वक्री बृहस्पति से रहें सावधान वरना राजा से रंक बनने में देर नहीं

Written by: पं.गजेंद्र शर्मा
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नई दिल्ली। वक्री ग्रह का नाम सुनकर अक्सर लोग डर जाते हैं। ग्रहों के वक्रत्व का अर्थ वे अनिष्ट से लगाते हैं। जन्म कुंडली में यदि कोई ग्रह वक्री है तो लोग समझते हैं कि उनके साथ कुछ न कुछ बुरा होता रहेगा, लेकिन यह पूर्ण सत्य नहीं है। जन्म कुंडली में यदि कोई ग्रह अच्छी स्थिति में बैठा है और वह वक्री हो रहा है तो वह जातक को लाभ देता है और यदि कुंडली में कोई ग्रह अन्य पाप ग्रहों से युक्त हो या पाप ग्रहों की दृष्टि में हो तो बुरा प्रभाव देता है।

ग्रहण दोष लगाता है जीवन पर ग्रहण

आज हम बात कर रहे हैं बृहस्पति की। किसी जातक की जन्म कुंडली में यदि बृहस्पति वक्री है तो समझो उसकी किस्मत के द्वार खुले हुए हैं। वक्री बृहस्पति वाले जातक उन कार्यों में भी सफल हो जाते हैं जिनमें दूसरे लोग असफल हो जाते हैं। ऐसे लोग उस जगह से कार्य प्रारंभ करते हैं जहां अन्य लोग निराश होकर काम बंद कर देते हैं। वक्री बृहस्पति वाले जातकों में कार्य करने की अद्भुत क्षमता और सामर्थ्य होती है।

वक्री बृहस्पति जातक को राजा भी बना सकता है

ऐसे व्यक्ति यदि किसी बंद प्रोजेक्ट में भी हाथ डालें तो वह दोगुनी गति से प्रारंभ हो जाता है और उन्हें अपार लाभ देता है। अन्य शुभ ग्रहों का साथ मिले तो वक्री बृहस्पति जातक को राजा भी बना सकता है। बात यदि स्वभाव की करें तो वक्री बृहस्पति जिन लोगों की कुंडली में होता है वे दूरदर्शी और लोगों को साथ लेकर चलने वाले होते हैं। ऐसे लोग पहले से भांप जाते हैं कि भविष्य में उन्हें कौन व्यक्ति लाभ देगा और किससे धोखा मिल सकता है।

किसी के लिए यह शुभ और किसी के लिए मिश्रित फल

इसलिए वे पहले से सचेत होकर उसी के अनुसार आगे बढ़ते हैं। हालांकि वक्री बृहस्पति का अलग-अलग भावों में अलग-अलग परिणाम होता है। किसी भाव के लिए यह शुभ और किसी के लिए मिश्रित फल देने वाला होता है।

लग्न स्थान में वक्री

लग्न स्थान में वक्री

  • प्रथम भाव: बृहस्पति प्रथम भाव लग्न स्थान में वक्री हो तो व्यक्ति विद्वान और विशेष पूजनीय होता है। स्वस्थ और सुंदर शरीर का मालिक होता है। सार्वजनिक जीवन में ऐसा व्यक्ति बहुत सम्मान प्राप्त करता है, लेकिन दूसरी ओर कई मामलों में सही न्याय करने से चूक जाता है। अपने प्रिय के प्रति पक्षपाती हो जाता है और दूसरों के प्रति ईमानदारी नहीं बरत पाता।
  • द्वितीय भाव: वक्री बृहस्पति द्वितीय भाव में है तो व्यक्ति लापरवाहीपूर्ण खर्च करता है। इन्हें पैतृक संपत्ति प्राप्त होती इसलिए वह उसका महत्व नहीं समझ पाता और अंधाधुंध खर्च करता है। यदि द्वितीय भाव में वक्री बृहस्पति के साथ शुक्र हो तो व्यक्ति आलीशान जीवनशैली, लग्जरी घर और आभूषणों का शौकीन होता है। बोलने में कुशल, वाकपटु, दानी और उदार होता है। पत्नी से सुख मिलता है।
  • तृतीय भाव: जिन जातक की कुंडली के तीसरे घर में वक्री बृहस्पति है तो उसका मिलाजुला प्रभाव समझना चाहिए। ऐसा व्यक्ति स्वयं के प्रयासों से उच्च पदों तक पहुंचता है। शिक्षा के क्षेत्र में प्रारंभ में लापरवाह किंतु बाद में उच्च स्तर तक पहुंचता है। धन संचय भी खूब करता है, लेकिन अत्यधिक धन और उच्च पद पर पहुंचते ही ये अहंकारी हो जाते हैं और दूसरों का अपमान करते हैं। अन्यायी हो जाते हैं।

परिवार और समाज

परिवार और समाज

  • चतुर्थ भाव: चौथे भाव में बैठा वक्री बृहस्पति व्यक्ति को घमंडी बना देता है। ऐसा व्यक्ति अपने परिवार और समाज के प्रति उदार नहीं रहता। दूसरों के बारे पूर्वाग्रह रखकर चलता है और मन ही मन कई लोगों से दुश्मनी पाल बैठता है। ये लोग यदि अपना व्यवहार बदल लें तो फिर उनके लिए जीवन में कुछ भी पाना असंभव नहीं। धन, सम्मान, यश, कीर्ति हासिल कर सकते हैं।
  • पंचम भाव: बृहस्पति वक्री होकर पंचम स्थान में बैठा है तो व्यक्ति को अपने बच्चों के प्रति अधिक लगाव नहीं होता। ऐसा व्यक्ति अपनी पत्नी के अलावा कई स्त्रियों से शारीरिक संबंध बनाता है। पंचम वक्री गुरु संतानसुख में भी बाधक होता है। यदि पंचम स्थान में बृहस्पति कुंभ या कर्क राशि में हो तो व्यक्ति को संतान नहीं होती। मीन में हो तो कम संतति होती है। धनु में हो तो बहुत कष्टों के बाद संतान होती है। हालांकि पंचमस्थ वक्री गुरु वाला व्यक्ति अपने वर्ग का मुखिया, धनी व सरकारी क्षेत्र में प्रभावशाली व्यक्ति होता है।
  • षष्ठम भाव: छठे स्थान में वक्री गुरु है तो व्यक्ति बलवाल, शक्तिशाली और शत्रुओं को परास्त करने वाला होता है। व्यवसाय की अपेक्षा नौकरी में अधिक लाभ होता है। ऐसे लोग स्वास्थ्य विभाग में उच्च पदों तक पहुंचते हैं। छठे वक्री गुरु वाले लोग स्वयं के स्वास्थ्य के प्रति लापरवाह होते हैं। ऐसे लोग ब्लडप्रेशर, डायबिटीज, लिवर संबंधी रोगों से पीडि़त होते हैं।

जीवनसाथी उच्चकुल, धनवान, परोपकारी

जीवनसाथी उच्चकुल, धनवान, परोपकारी

सप्तम भाव: सप्तमस्थ वक्री वाले जातकों का विवाह के बाद भाग्योदय होता है। जीवनसाथी उच्चकुल, धनवान, परोपकारी और सुख देने वाला मिलता है। मेष, सिंह, मिथुन या धनु राशि में गुरु हो तो उच्च शिक्षा, कुंभ का गुरु हो तो पुत्र संतान की चिंता रहती है। वृषभ, कन्या, कर्क, वृश्चिक या मीन राशि का गुरु हो तो व्यक्ति अत्यंत महत्वाकांक्षी होता हे। तुला या मकर का गुरु हो तो दो पत्नी या अन्य स्त्री से संबंध का सूचक है।

अष्टम भाव: आठवें घर में वक्री गुरु हो तो व्यक्ति तंत्र-मंत्र, काले जादू की दुनिया का बादशाह बनता है। ऐसे व्यक्ति को दुर्घटना में मृत्यु का भय रहता है। अष्टम वक्री गुरु शुभ ग्रहों के साथ बैठा हो तो व्यक्ति को पैतृक धन प्राप्त होता है। ऐसा व्यक्ति बड़ा ज्योतिषी, मंत्र शास्त्री, विद्वान व धनवान बनता है।

व्यक्ति की प्रतिष्ठा

व्यक्ति की प्रतिष्ठा

  • नवम भाव: वक्री बृहस्पति नवम स्थान में हो तो व्यक्ति चार मंजिला भवन या चार भवनों का स्वामी होता है। राजा तथा सरकार के उच्चाधिकारियों से घनिष्ठता होती है। ऐसे व्यक्ति धर्मभीरू भी देखे गए हैं। अपनी मनपसंद बात न हो तो ऐसे व्यक्ति जल्दी क्रोधित हो जाते हैं और अपनी मन की करने के लिए कुछ भी कर जाते हैं।
  • दशम भाव: दशम वक्री गुरु वाले व्यक्ति की प्रतिष्ठा अपने पिता, दादा से ज्यादा होती है। ऐसा व्यक्ति धनी और राजा का प्रिय होता है। दूसरी हो दशम भाव में वक्री गुरु वाले जातक की विभिन्न विरोधी गतिविधियां इनके विकास में बाधक होती है। गैर जिम्मेदारी पूर्ण हरकतें और कमजोर निर्णय क्षमता के कारण ये कई मौके गंवा बैठते हैं।

 जीवनस्तर सामान्य

जीवनस्तर सामान्य

  • एकादश भाव: 11वें भाव में वक्री गुरु हो तो व्यक्ति लगातार आगे बढ़ने का प्रयास करता है, लेकिन अपने से निम्न वर्ग के लोगों से मित्रता के कारण इनका जीवनस्तर सामान्य ही बना रहता है। ऐसे व्यक्तियों की सोच भी छोटी होती है। शराबी, व्यसनी लोगों से दोस्ती के कारण ये धन भी बर्बाद करते हैं।
  • द्वादश भाव: 12वें भाव में वक्री गुरु वाले जातक शुभ कार्यों में पैसा लगाते हैं। इनके गुप्त शत्रु सदा इन्हें बदनाम करने का प्रयास करते रहते हैं, लेकिन इनकी रक्षा होती है। इन्हें आगे बढ़ने के कई अवसर आते हैं लेकिन अवसरों को नहीं पहचान पाने के लिए कारण मौके हाथ से छूट जाते हैं। कई बार व्यर्थ के कार्यों में समय नष्ट करते हैं।

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English summary
According to the astrologers, Jupiter is the lord of Puravasa, Vishakha and Purvabhadra nakshatra. It remains in retrograde for 4 months in a year.
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