भारत में देवी: अनन्त नारीत्व के पांच स्वरुप

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नई दिल्ली। भारत के हर प्रांत, हर कस्बे, हर गांव और हर गांव में अलग-अलग देवियों की पूजा की जाती है। शायद ही कोई ऐसा घर या कस्बा होगा, जहां देवी की पूजा न होती हो। हर जगह देवी के रुप अलगअलग होते है, लेकिन लेखक देवदत्त पट्टनायक ने अपनी किताब भारत में देवी के माध्यम से समझाने की कोशिश की है कि भले ही देवी के रुप अनेक हो, लेकिन उन सभी की उत्पति मुख्य रुप से पांच स्वरुपों से ही हुई हैं।

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लेखक ने उन पांच स्वरुपों की तुलना नारी के अलग-अलग रुपों से की है। नारीत्व के पांच अलग-अलग रुपों को देवी की उत्पति का आधार बताया गया है। पहले के पहले स्वरुप की तुलना प्रकृति से की गई है, जबकि दूसरे स्वरुप में देवी को जननी के रुप में देखा गया। देवी को ममतामयी स्वरुपा बताया गया है। उसके इस ममतामयी रुप को उसका सबसे बड़ा गुण बताया गा है। वहीं तीसरे स्वरुप में उन्हें पुरूष को लुभाकर शारीरिक भोग-विलास से जीवन चक्र में बांधने वाली अप्सरा बताया गया है।

चौथे स्वरुप में स्त्री को घर परिवार और पति के बंधन में बंधने वाली बताया गया है। उनका चौथा व्यापक स्वरुप है, जो बहुतायत है। वहीं पांचवें स्वरुप में देवी को डरावनी और बदला लेने वाली बताया गया है। देवी के इस स्वरुप तो बहुत खतरनाक समझा गया है। अपने इस स्वरुप में वो डरावनी, खूंखार असुरी का स्वरुप बताया है। इस स्वरुप को लेखक ने बहुत सारी लोककथाओं और कहानियों के माध्यम से रोचक तरीके से समझाया है।

लेखक देवदत्त पट्टनायक ने अपनी किताब में कई सवाल भी उठाए है। इस सवालों के जवाब देना समाज के लिए आसान नहीं है। लेखक ने देवी स्वरुप स्त्रियों पर होने वाले अत्याचारों को लेकर कई सवाल उठाएं है। उन्होंने भारत के पितृसत्तात्मक समाज पर सवाल खड़ा किया है। लेखक ने सवाल किया है कि आखिर हिन्दू के व्यवस्थानिर्धारकों ने स्त्रियों को कामिनी के रुप में ही क्यों देखा? क्यों ऐसा कहा कि माया से बचना चाहिए? उन्होंने ने केवल सवाल किए है ब्लकि हिन्दुओं की मान्यता प्राप्त पुस्तकों के माध्यम से उनके उत्तर भी तलाशने की कोशिश की है। वहीं लेखक ने पौराणिक कथाओं और किवदंतियों के शोध से इनके उत्तर को तलाशने में सफलता हासिल की है।

पुस्तक: भारत में देवी

लेखक: देवदत्त पट्टनायक

प्रकाशन: राजपाल एंड सन्स

कीमत: 295 रुपए

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English summary
Book Review of Writer Devdutta Patnayak's nobel Bharat Mai Devi.
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