उसे खुद वे भी सिद्ध नहीं कर पाए। बाकी प्रमाण भी 'उसने कहा था' की तर्ज पर है। इसलिए यह मान लेना मुश्किल लगता है कि सुभाष चंद्र बोस आगे भी जिन्दा रहे होंगे।

अस्थियां ही खोलेंगी मौत का राज

अस्थियां ही खोलेंगी मौत का राज

नेताजी की मौत का रहस्य उन अस्थियों में ही कैद है जो जापान के मंदिर में सुरक्षित है। उसकी डीएनए जांच कराकर इस सवाल का उत्तर खोजने का प्रयास जल्द से जल्द होना चाहिए। सरकार इसमें देरी क्यों कर रही है, यह भी समझ से परे है।

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English summary
Renkoji Temple is a Buddhist temple in Tokyo, Japan. It is assumed to be the purported location of the ashes of Netaji Subhas Chandra Bose, Indian freedom-fighter, which have been preserved since September 18, 1945.
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