जन्माष्टमी 2017: जानिए क्यों हुआ था कृष्ण का जन्म?

By: पं.गजेंद्र शर्मा
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नई दिल्ली। भगवान कृष्ण के प्रेम रस से रोम रोम रससिक्त कर धन्य हुए भारत देश ने उनकी एक-एक लीला को अपने हृदय में बसाया है। हमारे देश के जन- जन में राम और कण-कण में कृष्ण बसते हैं। कृष्ण का प्रेम इतना अधिक मानवीय था, उनकी लीलाएं इतनी सहज थीं कि वे स्वयं प्रेम का पर्याय बन गए।

जन्माष्टमी 2017: राशि के मुताबिक करें श्री कृष्ण का पूजन

चाहे माता-पुत्र का निर्मल प्रेम हो या प्रेमी-प्रेमिका का रोमांचक प्रेम, चाहे भाई-भाई का नटखट प्रेम हो या पुत्र की प्रतीक्षा में आंखें पथरा देने वाले माता-पिता का अविरत प्रेम, चाहे पति-पत्नी का अंतहीन प्रेम हो या सखा-सखी का अविस्मरणीय प्रेम, सबकी परिभाषा संपूर्ण रूप से एक ही शब्द में सिमटी है- कृष्ण।

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जन्माष्टमी 2017: पूजा करने का सही मुहूर्त एवं समय

आइए, ऐसे ही अनुपम, अद्भुत, अतुलनीय और अनंत पुरूष श्री कृष्ण के जन्मदिवस जन्माष्टमी पर हम उन्हीं की स्मृति को साथ बैठ दोहराते हैं...

भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे

भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे

यह द्वापर युग की बात है। उस समय धरती पर असुरों का अत्याचार इतना बढ़ गया था कि पृथ्वी माता एक गाय का रूप धरकर ब्रह्मा जी के पास अपनी व्यथा सुनाने पहुंची। ब्रह्मा जी सभी देवों और धरती माता के साथ भगवान विष्णु की शरण में पहुंचे। श्री विष्णु उस समय योग निद्रा में थे। देवों द्वारा स्तुति करने पर उनकी निद्रा भंग हुई और उन्होंने सबके आने का कारण पूछा।

 मैं शीघ्र ही मथुरा में वसुदेव-देवकी के यहां जन्म लूंगा

मैं शीघ्र ही मथुरा में वसुदेव-देवकी के यहां जन्म लूंगा

श्री विष्णु उस समय योग निद्रा में थे। देवों द्वारा स्तुति करने पर उनकी निद्रा भंग हुई और उन्होंने सबके आने का कारण पूछा। धरती माता की विपदा सुनकर श्री विष्णु ने कहा कि मैं शीघ्र ही मथुरा में वसुदेव-देवकी के यहां जन्म लूंगा, तत्पश्चात ब्रजधाम में निवास करूंगा। आप सब देव गण भी ब्रज भूमि में जाकर यादव वंश में शरीर धारण करें। भगवान का आदेश पाकर देवगण ब्रज में नंद-यशोदा और गोप-गोपियों के रूप में जन्म लेकर उनका कार्य सिद्ध करने को उद्यत हुए।

कंस को अपनी बहन देवकी बहुत प्रिय थी

कंस को अपनी बहन देवकी बहुत प्रिय थी

द्वापर युग के अंत में मथुरा में राजा उग्रसेन का राज था। उनके अत्यंत दुष्ट पुत्र कंस ने उन्हें कारावास में डालकर राज्य हथिया लिया था। कंस को अपनी बहन देवकी बहुत प्रिय थी। देवकी की इच्छा जान कंस ने उसका विवाह यादव वंश के वसुदेव से कर दिया। देवकी की विदाई के समय आकाशवाणी हुई कि उसका आठवां पुत्र कंस का काल बनेगा। कंस ने तुरंत ही देवकी को मार डालना चाहा, पर वसुदेव ने उससे वादा किया कि वे देवकी की आठवीं संतान कंस को सौंप देंगे। कंस इस बात पर सहमत हुआ ही था कि नारद मुनि ने आकर कहा कि आठवीं संतान की गिमती पहले गर्भ से होगी या अंतिम से? नारद जी के परामर्श पर कंस ने वसुदेव और देवकी को कारावास में डाल दिया और उनकी सात संतानों को पैदा होते ही मार डाला।

तेरा काल तो गोकुल पहुंच चुका

तेरा काल तो गोकुल पहुंच चुका

भाद्र पद के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में देवकी के गर्भ से स्वयं भगवान कृष्ण ने जन्म लिया। जन्म लेते ही वे माता-पिता के समक्ष शंख, चक्र, गदा एवं पद्मधारी रूप में प्रकट हुए और उनसे कहा कि अब मैं बाल रूप धारण करता हूं। तुम जल्द से मुझे ब्रजधाम पहुंचा दो और नंद के यहां उत्पन्न हुई कन्या को मेरे स्थान पर रख दो। भगवान की माया से जेल के द्वार, वसुदेव की हथकड़ी सब खुल गए और पहरेदार सो गए। वसुदेव बाल कृष्ण को सूप में रखकर बरसते पानी में गोकुल गांव ले चले। रास्ते में शेषनाग उनका छत्र बने और यमुना उनके पैर पखारने बढ़ चलीं। श्री कृष्ण ने अपने पैर लटका कर यमुना की इच्छा पूरी की, उनके पैर छूते ही यमुना शांत हो गईं। वसुदेव ने गोकुल पहुंचकर कृष्ण को यशोदा जी के बगल में सुला दिया और स्वयं कन्या को लेकर वापस आ गए। उनके आते ही कारावास बंद हो गया, हथकड़ी लग गई और पहरेदार जाग गए। बच्चे के रोने का स्वर सुन कंस को सूचना दी गई। उसने आते ही देवकी से कन्या को छीनकर पटकना चाहा, पर उसे अचंभित कर कन्या उड़ गई और बोली- अरे मूर्ख! तू मुझे क्या मारता है? तेरा काल तो गोकुल पहुंच चुका है।

कंस को मारकर वसुदेव और देवकी को कारावास से छुड़ाया

कंस को मारकर वसुदेव और देवकी को कारावास से छुड़ाया

इसके बाद कंस ने अनेक प्रकार के असुरों और मायावी दानवों को भेजकर बालकृष्ण को मरवाने के प्रयास किए, पर सफल ना हो सका। अंत में किशोर अवस्था में श्री कृष्ण ने गोकुल का त्याग कर मथुरा गमन किया और कंस को मारकर वसुदेव और देवकी को कारावास से छुड़ाया। इस तरह धरती को असुरों के प्रकोप से मुक्ति मिली।

जन्माष्टमी पूजा विधि

जन्माष्टमी पूजा विधि

पुराणों के अनुसार श्री कृष्ण का जन्म भाद्रपद की अष्टमी को रोहिणी नक्षत्र में रात बारह बजे हुआ था। इसीलिए आज भी हमारे यहां रात 12 बजे ही श्री कृष्ण का जन्मोत्सव मनाया जाता है। इस दिन सभी मंदिरों का श्रंृगार किया जाता है। घर-घर में झूला और झांकी सजाई जाती है। श्री कृष्ण के लड्डू गोपाल स्वरूप का सोलह श्रंगार किया जाता है। कई स्थानो पर रात बारह बजे खीरा ककड़ी के अंदर से भगवान कृष्ण का जन्म कराया जाता है। इस दिन रात 12 बजे तक व्रत रखने की परंपरा है। रात के 12 बजते ही शंख, घंटों की आवाज से सारे मंदिरों और संपूर्ण देश में श्री कृष्ण के जन्म की सूचना से दिशाएं गूंज उठती हैं। इसके बाद भगवान कृष्ण को झूला झुलाकर आरती की जाती है और प्रसाद वितरण किया जाता है। प्रसाद ग्रहण करने के बाद ही व्रत खोला जाता है। श्री कृष्ण द्वारा गोकुल धाम में गोपियों की मटकी से माखन लूटने की याद में लगभग संपूर्ण भारत में इस दिन मटकी फोड़ने की प्रतियोगिता का आयोजन किया जाता है।

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English summary
Krishna Janmashtami also known simply as Janmashtami, is an annual Hindu festival that celebrates the birth of Krishna, the eighth avatar of Vishnu.
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