...और व्याकुल हो उठे सरदार पटेल
अहमदाबाद। दरअसल सरदार पटेल जयंती को देखते हुए कल रात मैंने परेश रावल अभिनीत फिल्म सरदार देखी। फिल्म एक दृश्य में मैंने सरदार को काफी बेचैन पाया। उनकी उस बेचैनी का कारण पता चला, तो मैं भी सचमुच व्याकुल हो उठा। फिल्म के दृश्य के अुसार उस दिन सरदार वल्लभभाई पटेल काफी व्याकुल हो गए। वह दिन कोई सामान्य दिन नहीं था। इतिहास तय करने वाला था भविष्य।

एक संदेशवाहक आया और उसने तत्कालीन उप प्रधानमंत्री व गृह मंत्री सरदार वल्लभभाई पटेल को प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के भाषण की प्रति दी। नेहरू के भाषण को पढ़ते ही पटेल चौंक गए। उन्होंने तुरंत नेहरू के निवास पर फोन घुमाया, पर पता चला कि नेहरू रवाना हो गए हैं। पटेल बेचैन हो गए। उन्होंने आकाशवाणी स्टेशन फोन घुमाया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। आकाशवाणी नेहरू का जनता के नाम भाषण प्रसारित कर चुका था। पटेल व्याकुल स्वर में बोल उठे, ‘जवाहर आपने ये क्या कह दिया?'
लाल किले पर तिरंगा फहराने के बाद देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू आकाशवाणी से देश के नाम अपना पहला सम्बोधन करने जा रहे थे। इस सम्बोधन में उन्होंने कश्मीर समस्या पर कहा, ‘‘भारत कश्मीर समस्या का समाधान संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में करेगा।'' नेहरू के भाषण का यह अंश स्वतंत्र भारत की पहली कूटनीतिक विफलता साबित हुआ और कश्मीर की समस्या आज तक नासूर बन गई है।
सरदार पटेल के पास जब आकाशवाणी से प्रसारित होने वाले नेहरू के भाषण की प्रति पहुंची, तब तक काफी देर हो चुकी थी। पटेल ने नेहरू के भाषण में जैसे ही यह पढ़ा कि भारत संयुक्त राष्ट्र की मध्यस्थता में कश्मीर समस्या का समाधान करेगा, वे बेचैन हो गए। उनके सिर पर बल पड़ गए। उन्होंने नेहरू का यह भाषण आकाशवाणी से प्रसारित न हो, इसके लिए भरपूर प्रयास किए, परंतु दुर्भाग्य से वे विफल रहे। नेहरू का भाषण पढ़ते ही उन्होंने तुरंत उनके निवास पर टेलीफोन लगाया और पूछा कि नेहरू हैं या निकल गए?
जवाब मिला कि नेहरू आकाशवाणी पर राष्ट्र के नाम सम्बोधन के लिए रवाना हो चुके हैं। पटेल कुछ देर के लिए निराश हो गए। सोचने लगे अब शायद कुछ नहीं हो सकता, लेकिन सहसा उन्हें लगा कि वे नेहरू के भाषण को जनता के नाम प्रसारित होने से पहले संशोधित करवा सकते हैं। पटेल ने तुरंत आकाशवाणी में फोन घुमाया। लेकिन आकाशवाणी से जवाब मिला कि नेहरू का भाषण प्रसारित हो चुका है।
नेहरू के इस भाषण ने सरदार पटेल को विचलित कर दिया। पटेल नहीं चाहते थे कि कश्मीर की समस्या के समाधान में कोई तीसरा पक्ष मध्यस्थता करे, लेकिन नेहरू ने अपने पहले भाषण में यह बात कह कर भारत को बड़ी कूटनीतिक विफलता दिलाई। सरदार चाह कर भी नेहरू को यह भाषण पढऩे से रोक नहीं पाए। काश पटेल सफल होते, तो संभवत: आज कश्मीर की समस्या कोई समस्या ही नहीं रहती। नेहरू की वह भूल भारत के लिए आज तक नासूर साबित हो रही है।
लौह पुरुष सरदार वल्लभभाई पटेल की कश्मीर के बारे में यही सोच थी कि कश्मीर समस्या का समाधान भारत और पाकिस्तान को मिल कर करना होगा। इसमें किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता कभी स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए। पटेल नेहरू के भाषण में यही संशोधन करवाना चाहते थे, परंतु दुर्भाग्य से पटेल लाख कोशिश के बावजूद ऐसा नहीं करवा पाए। यही कारण है कि पाकिस्तान वर्षों तक नेहरू के भाषण की दुहाई देते हुए कश्मीर मुद्दे को द्विपक्षीय नहीं मानता रहा है और बार-बार संयुक्त राष्ट्र समेत किसी भी तीसरे पक्ष की मध्यस्थता पर जोर देता रहा है। हालांकि नेहरू के भाषण के बाद भी कश्मीर समस्या पर शिमला समझौता सहित कई समझौते हुए, परंतु बिगड़ी बात आज तक बनी नहीं है।












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