Must Read: कौन थे 'वामन', क्या है उनका सच?

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नई दिल्ली। आज वामन जंयती है, वामन विष्णु के पांचवेंं और त्रेता युग के पहले अवतार थे।

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आईये जानते हैं उनके बारे में कुछ खास बातें और उनकी कथा...

  • भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की द्वादशी तिथि को वामन द्वादशी या वामन जयंती के रूप में मनाया जाता है।
  • वामन ॠषि कश्यप और उनकी पत्नी अदिति के पुत्र थे, जो की काफी तपस्या के बाद जन्में थे।
  • यह विष्णु के पहले ऐसे अवतार थे जो मानव रूप में प्रकट हुए थे।
  • ऐसी मान्यता है कि वह इन्द्र के छोटे भाई थे।
  • अध्यात्म रामायण के अनुसार वामन भगवान राजा बलि के सुतल लोक में द्वारपाल बन गये थे।
  • जिसका जिक्र तुलसीदास ने अपने रामचरित मानस में भी किया है इसी कारण उनकी सत्यता प्रमाणित होती है।
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आगे की बात तस्वीरों में..

कथा

माना जाता है कि दैत्यराज बलि के आतंक से देवता काफी परेशान हो गये थे क्योंकि बलि ने इंद्र को परास्त कर स्वर्ग पर अधिकार कर लिया। जिसे देखकर मां अदिति को काफी दुख हुआ और उन्होंने बच्चे के लिए विष्णु की आराधना की, कहा जाता है कि उन्होंने भूखे-प्यासे रहकर तपस्या की थी।

मां अदिति के बेटे

विष्णु जी ने तब प्रसन्न होकर मां अदिति से कहा कि वो पुत्र के रूप में उनके गर्भ से जन्म लेंगे और उन्होंन वामन के रूप में मां अदिति के घर जन्म लिया। उनके ब्रह्मचारी रूप को देखकर सभी देवता और ऋषि-मुनि आनंदित हो उठे, वामन विष्णु के पांचवेंं और त्रेता युग के पहले अवतार थे।

तीन पग भूमि मांगी

वामन रूप में विष्णु भगवान बलि के पास पहुंचे और उनसे अपने कदमों के बराबर तीन पग भूमि भेंट में मांगी। जिसपर बलि ने तुरंत हां बोल दिया और उसके बाद वामन ने अपना विराट रूप धारण किया और उन्होंने एक पग से पृथ्वी और दूसरे से स्वर्ग को नाप लिया और तीसरे पग के लिए धरती छोटी पड़ गई।

सम्पत्ति का स्वामी सम्पत्ति से बड़ा

राजा बलि ने अपनी बात कटती देखकर अपना सिर वामन के पैर पर रखकर कहा कि सम्पत्ति का स्वामी सम्पत्ति से बड़ा होता है।जिस पर वामन प्रसन्न हो गये और उन्होंने उसे पाताल का अधिपति बना दिया और इंद्र को उनका राज लौटा दिया।

दंभ और अहंकार

वामनावतार के रूप में विष्णु ने बलि को यह पाठ दिया कि दंभ और अहंकार से जीवन में कुछ हासिल नहीं होता है और यह भी कि धन-सम्पदा क्षणभंगुर होती है इसलिए इंसान को कभी भी इस बात का घमंड नहीं करना चाहिए।

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English summary
Vamana is described in the Puranas as the fifth avatar of Vishnu, and the first incarnation of the Second Age or Treta yuga.
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