15 साल के बेटे को मां का खत, आओ रेप पर बात करते हैं

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नई दिल्ली। दिल्ली की रहने वाली 41 साल की प्रीति अग्रवाल मेहता ने अपने 15 साल के बेटे सुयांश को चिट्ठी लिखकर महिलाओं के शोषण के अपने अनुभव बताए हैं और सुयांश को बताया है कि उसे जिंदगी में लड़कियों के बारे में कैसे सोचना है।

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प्रीति के लिखे खत का अनुवाद हम आपको यहां दे रहे हैं, इसे प्रीति अग्रवाल के शब्दों में ही पढ़ सकते हैं। ''मैं तुम्हे लिख रही हूं ना सिर्फ एक मां की तरह बल्कि एक औरत होने के नाते भी। मैं तुम्हे लिख रही हूं क्योंकि पीछा करना, छींटाकशी, यौन शोषण और बलात्कार जैसे शब्द तुमने खबरों में सुने होंगे और स्कूल में इन पर डिबेट हुई होगी। ये शब्द सिर्प इतने तक ही नहीं हैं, ये सब सच्चाई है जिसका हर औरत सामना करती है, इसके रूप अलग-अलग हो सकते हैं।''

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''मैं जानती हूं कि ये बात तुम्हे परेशान करेगी लेकिन मैं तुम्हे बता देना चाहती हूं कि तुम्हारी मां भी शोषण का शिकार हुई है, तुम्हारी बहन भी और बचीं तुम्हारी दादी भी नहीं थी।''

''जब तुम छोटे थे तो टीवी पर रेप की खबरें आने पर मैं चैनल बदल दिया करती थी, ताकि तुम्हारी मासूमियत को बचा सकूं। 2012 में दिल्ली गैंगरेप के बाद इस मुद्दों को लेकर काफी बहसें हुईं।''

''तुम नहीं जानते कि ये मुद्दे कैसे होते हैं। शोषण का कोई एक तरीका नहीं, कई तरह के शोषण का सामना औरतों को रोजाना करना पड़ता है।''

ये लड़कियों का नहीं लड़कों का मामला है

''मुझे इस बारे में आपसे क्यों बात करनी है? मुझे लड़कियों से बात करनी चाहिए और उन्हें हिफाजत से रहने के लिए कहना चाहिए। आखिर ये लड़कियों का का विषय है और तुम लड़के हो। क्या मैंने ठीक कहा?''

''बेटा, सच्चाई ये है कि अगर हर लड़का एक ऐसी तहजीब के साथ बड़ा हो, जहां लड़कियों की इज्जत करना सिखाया जाए तो ये सारे मामले आज हमारे सामने ही ना होते।''

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''लड़के तो लड़के होतो हैं' ऐसा तुमने लाखों बार सुना होगा। इस पर विश्वास नहीं करना। जब तुम्हारा कोई दोस्त किसी लड़की पर तंज कसे तो हंसना मत, अपने दोस्त का विरोध करना।''

''हिंसा या शोषण तभी बढ़ता है, जब उसे कुछ लोग समर्थन करते हैं और ऐसा करने वालों से जवाब नहीं मांगा जाता। तुमको कभी सोचना चाहिए कि आखिर क्यों सारी गालियां औरतों को ही दी जाती हैं।''

लड़की की ना का मतलब ना है

''फिल्म के दौरान भी बलात्कार पर लोग हंसते हैं, जैसे ये मनोरंजन है। लड़की के मना करने को हां समझते हैं। आखिर उसकी ना को ना को ना क्यों ना माना जाए?''

''मैं तुम्हारे ऊपर अपनी सोच को थोपना नहीं चाहती, मैं चाहती हूं कि तुम इस पर खुद सोचो कि क्या सही है। तुमको अपने दोस्तों से लड़के-लड़कियां सभी से बात करनी चाहिए।''

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''तुमको ये नहीं कहना है कि मैं अकेला क्या कर सकता हूं क्योंकि तुम अकेले नहीं हो। लोग बदलाव चाहते हैं लेकिन आगाज के लिए किसी का इंतजार करते हैं। हमेशा याद रखना अगर तुम किसी समस्या के समाधान में शामिल नहीं हो तो फिर समस्या में शामिल हो।''

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English summary
A mother open letter to her son about rape
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